सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला गाली देना हर बार अश्लीलता नहीं, कानून में तय हैं इसके सख्त मानदंड

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला गाली देना हर बार अश्लीलता नहीं, कानून में तय हैं इसके सख्त मानदंड

प्रेषित समय :20:22:58 PM / Sat, Jul 18th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति द्वारा अपमानजनक, अभद्र या अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल करना मात्र इस आधार पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की अश्लीलता संबंधी धारा के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि किसी शब्द या अभिव्यक्ति को कानून की दृष्टि में अश्लील तभी माना जाएगा, जब वह कामुक प्रकृति की हो, यौन उत्तेजना पैदा करने वाली हो तथा उसे सुनने या देखने वालों के नैतिक चरित्र को दूषित या भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति रखती हो। केवल गाली-गलौज, अशिष्ट या आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग, चाहे वे कितने भी असभ्य या अस्वीकार्य क्यों न हों, स्वतः अश्लीलता की श्रेणी में नहीं आते।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने यह टिप्पणी तमिलनाडु के एक भूमि विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने उस व्यक्ति की अपील पर आंशिक राहत देते हुए आईपीसी की धारा 294(बी) के तहत अश्लीलता के अपराध में हुई उसकी दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया। हालांकि, शिकायतकर्ता पर धारदार हथियार से हमला कर गंभीर चोट पहुंचाने के अपराध में उसकी सजा को बरकरार रखा गया।

मामला अगस्त 2017 में तमिलनाडु में कृषि भूमि को लेकर हुए विवाद से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार भूमि विवाद के दौरान पहले आरोपित और शिकायतकर्ता के बहनोई के बीच कहासुनी हुई। बाद में शिकायतकर्ता का भांजा भी इस विवाद में शामिल हो गया। जब शिकायतकर्ता बीच-बचाव करने पहुंचा तो आरोप है कि आरोपित ने उसे जातिसूचक शब्दों और अत्यंत अभद्र गालियों से अपमानित किया। इसके बाद वह अपने घर से एक धारदार बिलहुक (फालीनुमा हथियार) लेकर आया और शिकायतकर्ता पर हमला कर दिया।

हमले में शिकायतकर्ता के माथे, नाक और अंगूठे में गंभीर चोटें आईं। बाद में कराए गए सीटी स्कैन में उसकी नाक की हड्डी टूटने की पुष्टि हुई। इस आधार पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपित को भारतीय दंड संहिता की धारा 294(बी) (अश्लीलता), धारा 326 (गंभीर चोट पहुंचाना) और धारा 506(2) (आपराधिक धमकी) के तहत दोषी ठहराया। इसके साथ ही अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की संबंधित धाराओं में भी उसे दोषी माना गया।

बाद में मद्रास हाई कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत आरोपित को बरी कर दिया, लेकिन भारतीय दंड संहिता की धाराओं के अंतर्गत हुई दोषसिद्धि को बरकरार रखा। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न धाराओं के कानूनी पहलुओं का विस्तार से परीक्षण किया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कानून की दृष्टि में "अश्लीलता""अशिष्टता""गाली" और "अभद्र भाषा" समान अर्थ वाले शब्द नहीं हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी भी शब्द को केवल इसलिए अश्लील नहीं कहा जा सकता कि वह समाज में अस्वीकार्य या असभ्य माना जाता है। यदि किसी अभिव्यक्ति में कामुकता, यौन उत्तेजना उत्पन्न करने की प्रवृत्ति और लोगों के नैतिक चरित्र को भ्रष्ट करने की क्षमता नहीं है, तो वह आईपीसी की धारा 294(बी) के तहत अपराध नहीं बनती।

खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को यदि पूरी तरह सही भी मान लिया जाए, तब भी आरोपित द्वारा बोले गए शब्द केवल अपमानजनक और अभद्र थे, लेकिन वे कानून में निर्धारित अश्लीलता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। न्यायालय ने यह भी कहा कि धारा 294(बी) लागू करने के लिए यह साबित करना भी आवश्यक है कि सार्वजनिक स्थान पर ऐसे शब्दों के प्रयोग से अन्य लोगों को वास्तविक रूप से परेशानी या असुविधा हुई हो। इस मामले में ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।

इसी आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने अश्लीलता के आरोप में हुई दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया। साथ ही अदालत ने आईपीसी की धारा 506(2) के तहत आपराधिक धमकी के अपराध में भी आरोपित को राहत देते हुए कहा कि किसी विवाद के दौरान केवल धमकी भरे शब्द बोल देना पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह भी सिद्ध करना होगा कि आरोपित का उद्देश्य वास्तव में पीड़ित में भय उत्पन्न करना या उसे किसी कार्य के लिए बाध्य करना था। इस मामले में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं था, इसलिए इस धारा के तहत भी दोषसिद्धि को रद्द कर दिया गया।

हालांकि, गंभीर चोट पहुंचाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कोई राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि चिकित्सकीय साक्ष्य और शिकायतकर्ता के बयान एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं। मेडिकल रिपोर्ट में नाक की हड्डी टूटने की पुष्टि हुई, जो भारतीय दंड संहिता के अनुसार गंभीर चोट की श्रेणी में आती है। इसलिए धारा 326 के तहत हुई दोषसिद्धि पूरी तरह उचित है और उसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

सजा के निर्धारण पर विचार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा। अदालत ने कहा कि घटना भूमि विवाद के दौरान हुई थी तथा आरोपित की आयु लगभग 70 वर्ष है और उसकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी सामने आई हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय ने उसकी सजा में राहत देते हुए कारावास की अवधि को केवल अदालत उठने तक की सजा में परिवर्तित कर दिया। साथ ही उसे दो महीने के भीतर शिकायतकर्ता को 50 हजार रुपये का जुर्माना अदा करने का निर्देश दिया।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला भविष्य में अश्लीलता से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए महत्वपूर्ण नजीर साबित हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय के माध्यम से स्पष्ट कर दिया है कि हर अभद्र या अपमानजनक शब्द स्वतः अश्लील नहीं माना जाएगा। अश्लीलता सिद्ध करने के लिए कानून में निर्धारित सभी आवश्यक तत्वों का मौजूद होना अनिवार्य है। वहीं यदि किसी व्यक्ति द्वारा हिंसा कर गंभीर चोट पहुंचाई जाती है तो उसके लिए कानून के तहत कठोर दंड का प्रावधान यथावत लागू रहेगा। यह निर्णय अभिव्यक्ति, आपराधिक कानून और अश्लीलता की कानूनी परिभाषा के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-