नई दिल्ली. सोशल मीडिया पर इन दिनों एक खास नेजल स्प्रे तेजी से चर्चा का विषय बना हुआ है. ऑक्सीटोसिन नेजल स्प्रे को इंटरनेट पर कई यूजर्स "लव स्प्रे" और "कामदेव का तीर" जैसे नामों से प्रचारित कर रहे हैं. दावा किया जा रहा है कि इस स्प्रे की सिर्फ दो फुहारें गुस्सा कम कर सकती हैं, भरोसा बढ़ा सकती हैं और रिश्तों में फिर से प्यार जगा सकती हैं. हालांकि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का कहना है कि इस दावे को उतनी सरलता से स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि उपलब्ध शोध इसके प्रभाव को लेकर मिश्रित परिणाम दिखाते हैं.
ऑक्सीटोसिन एक ऐसा हार्मोन है जिसे आमतौर पर "लव हार्मोन" या "कडल हार्मोन" कहा जाता है. यह शरीर में स्वाभाविक रूप से तब निकलता है जब मां अपने शिशु को स्तनपान कराती है, जब लोग एक-दूसरे को गले लगाते हैं, किसी प्रिय व्यक्ति की आंखों में देखते हैं या फिर अपने पालतू जानवर के साथ समय बिताते हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार यह हार्मोन लोगों के बीच विश्वास बढ़ाने, सहानुभूति विकसित करने और सामाजिक संबंधों को मजबूत बनाने में भूमिका निभाता है.
ऑक्सीटोसिन नेजल स्प्रे को लेकर कहा जाता है कि इसे नाक के जरिए लेने पर यह सामान्य दवाओं की तरह पाचन तंत्र से होकर नहीं गुजरता, बल्कि सीधे मस्तिष्क तक पहुंचता है. इसी वजह से इसका प्रभाव लगभग 30 से 40 मिनट के भीतर महसूस किया जा सकता है. इस तकनीक पर विदेशों में कई क्लीनिकल ट्रायल किए जा चुके हैं, लेकिन अब तक सामने आए नतीजे एक जैसे नहीं रहे हैं. कुछ अध्ययनों में इसके सकारात्मक प्रभाव दिखाई दिए हैं, जबकि कुछ में इसकी सीमाएं भी सामने आई हैं.
रिश्तों से जुड़े उपचार यानी कपल थेरेपी में ऑक्सीटोसिन स्प्रे का उपयोग कुछ शोधों में किया गया है. इन अध्ययनों के अनुसार स्प्रे लेने के बाद कई लोगों ने बहस के दौरान कम आक्रामक व्यवहार किया और साथी की बात को अधिक ध्यान से सुना. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह हार्मोन आपसी संवाद को बेहतर बनाने में सीमित स्तर पर मदद कर सकता है.
कुछ शोध यह भी बताते हैं कि सोशल एंग्जायटी या ऑटिज्म से जुड़े मामलों में ऑक्सीटोसिन लोगों को दूसरों की भावनाओं को समझने में सहायता पहुंचा सकता है. वहीं चिकित्सा क्षेत्र में डॉक्टर लंबे समय से ऑक्सीटोसिन का उपयोग प्रसव के दौरान और स्तनपान में सहायता के लिए करते रहे हैं. इन चिकित्सीय उपयोगों का संबंध अस्पतालों में नियंत्रित परिस्थितियों से है.
हालांकि विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि ऑक्सीटोसिन स्प्रे किसी भी रिश्ते की सभी समस्याओं का समाधान नहीं है. इसका प्रभाव केवल लगभग दो घंटे तक रहने की बात कही जाती है. इसके बाद शरीर सामान्य स्थिति में लौट आता है. यदि किसी रिश्ते में विश्वास पूरी तरह टूट चुका है या गंभीर मतभेद हैं, तो केवल यह स्प्रे उन्हें ठीक नहीं कर सकता. कुछ मामलों में यह व्यक्ति की पहले से मौजूद पक्षपातपूर्ण सोच को और अधिक बढ़ा भी सकता है.
इस स्प्रे के संभावित दुष्प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. रिपोर्टों के अनुसार इसके उपयोग से नाक में जलन, सिरदर्द, मूड में बदलाव और रक्तचाप से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. यही कारण है कि विशेषज्ञ बिना चिकित्सकीय सलाह के इसका उपयोग करने से बचने की सलाह देते हैं.
भारत में इस स्प्रे की उपलब्धता को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं. मनोचिकित्सक डॉ. अनिर्बान बसु के अनुसार फिलहाल भारत में सीडीएससीओ (CDSCO) द्वारा किसी भी "रिलेशनशिप स्प्रे" को मंजूरी नहीं दी गई है. उन्होंने कहा कि ऑनलाइन बिक रहे ऐसे उत्पादों की गुणवत्ता संदिग्ध हो सकती है और डॉक्टर की सलाह के बिना उनका उपयोग नहीं करना चाहिए.
रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में एफडीए (FDA) और यूरोप में भी ऑक्सीटोसिन नेजल स्प्रे का उपयोग अभी केवल शोध कार्यों और कुछ विशेष चिकित्सीय स्थितियों तक सीमित है. इसे सामान्य तौर पर रिश्तों को बेहतर बनाने वाली दवा के रूप में स्वीकृति नहीं मिली है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति अपने रिश्तों में स्वाभाविक रूप से ऑक्सीटोसिन का स्तर बढ़ाना चाहता है, तो इसके लिए किसी स्प्रे की आवश्यकता नहीं है. वे सलाह देते हैं कि अपने साथी को करीब 20 सेकंड तक गले लगाना, साथ मिलकर खाना बनाना, मोबाइल फोन से दूरी बनाकर कुछ मिनट आंखों में आंखें डालकर बातचीत करना या हाथ पकड़कर साथ टहलना जैसी छोटी-छोटी गतिविधियां शरीर में प्राकृतिक रूप से ऑक्सीटोसिन के स्राव को बढ़ाने में मदद कर सकती हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि ऑक्सीटोसिन नेजल स्प्रे विज्ञान की एक महत्वपूर्ण खोज जरूर है और भविष्य में अवसाद या पीटीएसडी (PTSD) जैसी कुछ मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों के उपचार में इसकी उपयोगिता बढ़ सकती है. लेकिन मौजूदा समय में किसी भी रिश्ते की नींव समय, विश्वास, संवाद और देखभाल पर ही टिकी रहती है. अब तक ऐसा कोई वैज्ञानिक विकल्प विकसित नहीं हुआ है जो इन मूलभूत तत्वों की जगह ले सके. सोशल मीडिया पर चाहे इसे "कामदेव का तीर" कहा जा रहा हो, लेकिन वैज्ञानिक समुदाय का स्पष्ट मत है कि किसी भी रिश्ते को मजबूत बनाने का सबसे प्रभावी तरीका आज भी आपसी विश्वास, सम्मान और निरंतर संवाद ही है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

