सुप्रीम कोर्ट का फैसला, पक्की नौकरी वाले सरकारी कर्मचारी को बिना विभागीय जांच नहीं निकाल सकते

सुप्रीम कोर्ट का फैसला, पक्की नौकरी वाले सरकारी कर्मचारी को बिना विभागीय जांच नहीं निकाल सकते

प्रेषित समय :22:38:05 PM / Mon, Jul 27th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली। सरकारी कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी स्थायी (कन्फर्म) सरकारी कर्मचारी को केवल नियुक्ति में कथित अनियमितता या गैर-कानूनी नियुक्ति के आरोप के आधार पर बिना विभागीय जांच किए नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी की सेवा नियमित हो चुकी है और उसे स्थायी कर्मचारी का दर्जा मिल चुका है, तो उसकी सेवाएं समाप्त करने से पहले संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विभागीय जांच के बिना की गई बर्खास्तगी संविधान प्रदत्त सुरक्षा का उल्लंघन मानी जाएगी।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने यह फैसला ओडिशा के जगतसिंहपुर जिला एवं सत्र न्यायाधीश कार्यालय में कार्यरत कॉपीइस्ट कर्मचारियों की सेवा समाप्ति से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों की सेवाएं बहाल करते हुए कहा कि किसी कर्मचारी का स्थायी होना मात्र प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह उसे विधिक और संवैधानिक संरक्षण प्रदान करता है। एक बार जब किसी कर्मचारी की सेवा की पुष्टि हो जाती है, तब उसकी नियुक्ति की वैधता पर उठाए गए प्रश्नों के आधार पर केवल प्रशासनिक आदेश जारी कर उसे सेवा से नहीं हटाया जा सकता।

सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह जांच करना आवश्यक है कि नियुक्ति में यदि कोई अनियमितता हुई भी थी तो उसके लिए संबंधित कर्मचारी जिम्मेदार था या नहीं। इसके साथ ही यह भी देखना होगा कि कथित अनियमितता इतनी गंभीर थी कि उसके आधार पर सेवा समाप्ति जैसी कठोर कार्रवाई उचित मानी जा सके। अदालत ने कहा कि इन सभी पहलुओं का निर्धारण केवल विभागीय जांच के माध्यम से ही किया जा सकता है और बिना जांच सीधे बर्खास्तगी कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकती।

खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 311(2) का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रावधान सरकारी कर्मचारियों को मनमानी कार्रवाई से बचाने के लिए बनाया गया है। इसके अनुसार किसी भी सरकारी कर्मचारी को बर्खास्त करने, सेवा से हटाने या पदावनत करने से पहले उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों की जानकारी देना, विभागीय जांच कराना तथा उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर देना अनिवार्य है। यह संवैधानिक सुरक्षा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान में कुछ सीमित परिस्थितियों में विभागीय जांच की अनिवार्यता से छूट दी गई है। यदि किसी कर्मचारी को किसी आपराधिक मामले में दोषी ठहराया जा चुका हो, या सक्षम प्राधिकारी लिखित रूप में यह दर्ज करे कि विभागीय जांच कराना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है, अथवा राष्ट्रपति या राज्यपाल राज्य की सुरक्षा के हित में जांच को अनुचित मानें, तभी जांच के बिना कार्रवाई की जा सकती है। इन अपवादों के अलावा सामान्य परिस्थितियों में विभागीय जांच किए बिना सेवा समाप्त नहीं की जा सकती।

मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो अपीलकर्ताओं की नियुक्ति ओडिशा के जगतसिंहपुर जिला एवं सत्र न्यायाधीश कार्यालय में जूनियर क्लर्क-कम-कॉपीइस्ट के रूप में हुई थी। नियुक्ति के बाद उनकी सेवाओं की पुष्टि भी कर दी गई थी और वे नियमित रूप से कार्य कर रहे थे। कुछ समय बाद उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि उनकी नियुक्तियां भर्ती अधिसूचना में विज्ञापित रिक्त पदों से अधिक पदों पर की गई थीं, इसलिए वे अवैध और अनियमित हैं। इसके बाद प्रशासन ने यह कहते हुए उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं कि जिन पदों पर उनकी नियुक्ति हुई, वे स्वीकृत पद नहीं थे और इसलिए उनकी नियुक्ति प्रारंभ से ही शून्य मानी जाएगी।

सेवा समाप्त किए जाने के बाद कर्मचारियों ने पहले हाई कोर्ट की अधीनस्थ न्यायालयों की अपील समिति के समक्ष चुनौती दी। तीन न्यायाधीशों वाली इस समिति ने उनकी अपील खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की, लेकिन वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली। अंततः मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां सर्वोच्च अदालत ने पूरे घटनाक्रम और संवैधानिक प्रावधानों की विस्तार से समीक्षा की।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया में कोई अनियमितता हुई थी तो उसके लिए जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है। यदि संबंधित कर्मचारी ने किसी प्रकार की धोखाधड़ी, गलत जानकारी या नियमों का उल्लंघन नहीं किया है और नियुक्ति सक्षम प्राधिकारी द्वारा की गई थी, तो केवल प्रशासनिक त्रुटि का खामियाजा कर्मचारी को भुगतने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि सेवा की पुष्टि होने के बाद कर्मचारी के अधिकार और अधिक मजबूत हो जाते हैं तथा उन्हें संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हो जाता है।

अदालत ने यह भी दोहराया कि सरकारी सेवा में स्थायित्व का उद्देश्य कर्मचारियों को निष्पक्ष, स्वतंत्र और सुरक्षित वातावरण में कार्य करने का अवसर देना है। यदि बिना विभागीय जांच के किसी भी समय केवल प्रशासनिक आदेश के आधार पर स्थायी कर्मचारी की सेवाएं समाप्त की जाने लगें, तो इससे संविधान द्वारा प्रदत्त सुरक्षा का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। इसलिए सेवा समाप्ति जैसे गंभीर निर्णय में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना प्रत्येक सरकारी विभाग और प्राधिकरण की जिम्मेदारी है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को सरकारी कर्मचारियों के सेवा अधिकारों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में उन मामलों के लिए भी मार्गदर्शक बनेगा, जहां नियुक्ति प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं का हवाला देकर स्थायी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रशासनिक निर्णय भी संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर ही लिए जा सकते हैं तथा किसी कर्मचारी को उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

इस निर्णय के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं को राहत प्रदान करते हुए उनकी सेवा बहाल करने का आदेश दिया और यह सिद्धांत स्थापित किया कि एक बार सरकारी कर्मचारी की सेवा नियमित और स्थायी हो जाने के बाद उसकी बर्खास्तगी केवल विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए ही की जा सकती है। बिना विभागीय जांच और बिना उचित अवसर दिए की गई सेवा समाप्ति न केवल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 311(2) में निहित सुरक्षा का भी स्पष्ट उल्लंघन है। यह फैसला भविष्य में सरकारी सेवाओं से जुड़े विवादों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल के रूप में देखा जाएगा।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-