ग्वालियर. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि कोई दोषी पहले से ही किसी अन्य आपराधिक मामले में न्यायिक हिरासत में है, तो किसी पुराने मामले में सजा के अस्थायी निलंबन (सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस) की अवधि समाप्त होने के बाद उसे दोबारा औपचारिक रूप से सरेंडर करने की आवश्यकता नहीं है. अदालत ने कहा कि कानून निरर्थक और औपचारिक प्रक्रियाओं पर जोर नहीं देता तथा जेल प्रशासन की लापरवाही के कारण किसी कैदी को जेल में बिताई गई वास्तविक अवधि का लाभ नहीं छीना जा सकता. न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के की एकलपीठ ने यह फैसला रंकू बनाम मध्य प्रदेश शासन (WP-6514-2022) मामले में सुनाया.
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता को वर्ष 2007 में हत्या के एक मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. सजा के विरुद्ध दायर अपील लंबित रहने के दौरान उसकी सजा निलंबित कर अंतरिम जमानत दे दी गई थी. बाद में 22 मार्च 2013 को हाई कोर्ट ने सजा के निलंबन की अवधि तीन माह के लिए और बढ़ा दी थी. इसी अवधि के दौरान याचिकाकर्ता को हत्या के एक अन्य मामले में दोषी ठहराया गया और उसने 12 अप्रैल 2013 को ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. इसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया और वह लगातार जेल में बंद रहा.
वर्षों बाद जब पहले मामले की अपील का निर्णय हुआ और याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की तैयारी की, तब उसने जेल से कस्टडी प्रमाणपत्र मांगा. इस दौरान उसे पता चला कि जेल अधिकारियों ने 12 अप्रैल 2013 से 8 अगस्त 2018 तक की अवधि को पहले मामले की सजा में शामिल ही नहीं किया. अधिकारियों ने इस अवधि को केवल दूसरे मामले की न्यायिक हिरासत मानते हुए पहले मामले के रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया था.
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि दूसरे मामले में आत्मसमर्पण करने के बाद वह लगातार न्यायिक हिरासत में रहा और उसकी स्वतंत्रता पहले ही समाप्त हो चुकी थी. इसलिए पहले मामले में सजा निलंबन का आदेश स्वतः अप्रासंगिक हो गया था. ऐसे में केवल प्रशासनिक त्रुटि के कारण उसे पांच वर्ष से अधिक समय तक जेल में बिताई गई अवधि का लाभ न देना कानून और न्याय दोनों के विपरीत है.
वहीं राज्य शासन ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता भले ही जेल में था, लेकिन उसकी हिरासत केवल दूसरे मामले से संबंधित थी. राज्य का कहना था कि पहले मामले में सजा निलंबन की अवधि समाप्त होने के बाद उसे अलग से औपचारिक सरेंडर करना चाहिए था. ऐसा नहीं करने के कारण वह उस अवधि को पहले मामले की सजा में जोड़ने का अधिकारी नहीं है.
हाई कोर्ट ने राज्य के इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि सरेंडर की अवधारणा तभी लागू होती है जब कोई व्यक्ति जमानत या सजा निलंबन के कारण स्वतंत्र हो और उसे दोबारा अदालत के समक्ष प्रस्तुत होना पड़े. लेकिन यदि कोई व्यक्ति पहले से ही न्यायिक हिरासत में है, तो दोबारा औपचारिक सरेंडर की अपेक्षा करना केवल एक निरर्थक औपचारिकता होगी. अदालत ने कहा कि कानून ऐसी बेमानी प्रक्रिया को न तो अनिवार्य बनाता है और न ही उसका पालन करने के लिए बाध्य करता है.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 389 के तहत सजा निलंबित करने का उद्देश्य केवल दोषी को अपील लंबित रहने तक जेल से बाहर रखना होता है. एक बार जब वह किसी अन्य मामले में न्यायिक हिरासत में चला जाता है, तो सजा निलंबन के आधार पर मिली स्वतंत्रता स्वतः समाप्त हो जाती है. ऐसी स्थिति में अलग से आत्मसमर्पण का प्रश्न ही नहीं उठता.
मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ जेल मैनुअल के नियम 288 और 290 का उल्लेख करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि एक से अधिक मामलों में बंद कैदियों का सही रिकॉर्ड बनाए रखना जेल प्रशासन की वैधानिक जिम्मेदारी है. यदि रिकॉर्ड संधारण में कोई त्रुटि हुई है तो उसका दुष्परिणाम कैदी को नहीं भुगतना चाहिए. न्यायालय ने कहा कि सजा के क्रियान्वयन और न्यायिक हिरासत दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं तथा प्रशासनिक चूक किसी व्यक्ति के कानूनी और संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित नहीं कर सकती.
इन सभी तथ्यों पर विचार करते हुए हाई कोर्ट ने याचिका स्वीकार कर राज्य सरकार और संबंधित जेल अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की सजा की गणना में विवादित अवधि को भी शामिल किया जाए तथा कस्टडी रिकॉर्ड में आवश्यक संशोधन कर वास्तविक अवधि का पूरा लाभ दिया जाए. अदालत का यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है, जहां एक से अधिक मामलों में न्यायिक हिरासत और सजा की गणना को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं.
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