मुंबई. बॉम्बे हाईकोर्ट ने सेवा कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ट्रांसपोर्ट अलाउंस के लिए यात्रा दूरी का गलत दावा करना अपने आप में नियोक्ता के धन के गबन (Misappropriation) के बराबर नहीं माना जा सकता. अदालत ने कहा कि प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए तथा केवल गलत दावा होने मात्र से कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त करना उचित नहीं ठहराया जा सकता.
न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने ने यह फैसला अनंता राजाराम वालुंज बनाम ग्रुपो एंटोलिन पुणे प्राइवेट लिमिटेड (Writ Petition No. 12101 of 2019) में सुनाया. अदालत ने इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द करते हुए कर्मचारी की बर्खास्तगी को गैर-कानूनी और अमान्य घोषित कर दिया. हालांकि, कर्मचारी की पुनर्नियुक्ति का आदेश देने के बजाय अदालत ने उसे 8 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया.
मामले के अनुसार, कर्मचारी पर जनवरी 2011 से जून 2012 के बीच यात्रा दूरी का गलत विवरण देकर 17,868 रुपये का अतिरिक्त ट्रांसपोर्ट अलाउंस प्राप्त करने का आरोप लगाया गया था. इस आरोप के आधार पर कंपनी ने उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया था.
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि नियोक्ता स्वयं कर्मचारी के निवास स्थान से कार्यस्थल तक की वास्तविक यात्रा दूरी को लेकर स्पष्ट नहीं था. कंपनी समय-समय पर अलग-अलग दूरी के आधार पर ट्रांसपोर्ट अलाउंस के दावों को स्वीकार करती रही थी, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि दूरी निर्धारण को लेकर स्वयं नियोक्ता का रुख एकरूप नहीं था.
अदालत ने यह भी पाया कि विभागीय जांच के दौरान महत्वपूर्ण साक्ष्यों तथा वैकल्पिक मार्ग से संबंधित गवाही पर समुचित विचार नहीं किया गया. न्यायालय ने माना कि जांच प्रक्रिया में उपलब्ध महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी की गई, जिससे निष्कर्ष प्रभावित हुआ.
हाईकोर्ट ने कर्मचारी के पूर्व सेवा रिकॉर्ड पर भी ध्यान दिया और कहा कि उसका रिकॉर्ड पूरी तरह साफ-सुथरा था तथा उसके विरुद्ध पहले किसी प्रकार की अनुशासनात्मक कार्रवाई का उल्लेख नहीं था. अदालत के अनुसार, मामले में कई ऐसी परिस्थितियां मौजूद थीं जो कर्मचारी को राहत देने के पक्ष में थीं.
इन तथ्यों को देखते हुए न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने ने कहा कि आरोप सिद्ध होने की स्थिति में भी सेवा से बर्खास्त करने जैसी कठोर सजा आरोप की गंभीरता की तुलना में अत्यधिक और असंगत थी. अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक गलत दावा स्वतः गबन या नियोक्ता के धन के दुरुपयोग की श्रेणी में नहीं आता. यदि मामले के तथ्यों से यह प्रतीत हो कि नियोक्ता स्वयं भ्रम की स्थिति में था और कर्मचारी के विरुद्ध राहत देने वाली परिस्थितियां मौजूद हैं, तो न्यायालय सजा की आनुपातिकता (Doctrine of Proportionality) की कसौटी पर हस्तक्षेप कर सकता है.
इसी आधार पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द करते हुए कर्मचारी की बर्खास्तगी को अवैध घोषित किया. हालांकि, लंबे समय के अंतराल और अन्य परिस्थितियों को देखते हुए पुनर्नियुक्ति का आदेश देने के बजाय अदालत ने कंपनी को कर्मचारी को 8 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया.
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय सेवा कानून में "अनुपातिक दंड" (Proportional Punishment) के सिद्धांत को और मजबूत करता है. अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रत्येक गलत दावा अपने आप में गबन नहीं माना जा सकता और यदि दंड आरोप की गंभीरता की तुलना में अत्यधिक कठोर हो, तो न्यायालय उसमें हस्तक्षेप कर कर्मचारी को राहत प्रदान कर सकता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

