जबलपुर. साइबर फ्रॉड की शिकायतों के बाद बैंक खातों को फ्रीज करने की प्रक्रिया को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी खाते में संदिग्ध राशि सीमित और स्पष्ट रूप से चिन्हित है, तो पूरे बैंक खाते को फ्रीज करना सामान्य प्रक्रिया नहीं हो सकती. न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने अर्चना बनाम मध्यप्रदेश शासन एवं अन्य (रिट याचिका क्रमांक 29117/2026) की सुनवाई के दौरान यह निर्णय देते हुए साइबर अपराध से जुड़े मामलों में बैंक खाते फ्रीज करने की प्रक्रिया को पारदर्शी, संतुलित और समयबद्ध बनाने के लिए 23 विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं. साथ ही राज्य सरकार को आदेश दिया है कि इन दिशा-निर्देशों की प्रति प्रदेश के सभी बैंकों, पुलिस थानों, साइबर क्राइम पुलिस स्टेशनों और जांच एजेंसियों को भेजी जाए, ताकि इनका समान रूप से पालन सुनिश्चित हो सके.
अदालत के समक्ष दायर याचिका में बैंक खाते पर लगाई गई रोक को चुनौती देते हुए शिकायत निवारण प्रक्रिया, बैंकों की भूमिका और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए थे. सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि यह समस्या केवल एक याचिकाकर्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में बड़ी संख्या में खाताधारक ऐसे मामलों का सामना कर रहे हैं, जहां साइबर फ्रॉड की शिकायत के बाद पूरे बैंक खाते को फ्रीज कर दिया जाता है. न्यायालय ने कहा कि ऐसी स्थिति में नागरिकों के व्यापार करने के अधिकार, संपत्ति के अधिकार और जांच एजेंसियों की वैधानिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है.
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जांच एजेंसी को सबसे पहले कथित संदिग्ध राशि की पहचान करनी चाहिए और जहां तक संभव हो केवल उसी राशि पर लियन अथवा डेबिट फ्रीज लगाया जाना चाहिए. पूरे बैंक खाते को फ्रीज करना केवल असाधारण परिस्थितियों में ही उचित होगा. यदि जांच अधिकारी ऐसा आवश्यक समझता है तो उसे इसके स्पष्ट और ठोस कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे. अदालत ने कहा कि पूरे खाते को फ्रीज करने से खाताधारक के वैध वित्तीय लेन-देन, व्यवसाय और व्यक्तिगत गतिविधियां प्रभावित होती हैं, इसलिए इस शक्ति का प्रयोग विवेकपूर्ण और अनुपातिक तरीके से किया जाना चाहिए.
न्यायालय ने बैंकों की भूमिका को भी अत्यंत महत्वपूर्ण बताया. अदालत ने कहा कि बैंक केवल जांच एजेंसी के निर्देशों का पालन करने वाली संस्था नहीं हैं, बल्कि शिकायत निवारण प्रक्रिया का पहला और सबसे महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं. यदि किसी खाते पर रोक लगाई जाती है तो संबंधित बैंक खाताधारक को तत्काल इसकी सूचना देगा, कार्रवाई का आधार बताएगा, संबंधित जांच एजेंसी की जानकारी उपलब्ध कराएगा तथा शिकायत निवारण की पूरी प्रक्रिया समझाएगा. केवल खाताधारक को पुलिस अथवा अदालत जाने की सलाह देकर बैंक अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते. उन्हें शिकायत दर्ज कराने और निर्धारित प्रक्रिया पूरी कराने में सक्रिय सहयोग करना होगा.
हाईकोर्ट ने शिकायतों के निस्तारण के लिए समयबद्ध व्यवस्था भी निर्धारित की है. आदेश के अनुसार खाताधारक आवश्यक दस्तावेजों के साथ संबंधित बैंक शाखा में शिकायत प्रस्तुत करेगा. शिकायत प्राप्त होने के बाद बैंक ग्राहक के दस्तावेजों का सत्यापन करेगा और सात दिनों के भीतर उसे सीएफसीएफआरएमएस पोर्टल पर अपलोड करेगा. इसके बाद जांच अधिकारी को 15 दिनों के भीतर शिकायत का परीक्षण कर कारणयुक्त निर्णय देना होगा. यदि शिकायत स्वीकार की जाती है तो बैंक को यथासंभव 48 घंटे के भीतर खाते पर लगी रोक हटानी होगी और इसकी जानकारी पोर्टल पर दर्ज करनी होगी.
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जांच अधिकारी यथासंभव इलेक्ट्रॉनिक माध्यम अथवा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सत्यापन करेगा और सामान्य परिस्थितियों में खाताधारक को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा. व्यक्तिगत उपस्थिति केवल उन्हीं मामलों में आवश्यक होगी, जहां प्राथमिकी दर्ज हो चुकी हो, जांच के लिए उपस्थिति अनिवार्य हो और उसके कारण लिखित रूप में दर्ज किए गए हों. जांच अधिकारी को धनराशि के स्रोत, व्यवसाय की प्रकृति, बैंकिंग लेन-देन के स्वरूप तथा विवादित राशि और कथित अपराध के बीच संबंध का भी परीक्षण करना होगा.
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल संदेह के आधार पर किसी बैंक खाते को अनिश्चितकाल तक फ्रीज नहीं रखा जा सकता. यदि रोक जारी रखना आवश्यक हो तो जांच अधिकारी को समय-समय पर इसकी समीक्षा करनी होगी कि यह कार्रवाई अब भी आवश्यक और अनुपातिक है या नहीं. साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि जहां कम प्रतिबंधात्मक उपायों से जांच का उद्देश्य पूरा हो सकता है, वहां वैध व्यावसायिक गतिविधियों को अनावश्यक रूप से बाधित न किया जाए.
अदालत ने आगे कहा कि यदि जांच अधिकारी के निर्णय से खाताधारक संतुष्ट नहीं है तो वह जिला शिकायत निवारण अधिकारी के समक्ष पुनर्विचार का आवेदन प्रस्तुत कर सकता है. जिला शिकायत निवारण अधिकारी शिकायत, उपलब्ध दस्तावेजों और जांच अधिकारी द्वारा दर्ज कारणों की स्वतंत्र समीक्षा करेगा. यदि किसी शिकायत पर 90 दिनों तक कोई अंतिम निर्णय नहीं होता और जांच एजेंसी अथवा सक्षम न्यायालय की ओर से रोक जारी रखने का कोई वैध आदेश प्राप्त नहीं होता, तो बैंक निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए खाते से रोक हटाने की कार्रवाई करेगा.
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बैंक खाता फ्रीज करना एक असाधारण उपाय है और इसे यांत्रिक अथवा नियमित प्रक्रिया के रूप में नहीं अपनाया जा सकता. जांच एजेंसी को कथित अपराध से जुड़ी राशि और खाते में मौजूद वैध धनराशि के बीच स्पष्ट अंतर करना होगा तथा केवल उतनी ही रोक लगानी होगी, जितनी जांच के उद्देश्य की पूर्ति के लिए आवश्यक हो. अदालत ने यह भी कहा कि खाते को फ्रीज करने का प्रत्येक आदेश संक्षिप्त लेकिन स्पष्ट कारणों पर आधारित होना चाहिए, ताकि आवश्यकता पड़ने पर उसकी प्रभावी न्यायिक समीक्षा की जा सके.
Case Title: Archana vs. The State of Madhya Pradesh and Others
Date of Order: July 27, 2026
Bench: Justice Himanshu Joshi
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

