जबलपुर हाईकोर्ट में उम्रकैद की सजा को चुनौती, डीएनए रिपोर्ट में मिली गलती, 5 साल में तैयार 20 प्रतिशत जांच विशेषज्ञों से कराने के निर्देश

जबलपुर हाईकोर्ट में उम्रकैद की सजा को चुनौती, डीएनए रिपोर्ट में मिली गलती, 5 साल में तैयार 20 प्रतिशत जांच विशेषज्ञों से कराने के निर्देश

प्रेषित समय :14:42:10 PM / Thu, Aug 6th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर। एमपी के नर्मदापुरम में रहने वाले पंकज कुमार बिंदोलिया ने हाईकोर्ट में याचिका दायर करते हुए आपराधिक मामले में पॉक्सो विशेष न्यायालय द्वारा 16 मार्च 2026 को सुनाई गई उम्रकैद की सजा को चुनौती दी है। सुनवाई के दौरान सामने आया कि 31 दिसंबर 2024 को एफएसएल भोपाल द्वारा जारी डीएनए रिपोर्ट में गलत व्यक्ति का नाम दर्ज था। इस गंभीर त्रुटि के बाद हाईकोर्ट ने एफएसएल की प्रभारी निदेशक को व्यक्तिगत रूप से तलब किया, इसके साथ ही मुख्य सचिव को 7 दिन में बाहरी विशेषज्ञ समिति गठित करने के निर्देश दिए।
                             हाईकोर्ट ने भोपाल स्थित राज्य फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (स्नस्रु) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए पिछले पांच वर्षों में तैयार हुई डीएनए एवं अन्य वैज्ञानिक रिपोर्टों में से 20 प्रतिशत रिपोर्टों की रेंडम जांच कराने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिए हैं कि वे 7 दिनों के भीतर प्रदेश के बाहर के तीन वैज्ञानिक अधिकारियों की स्वतंत्र समिति गठित करें, जो इन रिपोर्टों की जांच करेगी। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस विवेक जैन की विशेष खंडपीठ ने कहा कि यदि एक मामले में कट-पेस्ट जैसी गंभीर गलती सामने आई है तो यह जानना आवश्यक है कि कहीं अन्य मामलों में भी ऐसी त्रुटियां तो नहीं हुईं। मामले की अगली सुनवाई 14 अगस्त को होगी। एफएसएल की प्रभारी निदेशक डॉ. हर्षा सिंह आज अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुईं। उन्होंने स्वीकार किया कि डीएनए रिपोर्ट में गलत नाम दर्ज होना कट-पेस्ट की वजह से हो सकता है। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि इस तरह की लापरवाही स्वीकार की जाती है तो डीएनए क्रोमोसोम के मिलान जैसे अत्यंत संवेदनशील वैज्ञानिक आंकड़ों की विश्वसनीयता भी संदेह के घेरे में आ जाती है। अदालत ने कहा कि इससे न केवल फोरेंसिक जांच प्रणाली बल्कि न्यायालय में प्रस्तुत वैज्ञानिक साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्न उठते हैं। हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि पिछले 5 वर्षों में तैयार हुई डीएनए और अन्य वैज्ञानिक रिपोर्टों में से 20 प्रतिशत रिपोर्टों का रेंडम चयन कर प्रदेश के बाहर के तीन विशेषज्ञ वैज्ञानिक अधिकारियों की समिति से जांच कराई जाए। अदालत ने यह पूरी प्रक्रिया 6 महीने के भीतर पूरी करने के निर्देश दिए हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रभारी निदेशक डॉ. हर्षा सिंह से उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि के संबंध में भी सवाल किए। उन्होंने बताया कि उनका विषय बायोलॉजी या बायोकैमिस्ट्री नहीं है। इस पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि एफएसएल के निदेशक पद पर फोरेंसिक साइंस, बायोलॉजी, बायोकैमिस्ट्री या संबंधित विषयों के विशेषज्ञों की नियुक्ति पर गंभीरता से विचार किया जाए, ताकि वैज्ञानिक संस्थान की कार्यप्रणाली और विश्वसनीयता बनी रहे।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-