जबलपुर. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए एक पूर्व सिविल जज की सेवा से बर्खास्तगी को बरकरार रखा है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक स्वतंत्रता का अर्थ न्यायिक प्रतिरक्षा नहीं है. यदि कोई न्यायिक अधिकारी कानून के स्थापित सिद्धांतों और वैधानिक प्रावधानों की जानकारी होने के बावजूद उनका जानबूझकर या लापरवाही पूर्ण तरीके से उल्लंघन करते हुए न्यायिक शक्ति का इस्तेमाल करता है, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा सकती है. जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की खंडपीठ ने पूर्व सिविल जज द्वारा दायर याचिका खारिज करते हुए 13 मार्च 2015 के बर्खास्तगी आदेश को बरकरार रखा.
मामला मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा में सिविल जज प्रथम श्रेणी के पद पर कार्यरत रहे अधिकारी से जुड़ा है, जिनकी पोस्टिंग शहडोल जिले के ब्यौहारी में थी. उनके कार्यकाल के दौरान पारित दो न्यायिक आदेशों को लेकर हाईकोर्ट के प्रशासनिक पक्ष का ध्यान गया. प्रारंभिक जांच के बाद प्रशासनिक समिति ने प्रथमदृष्टया इसे कदाचार का मामला मानते हुए नियमित विभागीय जांच शुरू की. अधिकारी के खिलाफ दो आरोप तय किए गए थे. विभागीय जांच पूरी होने के बाद दोनों आरोप प्रमाणित पाए गए. इसके बाद प्रशासनिक समिति और हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने भी जांच के निष्कर्षों से सहमति जताते हुए सेवा से बर्खास्तगी की सिफारिश की थी. राज्य सरकार ने इसी सिफारिश के आधार पर 13 मार्च 2015 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया था.
पहला आरोप वर्ष 2012 के एक वन अपराध मामले से जुड़ा था. वन विभाग ने अवैध रूप से रेत के परिवहन में इस्तेमाल किए जाने के आरोप में एक ट्रैक्टर और ट्रॉली जब्त की थी. संबंधित वाहन के संबंध में भारतीय वन अधिनियम के तहत जब्ती की कार्रवाई पहले ही शुरू हो चुकी थी और इसकी जानकारी संबंधित मजिस्ट्रेट को भी दी गई थी. इसी वाहन को अंतरिम रूप से छोड़े जाने की मांग पहले भी की गई थी, लेकिन मजिस्ट्रेट ने आवेदन खारिज कर दिया था. इसके बाद पुनरीक्षण अदालत ने भी राहत नहीं दी और मामला हाईकोर्ट तक पहुंचने के बाद भी वाहन छोड़ने की अनुमति नहीं मिली. इसके बावजूद तत्कालीन सिविल जज ने उसी दावेदार की ओर से वाहन की रिहाई के लिए दोबारा दाखिल आवेदन पर सुनवाई की और ट्रैक्टर-ट्रॉली को सुपुर्दगी पर छोड़ने का आदेश दे दिया.
विभागीय कार्रवाई में आरोप लगाया गया कि न्यायिक अधिकारी को पहले से चल रही जब्ती कार्यवाही और पूर्व में दिए गए न्यायिक आदेशों की पूरी जानकारी थी. इसके बावजूद उन्होंने उसी वाहन की रिहाई का आदेश दिया. विभागीय जांच अधिकारी ने माना कि न्यायिक अधिकारी ने स्थापित कानूनी सिद्धांतों और जब्ती की वैधानिक व्यवस्था की अनदेखी करते हुए न्यायिक शक्ति का इस्तेमाल किया. हाईकोर्ट ने भी बाद में इस पहलू पर विचार करते हुए कहा कि मामला केवल किसी कानूनी प्रावधान की अलग व्याख्या का नहीं था, बल्कि न्यायिक विवेक के इस्तेमाल की परिस्थितियों का था.
दूसरा आरोप मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम से जुड़े आपराधिक मामले से संबंधित था. इस मामले में आरोपी ने अपना अपराध स्वीकार किया था और तत्कालीन न्यायिक अधिकारी ने उसके दोष स्वीकार करने के आधार पर उसे दोषी ठहराया. इसके बाद एक अन्य व्यक्ति राधिका प्रसाद तिवारी के कथित रूप से अपराध में शामिल होने की बात सामने आने पर उसे नोटिस जारी किया गया. कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार उस व्यक्ति के खिलाफ न तो कोई प्राथमिकी दर्ज थी, न जांच हुई थी, न पुलिस रिपोर्ट या आरोप पत्र दाखिल हुआ था और न ही उसके खिलाफ संज्ञान लेने का कोई आदेश पारित हुआ था. इसके बावजूद उसे नोटिस जारी किया गया और बाद में उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति के बिना ही कार्यवाही को समाप्त कर दिया गया.
विभागीय जांच में इस प्रक्रिया को आपराधिक न्यायशास्त्र और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के विपरीत माना गया. जांच अधिकारी ने दोनों आरोपों को प्रमाणित पाया और निष्कर्ष निकाला कि न्यायिक अधिकारी ने स्थापित कानूनी सिद्धांतों की स्पष्ट अवहेलना करते हुए न्यायिक शक्तियों का इस्तेमाल किया. प्रशासनिक समिति ने इन निष्कर्षों को स्वीकार किया और बर्खास्तगी की सिफारिश की. इसके बाद हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने भी सिफारिश को मंजूरी दी और राज्य सरकार ने सेवा से बर्खास्तगी का आदेश जारी किया.
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज शर्मा ने तर्क दिया कि विभागीय कार्रवाई केवल दो न्यायिक आदेशों पर आधारित थी और किसी भी पक्ष ने भ्रष्टाचार, रिश्वत, बाहरी प्रभाव या किसी अनुचित लाभ का आरोप नहीं लगाया था. उनका कहना था कि यदि न्यायिक आदेश कानूनी रूप से गलत भी थे, तो उन्हें अपील या पुनरीक्षण के माध्यम से चुनौती दी जा सकती थी, लेकिन केवल कानूनी गलती को कदाचार नहीं माना जा सकता. याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि न्यायिक अधिकारियों को स्वतंत्र होकर निर्णय लेने की संवैधानिक स्वतंत्रता प्राप्त है और हर न्यायिक त्रुटि को विभागीय कार्रवाई का आधार बनाने से न्यायिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी.
याचिकाकर्ता ने उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सद्भावनापूर्ण न्यायिक त्रुटि को विभागीय कदाचार नहीं माना जा सकता. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बर्खास्तगी जैसी कठोर सजा अनुपातहीन है. दूसरी ओर राज्य और हाईकोर्ट की ओर से कहा गया कि अधिकारी को केवल इसलिए दंडित नहीं किया गया कि उनके आदेश कानूनी रूप से गलत थे, बल्कि इसलिए कार्रवाई हुई क्योंकि उन्होंने स्थापित वैधानिक प्रावधानों और न्यायिक प्रक्रिया की जानबूझकर अनदेखी की. राज्य की ओर से उच्चतम न्यायालय के भारत संघ बनाम के.के. धवन मामले में निर्धारित सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा गया कि न्यायिक या अर्ध-न्यायिक कार्य करने वाले अधिकारी के खिलाफ भी कार्रवाई संभव है, जब उनका आचरण लापरवाही, कानून की जानबूझकर अनदेखी या न्यायिक शक्ति के अनुचित इस्तेमाल की श्रेणी में आता है.
खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता संविधान की मूल विशेषता है और किसी न्यायिक आदेश की महज कानूनी गलत व्याख्या के आधार पर अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई नहीं की जा सकती. लेकिन न्यायिक स्वतंत्रता को न्यायिक प्रतिरक्षा के बराबर नहीं माना जा सकता. उच्चतम न्यायालय के के.के. धवन मामले में निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार, जब कोई न्यायिक अधिकारी लापरवाहीपूर्ण तरीके से या वैधानिक प्रावधानों की सचेत अवहेलना करते हुए न्यायिक शक्ति का प्रयोग करता है, तो विभागीय कार्रवाई का रास्ता खुला रहता है.
पहले आरोप पर हाईकोर्ट ने पाया कि जब्ती की कार्यवाही पहले ही शुरू हो चुकी थी और वाहन की रिहाई के लिए पूर्व में किए गए प्रयास भी खारिज हो चुके थे. इसके बावजूद उसी वाहन को दोबारा छोड़ने का आदेश दिया गया. कोर्ट ने माना कि विभागीय प्राधिकारी ने केवल न्यायिक आदेश की वैधानिक शुद्धता पर सवाल नहीं उठाया था, बल्कि उन परिस्थितियों की भी जांच की थी जिनमें न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किया गया.
दूसरे आरोप को लेकर कोर्ट ने और गंभीर टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि जिस व्यक्ति के खिलाफ न शिकायत थी, न प्राथमिकी, न आरोप पत्र और न संज्ञान का आदेश, उसे नोटिस जारी किया गया और उसके उपस्थित हुए बिना कार्यवाही समाप्त कर दी गई. हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के रूप में देखा और कहा कि इससे संबंधित व्यक्ति को अनावश्यक रूप से परेशान किए जाने का पहलू सामने आता है. कोर्ट ने माना कि इस पूरे तरीके से न्यायिक अधिकारी के आचरण पर गंभीर सवाल उठते हैं.
कोर्ट ने विभागीय जांच की प्रक्रिया को भी उचित माना. रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि अधिकारी को आरोपों का जवाब देने का पर्याप्त अवसर दिया गया था. उन्होंने विभागीय जांच में हिस्सा लिया, गवाहों से जिरह की, दस्तावेज प्रस्तुत किए और लिखित दलीलें भी दीं. हाईकोर्ट ने नियम 14(18) के अनुपालन को भी सही पाया और कहा कि जांच अधिकारी ने आरोपों से संबंधित परिस्थितियों पर अधिकारी से पूछताछ कर उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया था.
बर्खास्तगी की सजा को अनुपातहीन बताए जाने की दलील भी हाईकोर्ट ने खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी, प्रशासनिक समिति और पूर्ण पीठ ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का स्वतंत्र रूप से परीक्षण करने के बाद दोनों आरोपों को प्रमाणित माना और न्यायिक सेवा में बने रहने के लिए अधिकारी को अनुपयुक्त पाया. न्यायिक अधिकारियों से सर्वोच्च स्तर की सत्यनिष्ठा, औचित्य और न्यायिक अनुशासन की अपेक्षा होती है. इसलिए बर्खास्तगी की सजा को मनमानी या ऐसी अनुपातहीन सजा नहीं कहा जा सकता, जिसमें हाईकोर्ट के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो.
इस आधार पर हाईकोर्ट ने पूर्व सिविल जज की याचिका खारिज कर दी और 13 मार्च 2015 के बर्खास्तगी आदेश को बरकरार रखा. अदालत ने मामले में किसी भी पक्ष के पक्ष में लागत लगाने का आदेश नहीं दिया. फैसले में स्पष्ट किया गया कि न्यायिक अधिकारियों को कानून की व्याख्या और न्यायिक विवेक के इस्तेमाल की स्वतंत्रता अवश्य है, लेकिन यह स्वतंत्रता स्थापित वैधानिक प्रावधानों, न्यायिक अनुशासन और न्यायिक प्रक्रिया की जानबूझकर अनदेखी की छूट नहीं देती.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

