सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद मध्य प्रदेश के पूर्व पुलिसकर्मी को मिला वीरता पदक, राष्ट्रपति ने दी मंजूरी

सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद मध्य प्रदेश के पूर्व पुलिसकर्मी को मिला वीरता पदक, राष्ट्रपति ने दी मंजूरी

प्रेषित समय :20:29:40 PM / Fri, Aug 21st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. करीब दो दशक पहले डकैत विरोधी अभियान में अदम्य साहस दिखाने वाले मध्य प्रदेश के पूर्व पुलिसकर्मी विवेक कुमार चौहान को आखिरकार वह सम्मान मिलने का रास्ता साफ हो गया, जिसका इंतजार उन्हें वर्षों से था. सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने वर्ष 2003 में डकैती विरोधी अभियान के दौरान दो डकैतों को मार गिराने की कार्रवाई के लिए चौहान को राष्ट्रपति वीरता पदक प्रदान करने की मंजूरी दे दी है. शुक्रवार को केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट को इस निर्णय की जानकारी दी गई.

मामला केवल एक वीरता पदक मिलने तक सीमित नहीं है. इसके पीछे एक पूर्व पुलिसकर्मी के उस लंबे संघर्ष की कहानी है, जिसमें एक ओर ड्यूटी के दौरान दिखाई गई बहादुरी थी तो दूसरी ओर उस बहादुरी को आधिकारिक सम्मान दिलाने के लिए वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई. हाई कोर्ट के निर्देश के बावजूद पुरस्कार देने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ने पर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और वहां अवमानना कार्यवाही की स्थिति बनी. अंततः शीर्ष अदालत की सख्ती के बाद केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्ताव पर निर्णय की प्रक्रिया पूरी की.

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के समक्ष शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई हुई. अदालत उस अवमानना कार्यवाही पर विचार कर रही थी, जो हाई कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किए जाने के आरोप में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन के खिलाफ शुरू हुई थी. हाई कोर्ट पहले ही चौहान को वीरता पुरस्कार देने का निर्देश दे चुका था, लेकिन उसके अनुपालन में हुई देरी को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया.

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि अब इस मामले में राष्ट्रपति स्तर पर निर्णय हो चुका है. उन्होंने अदालत को जानकारी दी कि राष्ट्रपति ने पूर्व पुलिस अधिकारी विवेक कुमार चौहान को वीरता पदक प्रदान करने की मंजूरी दे दी है. सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि पुरस्कार की औपचारिक अधिसूचना जल्द भारत के राजपत्र में प्रकाशित की जाएगी.

सरकार की ओर से अदालत के समक्ष रखी गई सूचना में कहा गया कि हाई कोर्ट के आदेश और लागू दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रस्ताव की समीक्षा की गई. इसके बाद राष्ट्रपति ने 24 जून 2003 को की गई कार्रवाई के लिए तत्कालीन उपनिरीक्षक विवेक कुमार चौहान को वीरता पदक प्रदान करने की मंजूरी दी.

वर्ष 2003 की वह कार्रवाई चौहान के पुलिस करियर की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल रही. मध्य प्रदेश में डकैत विरोधी अभियान के दौरान उन्होंने जोखिम उठाते हुए कार्रवाई की थी. अभियान के दौरान दो डकैत मारे गए थे. पुलिस सेवा में इस तरह की कार्रवाई केवल व्यक्तिगत साहस का मामला नहीं होती. ऐसे अभियानों में हर निर्णय कुछ सेकंड में लेना पड़ता है और सामने मौजूद खतरे के बीच पुलिसकर्मी को अपने साथियों और आम नागरिकों की सुरक्षा का भी ध्यान रखना होता है.

यही वजह है कि पुलिस बल में वीरता पुरस्कार केवल किसी कार्रवाई का प्रशासनिक प्रमाणपत्र नहीं माना जाता. यह उस क्षण को संस्थागत सम्मान देने की प्रक्रिया है, जब कोई पुलिसकर्मी अपने कर्तव्य के निर्वहन में असाधारण साहस दिखाता है. चौहान के मामले में विवाद इस बात पर नहीं था कि उन्होंने वर्ष 2003 में कार्रवाई की थी, बल्कि लंबे समय तक यह सवाल बना रहा कि उस कार्रवाई के लिए उन्हें वीरता पदक कब और कैसे दिया जाएगा.

हाई कोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए चौहान को वीरता पुरस्कार देने का निर्देश दिया था. इसके बावजूद जब आदेश का पालन अपेक्षित समय में नहीं हुआ तो अवमानना की कार्यवाही शुरू हुई. सुप्रीम कोर्ट के सामने भी यही मुद्दा था कि जब न्यायालय द्वारा स्पष्ट निर्देश दिया जा चुका है तो उसके अनुपालन में इतनी देरी क्यों हुई.

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि वीरता पुरस्कारों का अंतिम निर्णय राष्ट्रपति के स्तर पर होता है और इसलिए ऐसे मामलों में हाई कोर्ट के आदेश को भविष्य के लिए सामान्य मिसाल नहीं माना जाना चाहिए. सॉलिसिटर जनरल ने यह पक्ष अदालत के सामने रखा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि मौजूदा कार्यवाही का दायरा इस प्रश्न पर व्यापक टिप्पणी करना नहीं है. अदालत फिलहाल यह देख रही थी कि संबंधित आदेश का पालन हुआ या नहीं.

शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अवमानना कार्यवाही में इस प्रकार की व्यापक टिप्पणी करना आवश्यक नहीं है कि हाई कोर्ट का आदेश भविष्य के मामलों में मिसाल बनेगा या नहीं. अदालत का तत्काल उद्देश्य आदेश के अनुपालन की स्थिति को देखना था. इसी बीच सरकार की ओर से राष्ट्रपति की मंजूरी की जानकारी सामने आ गई.

सुप्रीम कोर्ट में चौहान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मृगेंद्र सिंह उपस्थित हुए. सरकार की ओर से राष्ट्रपति की मंजूरी और आगे राजपत्र में अधिसूचना जारी किए जाने की जानकारी मिलने के बाद चौहान की ओर से संकेत दिया गया कि अब हाई कोर्ट में लंबित अवमानना कार्यवाही वापस ले ली जाएगी.

अदालत ने अपने आदेश में केंद्र सरकार की ओर से गृह मंत्रालय द्वारा 20 अगस्त 2026 को जारी सूचना को रिकॉर्ड पर लिया. इस सूचना में चौहान को वीरता पदक देने की राष्ट्रपति की मंजूरी का उल्लेख था. अदालत को बताया गया कि पुरस्कार की औपचारिक अधिसूचना उचित समय पर भारत के राजपत्र में प्रकाशित की जाएगी.

इन परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अब इस याचिका पर आगे विचार करने की आवश्यकता नहीं है. इस तरह करीब दो दशक पुराने घटनाक्रम से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया अपने एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंच गई.

चौहान के मामले को व्यापक संदर्भ में देखें तो यह सवाल भी सामने आता है कि ड्यूटी के दौरान असाधारण साहस दिखाने वाले पुलिसकर्मियों को सम्मान देने की सरकारी प्रक्रिया कितनी समयबद्ध होनी चाहिए. पुलिस बल में काम करने वाला कर्मचारी जब किसी डकैत विरोधी अभियान या गंभीर आपराधिक कार्रवाई में अपनी जान जोखिम में डालता है, तो उसके लिए वीरता पदक केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं होता. यह उसके साथ काम करने वाले पूरे बल के मनोबल से भी जुड़ा होता है.

ऐसे पुरस्कारों का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि पुलिस की ड्यूटी सामान्य परिस्थितियों में नहीं होती. अपराधियों से मुठभेड़, बंधक बनाए गए लोगों को बचाना, डकैतों के खिलाफ अभियान और संगठित अपराध के विरुद्ध कार्रवाई जैसे अवसरों पर पुलिसकर्मी को अपने प्रशिक्षण, साहस और त्वरित निर्णय क्षमता का इस्तेमाल करना पड़ता है. कई बार ऐसी कार्रवाई का परिणाम केवल संबंधित अधिकारी के करियर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था पर असर डालता है.

वर्ष 2003 में मध्य प्रदेश में डकैत विरोधी अभियान के दौरान चौहान की कार्रवाई को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए. दो डकैतों को मार गिराने वाली कार्रवाई के लिए उन्हें वीरता सम्मान की स्वीकृति अब राष्ट्रपति स्तर पर मिल गई है. हालांकि औपचारिक प्रक्रिया अभी राजपत्र में अधिसूचना जारी होने के बाद पूरी होगी, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय लिया जा चुका है.

इस घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही. अदालत ने सीधे पुरस्कार का निर्णय स्वयं नहीं किया, बल्कि उस न्यायिक आदेश के अनुपालन को लेकर केंद्र सरकार से जवाब मांगा. अदालत की सख्ती के बाद सरकार ने मामले को आगे बढ़ाया और अंततः राष्ट्रपति के समक्ष निर्णय हुआ. इससे यह संदेश भी सामने आता है कि न्यायालय के आदेश के अनुपालन में अनावश्यक देरी होने पर संबंधित सरकारी तंत्र को जवाबदेह होना पड़ सकता है.

सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि राष्ट्रपति ने लागू दिशा-निर्देशों और हाई कोर्ट के आदेश को ध्यान में रखते हुए प्रस्ताव की समीक्षा के बाद मंजूरी दी है. यानी अंतिम निर्णय संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप राष्ट्रपति के स्तर पर लिया गया. अब अगला औपचारिक कदम भारत के राजपत्र में अधिसूचना का प्रकाशन होगा.

मामले का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि चौहान के लिए सम्मान की लड़ाई उनकी पुलिस सेवा समाप्त होने के बाद भी जारी रही. आम तौर पर पुलिसकर्मी के लिए वीरता पुरस्कार उसके सेवा काल में सबसे बड़े सम्मानों में गिना जाता है. लेकिन किसी कारण से यदि पुरस्कार की प्रक्रिया वर्षों तक अटकी रहे तो उस सम्मान का उद्देश्य ही कमजोर पड़ सकता है. चौहान के मामले में न्यायिक हस्तक्षेप ने इस लंबित प्रक्रिया को फिर गति दी.

सुप्रीम कोर्ट के सामने अब चूंकि राष्ट्रपति की मंजूरी का तथ्य आ चुका था और चौहान की ओर से लंबित अवमानना कार्यवाही वापस लेने की बात कही गई, इसलिए अदालत ने मामले को आगे बढ़ाने की जरूरत नहीं समझी. इस तरह कानूनी विवाद का तत्काल कारण समाप्त हो गया.

मध्य प्रदेश के इस पूर्व पुलिसकर्मी के लिए यह फैसला केवल एक पदक की मंजूरी नहीं, बल्कि उस कार्रवाई की वर्षों बाद हुई औपचारिक पहचान है, जिसे उन्होंने करीब 23 वर्ष पहले पुलिस ड्यूटी के दौरान अंजाम दिया था. एक पुलिसकर्मी के लिए वीरता का क्षण कुछ मिनटों या कुछ घंटों का हो सकता है, लेकिन उस साहस को संस्थागत सम्मान में बदलने की प्रक्रिया कभी-कभी वर्षों लंबी हो जाती है. विवेक कुमार चौहान का मामला इसी विडंबना को सामने लाता है.

अब राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद निगाह भारत के राजपत्र में जारी होने वाली अधिसूचना पर है. उसके प्रकाशन के साथ चौहान को वर्ष 2003 की कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति वीरता पदक प्रदान किए जाने की औपचारिक प्रक्रिया पूरी हो जाएगी. लंबे इंतजार के बाद मध्य प्रदेश पुलिस से जुड़े इस पूर्व अधिकारी के साहस को आखिरकार वह संवैधानिक और संस्थागत सम्मान मिलने जा रहा है, जिसकी दिशा में उनकी कानूनी लड़ाई ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-