इंदौर. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 12 वर्षीय बच्ची से गलत हरकत करने के प्रयास के मामले में आरोपी को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है. न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा. अदालत ने घटना की परिस्थितियों, बच्ची के घटना के दौरान शोर नहीं मचाने, उसके शरीर पर किसी चोट के निशान नहीं मिलने, कथित घटनास्थल की स्थिति और किसी स्वतंत्र स्थानीय गवाह की जांच नहीं किए जाने को अभियोजन के मामले की महत्वपूर्ण कमियां माना.
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि यदि किसी बच्ची को जबरन गलत हरकत के लिए खींचकर ले जाया जा रहा हो और वह मदद के लिए चिल्लाए तक नहीं, तो यह परिस्थिति सामान्य या स्वाभाविक प्रतीत नहीं होती. पीठ के अनुसार, घटना के दौरान किसी प्रकार का शोर, चीख-पुकार या आसपास के लोगों का ध्यान आकर्षित करने वाली कोई गतिविधि सामने नहीं आना अभियोजन की कहानी को संदिग्ध बनाता है. अदालत ने इन परिस्थितियों को अकेले निर्णायक नहीं माना, लेकिन अन्य कमियों के साथ इन्हें अभियोजन के खिलाफ जाने वाला महत्वपूर्ण पहलू माना.
मामले में राज्य और पीड़िता की ओर से अलग-अलग अपील दायर कर निचली अदालत के उस निर्णय को चुनौती दी गई थी, जिसमें आरोपी को लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया गया था. अभियोजन के मुताबिक घटना 5 मार्च 2021 की शाम करीब पांच बजे की है. उस समय करीब साढ़े 12 वर्ष की बच्ची अपने घर के बाहर खुले आंगन में झाड़ू लगा रही थी. इसी दौरान उसका पड़ोसी आरोपी वहां पहुंचा और कथित तौर पर उसका दायां हाथ पकड़ लिया.
अभियोजन का आरोप था कि आरोपी बच्ची को पास की नाली की तरफ खींचकर ले गया और उसके साथ गलत हरकत करने का प्रयास किया. बच्ची ने विरोध करते हुए अपना हाथ छुड़ाया और वहां से भागकर हैंडपंप के पास पहुंची. बताया गया कि वहां उसने अपने भाई को घटना की जानकारी दी. भाई ने फोन के माध्यम से माता-पिता को सूचना दी, जिसके बाद परिवार पुलिस के पास पहुंचा और शिकायत दर्ज कराई. घटना के दिन ही बच्ची की चिकित्सकीय जांच कराई गई थी. इसके बाद पुलिस ने जांच पूरी कर 25 मार्च 2021 को आरोपी के खिलाफ आरोपपत्र अदालत में पेश किया था.
अपील पर सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन नहीं किया. राज्य ने यह भी कहा कि केवल परिवारों के बीच पहले से चले आ रहे विवाद के आधार पर अभियोजन की पूरी कहानी पर संदेह नहीं किया जा सकता. राज्य की ओर से सुप्रीम कोर्ट के विजय बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले के निर्णय का हवाला देते हुए कहा गया कि यदि पीड़िता की गवाही पूरी तरह विश्वसनीय हो तो उसकी गवाही के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है और अलग से किसी पुष्टि की आवश्यकता नहीं होती.
वहीं आरोपी की ओर से इन दलीलों का विरोध किया गया. बचाव पक्ष ने कहा कि अभियोजन के गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं और आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद नहीं हैं. आरोपी की ओर से यह भी अदालत के समक्ष रखा गया कि घटना से ठीक पहले दोनों परिवारों के बीच विवाद हुआ था, जिसके कारण शिकायत दर्ज कराने की पृष्ठभूमि को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि घटना से एक दिन पहले पीड़िता के पिता और आरोपी के पिता के बीच विवाद हुआ था. पीड़िता ने अपने बयान में भी बताया था कि इस विवाद के बाद उसके पिता ने आरोपी के खिलाफ पुलिस में शिकायत की थी. अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में निचली अदालत द्वारा इस संभावना पर विचार करना उचित था कि कहीं प्राथमिकी पहले से चले आ रहे पारिवारिक विवाद का परिणाम तो नहीं थी.
पीठ ने हालांकि यह स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर किसी बाल पीड़िता के बयान को खारिज नहीं किया जा सकता. अदालत ने कहा कि पीड़िता की अकेली गवाही के आधार पर दोषसिद्धि कानूनन संभव है, लेकिन इसके लिए उसकी गवाही ऐसी होनी चाहिए जिस पर अदालत को पूरा और अडिग विश्वास हो. मौजूदा मामले में अदालत को अभियोजन की कहानी में कई ऐसे पहलू मिले, जिनके कारण पीड़िता की गवाही को दोषसिद्धि का सुरक्षित आधार मानना संभव नहीं था.
अदालत ने कथित घटनास्थल और उस नाली को भी महत्वपूर्ण माना, जहां अभियोजन के अनुसार आरोपी बच्ची को खींचकर ले गया था. पीठ ने पाया कि आधिकारिक मौका नक्शे में नाली की स्थिति स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं की गई थी. अदालत के अनुसार घटनास्थल से जुड़ी यह कमी इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि अभियोजन की पूरी कहानी में नाली के पास ले जाने की घटना को प्रमुख हिस्सा बताया गया था, लेकिन जांच के दस्तावेज में उसका स्थान स्पष्ट नहीं था.
हाईकोर्ट ने आरोपी के कथित इरादे और घटनास्थल की स्थिति के बीच भी असंगति पर गौर किया. पीठ ने कहा कि यदि आरोपी वास्तव में बच्ची के साथ गलत हरकत करने के इरादे से उसे अपने साथ ले जाना चाहता था तो उसके घर के आसपास का अपेक्षाकृत एकांत स्थान उसके लिए अधिक उपयुक्त हो सकता था. इसके विपरीत अभियोजन की कहानी के अनुसार आरोपी बच्ची को ऐसे स्थान की ओर खींचकर ले गया जो सार्वजनिक था और जहां लोगों की आवाजाही रहती थी. अदालत ने इस परिस्थिति को भी अभियोजन के कथन के अनुरूप नहीं पाया.
पीठ ने बच्ची की उम्र और आरोपी की उम्र के अंतर को भी रिकॉर्ड में लिया. घटना के समय बच्ची की उम्र करीब साढ़े 12 वर्ष थी, जबकि आरोपी करीब 23 वर्ष का था. अभियोजन के अनुसार बच्ची ने आरोपी से अपना हाथ छुड़ाने के लिए संघर्ष किया था. अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में हाथ या शरीर के किसी हिस्से पर घर्षण अथवा अन्य चोट के निशान मिलने की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता था. लेकिन चिकित्सकीय रिपोर्ट में बच्ची के शरीर पर किसी प्रकार की चोट नहीं पाई गई.
अदालत ने घटनास्थल की भौगोलिक स्थिति को भी अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण माना. रिकॉर्ड के मुताबिक क्षेत्र घनी आबादी वाला और व्यस्त आवासीय इलाका था. इसके बावजूद जांच अधिकारी ने किसी स्वतंत्र स्थानीय व्यक्ति को मामले में गवाह नहीं बनाया. हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में स्वतंत्र गवाह का सामने आना अभियोजन के मामले को मजबूत कर सकता था, लेकिन जांच में ऐसा नहीं किया गया.
इन सभी परिस्थितियों को एक साथ देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन की कहानी में पर्याप्त संदेह मौजूद है. पीठ ने कहा कि आपराधिक मामले में आरोपी को दोषी ठहराने के लिए अभियोजन को आरोप संदेह से परे साबित करना होता है. जब साक्ष्यों और परिस्थितियों से अभियोजन की कहानी पर गंभीर संदेह पैदा हो और निचली अदालत ने उपलब्ध सामग्री का मूल्यांकन करते हुए आरोपी को बरी किया हो, तो अपीलीय अदालत को केवल अलग दृष्टिकोण के आधार पर उस फैसले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.
हाईकोर्ट ने अंततः राज्य और पीड़िता की अपीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और आरोपी को बरी किए जाने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा. इस तरह करीब पांच वर्ष पुराने मामले में आरोपी की बरी कायम रही. अदालत के निर्णय में यह भी स्पष्ट हुआ कि बाल पीड़िता की गवाही को कानून विशेष महत्व देता है, लेकिन दोषसिद्धि के लिए गवाही की विश्वसनीयता, घटनाक्रम की स्वाभाविकता और उपलब्ध अन्य साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है. मौजूदा मामले में इन पहलुओं में पाई गई कमियों के कारण हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझा.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

