बच्चों पर जलवायु संकट की मार, 56 करोड़ बच्चे झेल रहे नम गर्मी का अतिरिक्त महीना

बच्चों पर जलवायु संकट की मार, 56 करोड़ बच्चे झेल रहे नम गर्मी का अतिरिक्त महीना

प्रेषित समय :18:58:02 PM / Fri, Aug 28th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. जलवायु परिवर्तन अब केवल तापमान बढ़ने की कहानी नहीं रह गई है. इसका सबसे गंभीर असर बच्चों के बचपन पर पड़ रहा है. दुनिया में करीब 56 करोड़ बच्चे, यानी 0 से 9 वर्ष की उम्र के लगभग 43 प्रतिशत बच्चे, हर साल कम से कम एक अतिरिक्त महीने ऐसी नम गर्मी का सामना कर रहे हैं, जो मानव जनित जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा हुई है. यह स्थिति बच्चों के लिए इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि उनका शरीर वयस्कों की तुलना में गर्मी के दबाव से निपटने में कम सक्षम होता है. नई वैश्विक रिसर्च में सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा हुई अतिरिक्त गर्मी का बोझ बच्चों पर किसी भी दूसरे आयु वर्ग की तुलना में अधिक पड़ रहा है.

Vrije Universiteit Brussel (VUB) के नेतृत्व में की गई इस स्टडी में पहली बार वैश्विक स्तर पर यह आकलन करने की कोशिश की गई है कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ी अतिरिक्त गर्मी अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों को किस तरह प्रभावित कर रही है. शोधकर्ताओं ने आबादी से जुड़े आंकड़ों को आधुनिक जलवायु मॉडल और उन वैज्ञानिक तरीकों के साथ जोड़ा, जिनके जरिए यह पता लगाया जाता है कि जलवायु परिवर्तन ने किसी चरम मौसम की घटना की संभावना या तीव्रता को कितना बदला है. यह अध्ययन 26 अगस्त को Science Advances में प्रकाशित हुआ है.

रिसर्च में जिस गर्मी को लेकर चिंता जताई गई है, वह केवल थर्मामीटर पर दर्ज तापमान नहीं है. अध्ययन का केंद्र ह्यूमिड हीट यानी नम गर्मी है. हवा में नमी अधिक होने पर शरीर पसीने के जरिए अपनी गर्मी आसानी से बाहर नहीं निकाल पाता. यही वजह है कि समान तापमान पर सूखी गर्मी की तुलना में नम गर्मी शरीर के लिए कहीं अधिक खतरनाक हो सकती है. शोधकर्ताओं ने छाया में 28 डिग्री सेल्सियस से अधिक वेट-बल्ब ग्लोब तापमान को हीट स्ट्रेस की स्थिति के रूप में इस्तेमाल किया है. ऐसे हालात में अत्यधिक शारीरिक गतिविधि से बचना, आराम की अवधि बढ़ाना और शरीर को ठंडा रखने के उपाय करना जरूरी हो सकता है.

अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन ने केवल गर्मी की तीव्रता नहीं बढ़ाई है, बल्कि उन दिनों की संख्या भी बढ़ाई है, जब बच्चे इस तरह के हीट स्ट्रेस का सामना करते हैं. वर्तमान स्थिति में करीब 35 करोड़ बच्चे, यानी 0 से 9 वर्ष की उम्र के लगभग 27 प्रतिशत बच्चे, हर साल कुल पांच महीने या उससे अधिक समय तक हीट स्ट्रेस की परिस्थितियों के संपर्क में आते हैं. यदि मानवजनित जलवायु परिवर्तन नहीं हुआ होता तो ऐसे बच्चों की संख्या करीब 12 करोड़ यानी लगभग नौ प्रतिशत होती. इसका अर्थ है कि जलवायु परिवर्तन ने साल में पांच महीने या उससे अधिक कुल हीट स्ट्रेस झेलने वाले बच्चों की संख्या को लगभग तीन गुना कर दिया है.

हालांकि यह खतरा दुनिया के सभी हिस्सों में समान नहीं है. दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी अफ्रीका ऐसे क्षेत्र हैं जहां आज सबसे अधिक बच्चे खतरनाक नम गर्मी के संपर्क में हैं. इन क्षेत्रों में एक ओर गर्म और नम मौसम की परिस्थितियां मौजूद हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों की आबादी का हिस्सा भी काफी बड़ा है. इससे जलवायु संकट और सामाजिक असमानता एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं. जिन क्षेत्रों में गर्मी का जोखिम अधिक है, वहां बड़ी आबादी के पास पर्याप्त ठंडक, बेहतर आवास और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच भी सीमित हो सकती है.

VUB की स्टडी की प्रमुख लेखिका रोजा पिएत्रोइउस्ती के अनुसार, विकासशील देशों के बच्चे जलवायु चरम घटनाओं के संपर्क में अपेक्षाकृत अधिक हैं, जबकि ऐतिहासिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उनका योगदान सबसे कम रहा है. गरीबी, कमजोर आवास व्यवस्था, ठंडक पाने के सीमित साधन और दबाव में काम कर रही स्वास्थ्य प्रणालियां गर्मी से बचाव के विकल्पों को और सीमित कर देती हैं. इसका मतलब यह है कि जिन बच्चों का जलवायु संकट पैदा करने में योगदान लगभग नगण्य है, वे उसके स्वास्थ्य संबंधी खतरों का अधिक बोझ उठा रहे हैं.

बच्चों की शारीरिक बनावट भी उन्हें अत्यधिक गर्मी के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है. उनका शरीर वयस्कों की तुलना में तेजी से गर्म हो सकता है और वे पसीने के जरिये शरीर को ठंडा करने में उतने प्रभावी नहीं होते. छोटे बच्चों को गर्मी से बचने के लिए वयस्कों की देखभाल पर भी अधिक निर्भर रहना पड़ता है. ऐसे में लंबे समय तक अत्यधिक गर्म और नम वातावरण में रहने से डिहाइड्रेशन और हीटस्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है. गंभीर मामलों में शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है और महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंच सकता है. लंबे समय तक अत्यधिक गर्मी का असर बच्चों की सीखने की क्षमता और संज्ञानात्मक विकास पर भी पड़ने की आशंका जताई गई है.

भविष्य की स्थिति मौजूदा हालात से और गंभीर हो सकती है. अध्ययन के अनुमान के मुताबिक यदि वैश्विक तापमान वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचती है, तो 0 से 9 वर्ष की उम्र के करीब 62 करोड़ बच्चे, यानी इस आयु वर्ग के लगभग 49 प्रतिशत बच्चे, हर साल कम से कम एक अतिरिक्त महीने जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हीट स्ट्रेस परिस्थितियों के संपर्क में आ सकते हैं. इनमें करीब 39 करोड़ बच्चे ऐसे हो सकते हैं, जिन्हें हर साल कुल पांच महीने या उससे अधिक हीट स्ट्रेस का सामना करना पड़े.

यदि वैश्विक तापमान वृद्धि दो डिग्री सेल्सियस तक पहुंचती है तो स्थिति और गंभीर होने का अनुमान है. ऐसे परिदृश्य में करीब 65 करोड़ बच्चे यानी इस आयु वर्ग के लगभग 59 प्रतिशत बच्चे हर साल कम से कम एक अतिरिक्त महीने जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हीट स्ट्रेस परिस्थितियों का सामना कर सकते हैं. वहीं करीब 42 करोड़ बच्चों को साल में पांच महीने या उससे अधिक कुल हीट स्ट्रेस झेलना पड़ सकता है.

शोध में अतिरिक्त और कुल हीट स्ट्रेस के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण है. अतिरिक्त हीट स्ट्रेस से आशय उन दिनों से है जो मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा हुए हैं और जलवायु परिवर्तन नहीं होने की स्थिति में नहीं होते. इसके विपरीत कुल हीट स्ट्रेस में वे सभी दिन शामिल हैं, जो प्राकृतिक जलवायु परिस्थितियों और मानवजनित जलवायु परिवर्तन दोनों के कारण हो सकते हैं. यही अंतर बताता है कि मौजूदा गर्मी के जोखिम में जलवायु परिवर्तन किस हद तक अतिरिक्त दबाव जोड़ रहा है.

VUB के वरिष्ठ लेखक और प्रोफेसर विम थियरी के मुताबिक, बच्चों और आने वाली पीढ़ियों को बढ़ती गर्मी के खतरे से बचाने के लिए फॉसिल फ्यूल से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेजी से कटौती करना जरूरी है. वैश्विक तापमान वृद्धि को पेरिस समझौते के अनुरूप सीमित करने के साथ विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्त बढ़ाने, हीट एक्शन प्लान मजबूत करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने की जरूरत है.

भारत के लिए इस अध्ययन के निष्कर्ष विशेष महत्व रखते हैं, क्योंकि दक्षिण एशिया उन क्षेत्रों में शामिल है जहां आज सबसे ज्यादा बच्चे खतरनाक नम गर्मी के संपर्क में हैं. हालांकि उपलब्ध अध्ययन सामग्री में भारत के लिए अलग से प्रभावित बच्चों की संख्या नहीं दी गई है. इसलिए इस रिसर्च के आधार पर भारत में प्रभावित बच्चों की कोई सटीक संख्या बताना उचित नहीं होगा. लेकिन क्षेत्रीय आंकड़े भारत के लिए खतरे की गंभीरता का स्पष्ट संकेत देते हैं.

बढ़ती गर्मी का असर बच्चों के जीवन में केवल मौसम के आंकड़ों के रूप में दर्ज नहीं हो रहा है. यह उन दिनों में दिखाई दे रहा है जब बाहर खेलना मुश्किल हो जाता है, स्कूल जाने के दौरान गर्मी जोखिम बढ़ जाता है और शरीर का सामान्य तापमान बनाए रखना चुनौती बन जाता है. जलवायु परिवर्तन की बहस लंबे समय से तापमान, समुद्र के स्तर और मौसम की चरम घटनाओं के आंकड़ों के इर्द-गिर्द घूमती रही है. नई रिसर्च इस बहस को बच्चों के अनुभव से जोड़ती है.

अब सवाल केवल यह नहीं है कि दुनिया कितनी गर्म हो रही है. असली सवाल यह भी है कि बढ़ती गर्मी के बीच दुनिया के बच्चे कितने दिन सुरक्षित, स्वस्थ और सामान्य बचपन जी पाएंगे.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-