मुंबई. दिवंगत सेलिब्रिटी मैनेजर दिशा सालियान की मौत का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है. बॉम्बे हाई कोर्ट ने शुक्रवार को मुंबई पुलिस की ओर से मामले की जांच बंद किए जाने के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रकरण के कई पहलुओं की जांच की जरूरत है. अदालत ने दिशा के पिता सतीश सालियान की उस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें उन्होंने बेटी की मौत की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच की मांग की है.
न्यायमूर्ति सारंग वी. कोतवाल और न्यायमूर्ति रंजीतसिंह भोंसले की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान इस बात पर सवाल उठाया कि यदि पुलिस को किसी तरह की आपराधिक साजिश या अन्य संदेह नजर नहीं आया था, तो जांच इतने वर्षों तक क्यों चलती रही. अदालत ने यह भी पूछा कि जब पुलिस ने घटना के करीब तीन साल बाद जांच दोबारा शुरू की थी, तो अब उसे बंद करने का निर्णय किस आधार पर लिया गया.
दिशा सालियान की मौत 8 जून 2020 को मुंबई के मलाड इलाके में एक आवासीय इमारत की 14वीं मंजिल से गिरने के बाद हुई थी. पुलिस ने उस समय आकस्मिक मृत्यु की रिपोर्ट दर्ज की थी. इसके छह दिन बाद अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने दिशा की मौत को लेकर भी कई तरह के सवाल और अटकलें पैदा कर दी थीं. दोनों घटनाओं के बीच किसी संबंध को लेकर सार्वजनिक स्तर पर चर्चा हुई, हालांकि पुलिस ने जांच के दौरान किसी तरह की आपराधिक साजिश या अन्य गड़बड़ी की संभावना से इनकार किया था.
दिशा के पिता ने पुलिस के इस निष्कर्ष पर असहमति जताई है. उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी बेटी की मौत को आत्महत्या के रूप में पेश किए जाने की कहानी पुलिस जांच शुरू होने से पहले ही तैयार और प्रचारित कर दी गई थी. मार्च 2025 में उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख करते हुए मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की थी. याचिका में उन्होंने अपनी बेटी के साथ दुष्कर्म और हत्या किए जाने का आरोप लगाया तथा पुलिस अधिकारियों, राजनेताओं और प्रभावशाली लोगों पर कथित तौर पर सच्चाई दबाने के आरोप लगाए. इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है.
सुनवाई के दौरान पिता की ओर से पेश अधिवक्ता निलेश ओझा ने दिशा की मौत की परिस्थितियों पर भी सवाल उठाए. उन्होंने दावा किया कि दिशा का शव इमारत से करीब 10 फीट की दूरी पर मिला था और उनके अनुसार इस तथ्य की वैज्ञानिक तरीके से जांच की जानी चाहिए. अधिवक्ता ने अदालत में कहा कि उनके द्वारा कराए गए विश्लेषण के अनुसार शरीर के सीधे नीचे गिरने की संभावना अधिक होनी चाहिए थी. इसी आधार पर उन्होंने पुलिस के आत्महत्या के निष्कर्ष पर संदेह जताया.
राज्य सरकार की ओर से पेश लोक अभियोजक शिशिर हिराय ने पुलिस की जांच का पक्ष रखा. उन्होंने अदालत को बताया कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा दिसंबर 2022 में आकस्मिक मृत्यु रिपोर्ट की दोबारा समीक्षा के आदेश के बाद पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज की जांच की और छह लोगों के बयान दर्ज किए. सरकार के अनुसार, इन गवाहों में से किसी ने भी मामले में किसी तरह की आपराधिक साजिश या अन्य गड़बड़ी की बात नहीं कही.
इसके बावजूद हाई कोर्ट ने जांच की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए. अदालत ने कहा कि कानून के अनुसार उचित जांच होनी चाहिए, ताकि किसी भी पक्ष के साथ पूर्वाग्रह न हो. पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका सरोकार किसी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि एक पिता की उस शिकायत से है जिसने अपनी बेटी को खोया है और चाहता है कि मामले की जांच कानून के मुताबिक हो.
अदालत की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि उसने जांच की अवधि और उसके बाद मामले को बंद करने के समय पर सवाल उठाया. पीठ ने पूछा कि यदि पुलिस को शुरू से ही किसी तरह का संदेह नहीं था तो छह वर्षों तक जांच क्यों जारी रखी गई. वहीं, दूसरी ओर पुलिस ने मामले को दोबारा देखने का निर्णय घटना के कई वर्ष बाद लिया था. अदालत ने इसी विरोधाभास को भी सुनवाई के दौरान उठाया.
दिशा सालियान के मामले में अब तक पुलिस की आधिकारिक जांच ने किसी आपराधिक साजिश की पुष्टि नहीं की है. राज्य सरकार का कहना है कि सीसीटीवी फुटेज और गवाहों के बयानों सहित उपलब्ध सामग्री की जांच की गई और उसमें किसी तरह की गड़बड़ी सामने नहीं आई. दूसरी ओर, दिशा के पिता और उनके अधिवक्ता जांच की प्रक्रिया तथा मौत की परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं.
इस मामले में हाई कोर्ट का फैसला अब महत्वपूर्ण होगा. अदालत को यह तय करना है कि उपलब्ध परिस्थितियों में मामले की आगे स्वतंत्र जांच की आवश्यकता है या पुलिस की ओर से की गई जांच और उसके निष्कर्ष पर्याप्त हैं. फिलहाल अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया है और मामले से जुड़े आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष आना बाकी है.
दिशा सालियान की मौत के छह साल बाद भी यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण बना हुआ है क्योंकि एक ओर पुलिस की जांच में किसी आपराधिक साजिश की पुष्टि नहीं हुई, जबकि दूसरी ओर उनके परिवार ने जांच की निष्पक्षता और प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े किए हैं. हाई कोर्ट की शुक्रवार की सुनवाई ने इसी मूल सवाल को फिर सामने ला दिया है कि मामले को अंतिम रूप से बंद करने से पहले जांच के सभी पहलुओं की पर्याप्त पड़ताल हुई थी या नहीं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

