इंदौर. दूध की बढ़ती उत्पादन लागत और खरीद मूल्य के बीच बढ़ते अंतर ने इंदौर में दुग्ध उत्पादक किसानों और दूध खरीदारों के बीच टकराव की स्थिति पैदा कर दी है. एक सितंबर से दूध के नए भाव लागू करने की मांग को लेकर जिले के दुग्ध उत्पादक किसानों ने अब आर-पार की रणनीति तैयार कर ली है. शनिवार को सांवेर तहसील के धरमपुरी स्थित विश्वनाथ धाम में हुई बड़ी बैठक में किसानों ने साफ कर दिया कि यदि उनकी मांग के मुताबिक दूध की कीमत तय नहीं की गई तो आंदोलन को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा. पहले कलेक्टर कार्यालय पर प्रदर्शन होगा और समाधान नहीं निकलने पर दूध के साथ फल और सब्जियों की आपूर्ति रोकने की चेतावनी दी गई है.
इस फैसले का असर केवल दूध उत्पादकों और खरीददारों के बीच कीमत को लेकर होने वाले विवाद तक सीमित नहीं है. इंदौर जैसे बड़े शहर की रोजमर्रा की खाद्य आपूर्ति में दूध की अहम भूमिका है. ऐसे में किसानों की प्रस्तावित आपूर्ति रोकने की चेतावनी ने इस पूरे मामले को उपभोक्ताओं, डेयरी कारोबार और शहर की खाद्य व्यवस्था से भी जोड़ दिया है. हालांकि फिलहाल किसानों ने आपूर्ति रोकने की घोषणा को मांग पूरी नहीं होने की स्थिति से जोड़ा है.
धरमपुरी में आयोजित बैठक में सांवेर, देपालपुर, महू, कनाड़िया और खुडैल तहसील के करीब 500 दुग्ध उत्पादक किसान शामिल हुए. बैठक में किसानों ने अपनी ओर से दूध के नए बिक्री भाव भी तय किए. किसानों के अनुसार भैंस के दूध के लिए 70 रुपये प्रति लीटर, गाय के दूध के लिए 60 रुपये प्रति लीटर और फैट के आधार पर दूध देने पर 12 रुपये प्रति फैट की दर से भुगतान होना चाहिए. किसानों का कहना है कि मौजूदा खरीद मूल्य में पशुपालन और दूध उत्पादन की लागत पूरी करना मुश्किल हो रहा है.
किसानों के मुताबिक वर्तमान में उन्हें लगभग 52 से 53 रुपये प्रति लीटर या करीब 8.5 रुपये प्रति फैट के हिसाब से भुगतान मिल रहा है. दूसरी ओर उनका दावा है कि दूध उत्पादन की लागत बढ़कर करीब 65 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है. यानी किसान जिस कीमत पर दूध तैयार कर रहा है और जिस कीमत पर उसे खरीदार से भुगतान मिल रहा है, उसके बीच का अंतर लगातार दबाव बढ़ा रहा है. किसानों ने इसी अंतर को अपनी मांग का प्रमुख आधार बनाया है.
दुग्ध उत्पादन की लागत बढ़ने के पीछे किसानों ने पशुओं के चारे, खरीद और उपचार सहित कई खर्चों का उल्लेख किया है. उनका कहना है कि पशुओं की कीमतों में भी लगातार वृद्धि हुई है और भैंस की कीमत डेढ़ लाख रुपये से अधिक तक पहुंच चुकी है. पशु आहार में खली करीब 50 रुपये किलो, भूसा लगभग एक हजार रुपये क्विंटल और चूरी-चापड़ करीब 30 रुपये किलो तक पहुंचने की बात किसानों ने बैठक में रखी. इसके अलावा पशुओं के उपचार का खर्च भी अलग से बढ़ रहा है.
किसानों की परेशानी केवल पशु खरीद और चारे की बढ़ी कीमतों तक सीमित नहीं है. उनका कहना है कि दूध को बाजार तक पहुंचाने के लिए इस्तेमाल होने वाले केन का परिवहन खर्च भी किसानों को ही उठाना पड़ रहा है. ऐसे में दूध के मौजूदा खरीद भाव में उत्पादन, रखरखाव और परिवहन की लागत निकालना उनके लिए चुनौती बन गया है.
किसानों ने कम बारिश और हरे चारे की कमी को भी मौजूदा संकट से जोड़ा है. पशुपालन में हरे चारे की उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है, लेकिन बारिश की स्थिति प्रभावित होने से किसानों को चारे के लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है. इससे दूध उत्पादन की लागत पर सीधा असर पड़ने का दावा किया गया है. किसानों का कहना है कि बढ़ती लागत के कारण कई उत्पादकों ने दूध उत्पादन तक कम कर दिया है और करीब 50 प्रतिशत तक उत्पादन बंद करने की स्थिति की बात भी बैठक में सामने आई.
इंदौर जिले में साढ़े छह हजार से अधिक दुग्ध उत्पादक होने का दावा किसानों की ओर से किया गया है. ऐसे में यदि आंदोलन आगे बढ़ता है तो इसका दायरा कुछ गांवों तक सीमित रहने के बजाय व्यापक हो सकता है. फिलहाल किसान संगठित होकर अपनी मांग प्रशासन और दूध खरीदने वाली व्यवस्था के सामने रखने की तैयारी में हैं. एक सितंबर को कलेक्टर कार्यालय में धरना-प्रदर्शन की घोषणा इसी रणनीति का पहला चरण है.
दूध के दाम के साथ किसानों ने मिलावट का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया. उनका कहना है कि बाजार में नकली दूध, मावा, घी और पनीर की बिक्री पर प्रभावी कार्रवाई की जरूरत है. किसानों का तर्क है कि जो किसान वास्तविक दूध उत्पादन में लागत और मेहनत लगा रहा है, उसे पर्याप्त कीमत नहीं मिल रही, जबकि मिलावटी खाद्य उत्पादों का कारोबार उसके लिए प्रतिस्पर्धा की स्थिति पैदा कर रहा है. किसानों ने प्रशासन से ऐसे उत्पादों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है.
इस पूरे विवाद में सबसे अहम सवाल अब दूध के नए खरीद मूल्य को लेकर है. किसान 70 रुपये प्रति लीटर भैंस का दूध और 60 रुपये प्रति लीटर गाय का दूध चाहते हैं, जबकि वर्तमान में उन्हें इससे काफी कम कीमत मिलने की बात कही जा रही है. किसानों का कहना है कि यदि उनकी लागत के अनुरूप मूल्य नहीं मिला तो पशुपालन आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं रह जाएगा.
किसानों की रणनीति में आपूर्ति रोकना अंतिम चरण के रूप में सामने आया है. उनका कहना है कि पहले एक सितंबर को कलेक्टर कार्यालय में धरना-प्रदर्शन किया जाएगा. यदि वहां से भी समाधान नहीं निकलता है तो दूध के साथ फल और सब्जियों की सप्लाई रोकने का निर्णय लिया जा सकता है. इस चेतावनी ने प्रशासन के सामने बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की जरूरत बढ़ा दी है.
दूध की कीमत का यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका असर उत्पादन करने वाले किसान से लेकर खरीददार, डेयरी कारोबार और अंततः उपभोक्ता तक पहुंचता है. किसान यदि लागत के अनुरूप मूल्य नहीं मिलने की शिकायत करते हैं तो दूसरी ओर खरीद मूल्य बढ़ने की स्थिति में उसका प्रभाव आगे की पूरी आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है. ऐसे में किसी भी निर्णय का असर केवल किसान की आय तक सीमित नहीं रहेगा.
फिलहाल शनिवार की बैठक के बाद किसानों ने अपनी मांग स्पष्ट कर दी है और एक सितंबर की तारीख को आंदोलन के पहले बड़े पड़ाव के रूप में तय किया है. प्रशासन के सामने अब किसानों की बढ़ती उत्पादन लागत, मौजूदा खरीद मूल्य और संभावित आपूर्ति व्यवधान के बीच समाधान निकालने की चुनौती है. यदि बातचीत से रास्ता नहीं निकला तो दूध की आपूर्ति को लेकर किसानों की चेतावनी इंदौर की रोजमर्रा की खाद्य व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम बन सकती है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

