ग्वालियर में कचरे के पहाड़ पर अब चलेगी मशीन, रोज 1200 टन कचरा साफ करने की तैयारी

ग्वालियर में कचरे के पहाड़ पर अब चलेगी मशीन, रोज 1200 टन कचरा साफ करने की तैयारी

प्रेषित समय :21:25:21 PM / Sun, Aug 30th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

ग्वालियर. शहर में कचरा अब केवल सफाई व्यवस्था की समस्या नहीं रहेगा, बल्कि उसे संसाधन में बदलने की दिशा में नगर निगम ने बड़ा कदम उठाया है. लंबे समय से लैंडफिल साइट पर जमा कचरे के पहाड़ को कम करने के लिए इटली से लाई गई आधुनिक मशीनरी अब ग्वालियर पहुंच चुकी है. नई व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें केवल रोज निकलने वाले ताजा कचरे का ही निस्तारण नहीं होगा, बल्कि वर्षों से जमा पुराने कचरे यानी लेगेसी वेस्ट को भी साथ-साथ हटाया जाएगा. प्रस्तावित क्षमता के अनुसार प्रतिदिन करीब 1200 टन कचरे का निस्तारण किया जा सकेगा. इसमें लगभग 600 टन ताजा और 600 टन पुराना कचरा शामिल होगा.

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि ग्वालियर में कचरा प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती केवल रोज पैदा होने वाला कचरा नहीं, बल्कि पहले से जमा लाखों टन कचरा है. शहर की लैंडफिल साइट पर पुराने कचरे का विशाल भंडार लंबे समय से नगर निगम के लिए चुनौती बना हुआ है. पूर्व में इस कचरे के निस्तारण के लिए प्रयास हुए, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिले. अब नई तकनीक के जरिए पुराने और नए कचरे को एक ही व्यवस्था में लेने की कोशिश की जा रही है. इससे यदि निर्धारित क्षमता के अनुसार काम शुरू होता है तो शहर के कचरा प्रबंधन का पूरा ढांचा बदल सकता है.

नगर निगम ने इस परियोजना के लिए करीब छह महीने पहले कार्यादेश जारी किया था. प्रारंभिक चरण में कंपनी ने एक प्लांट स्थापित कर कचरे के निस्तारण का काम शुरू भी किया था. अब इटली से आधुनिक मशीनरी आने के बाद परियोजना को बड़े स्तर पर संचालित करने की तैयारी है. सितंबर में मशीन की स्थापना के लिए जरूरी चबूतरा और टीनशेड तैयार किए जाने हैं. इसके बाद अक्टूबर से निस्तारण की प्रक्रिया में तेजी आने की संभावना है.

परियोजना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कचरे को केवल हटाकर किसी दूसरी जगह डालने के बजाय उससे उपयोगी सामग्री निकालने पर जोर रहेगा. सूखे कचरे को अलग कर रिसाइकिल योग्य सामग्री निकाली जाएगी, जिसे संबंधित उद्योगों को बेचा जा सकेगा. दूसरी ओर गीले कचरे से जैविक खाद तैयार करने की योजना है. यानी जिस कचरे को अभी शहर की परेशानी माना जा रहा है, उसी से दोबारा उपयोगी सामग्री और खाद तैयार करने की व्यवस्था विकसित की जाएगी.

इस मॉडल में नगर निगम के लिए आर्थिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है. परियोजना की शर्तों के अनुसार प्लांट संचालित करने वाली कंपनी को बिजली का कनेक्शन स्वयं लेना होगा और बिजली का बिल भी उसे ही चुकाना होगा. इससे नगर निगम पर आने वाला अनुमानित करीब डेढ़ करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च बच सकेगा. साथ ही कंपनी को कचरे से निकलने वाली रिसाइकिल सामग्री और अन्य उपयोगी उत्पादों से आय अर्जित करने का अवसर मिलेगा. इस तरह परियोजना को केवल खर्च आधारित व्यवस्था के बजाय कचरे से मूल्य पैदा करने वाले मॉडल के रूप में देखा जा रहा है.

हालांकि ग्वालियर में कचरा निस्तारण की कहानी इतनी आसान नहीं रही है. इससे पहले लैंडफिल साइट पर जमा करीब 11 लाख टन पुराने कचरे के निस्तारण के लिए दिल्ली की दयाचरण एंड संस कंपनी को करीब 33 करोड़ रुपये का ठेका दिया गया था. आरोप रहा कि निर्धारित तरीके से कचरा हटाने के बजाय लेगेसी वेस्ट को नयागांव और बरा-शंकरपुर की खदानों में डंप किया जाने लगा. कचरे की मात्रा को लेकर भी विवाद सामने आया था. कंपनी और निगम के बीच इस बात को लेकर मतभेद रहा कि कितनी मात्रा में कचरे का निस्तारण किया जा चुका है और कितना बाकी है.

पुरानी व्यवस्था में केवल कचरा हटाना ही पर्याप्त नहीं था. टेंडर की शर्तों में कचरा हटने के बाद खाली हुई जमीन को दोबारा उपयोग योग्य बनाने यानी लैंड रिक्लेम करने की जिम्मेदारी भी शामिल थी. यही वजह है कि नई परियोजना को लेकर अब केवल मशीन की क्षमता पर नहीं, बल्कि वास्तविक परिणाम पर भी नजर रहेगी. शहर के लिए असली सफलता तभी मानी जाएगी जब लैंडफिल साइट पर कचरे की ऊंचाई और मात्रा वास्तव में घटे तथा खाली हुई जमीन का उपयोग भी बेहतर तरीके से हो सके.

नई मशीनरी के आने से निगम के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इसके नियमित और निर्धारित क्षमता के अनुसार संचालन की होगी. प्रतिदिन 1200 टन निस्तारण का लक्ष्य बड़ा है. इसके लिए ताजा कचरे की नियमित आपूर्ति, पुराने कचरे की खुदाई, छंटाई, परिवहन, प्रसंस्करण और उससे निकलने वाली सामग्री के निपटारे तक पूरी श्रृंखला को व्यवस्थित रखना होगा. किसी एक स्तर पर भी व्यवस्था कमजोर हुई तो मशीन की क्षमता के बावजूद कचरे का पहाड़ तेजी से कम नहीं होगा.

ग्वालियर में प्रतिदिन निकलने वाले लगभग 600 टन ताजा कचरे के साथ पुराने कचरे को भी निस्तारण प्रक्रिया में शामिल करना इस परियोजना को सामान्य कचरा प्रसंस्करण संयंत्र से अलग बनाता है. सामान्य तौर पर शहरों में नई व्यवस्था का फोकस रोज निकलने वाले कचरे पर रहता है, जबकि ग्वालियर में पुराने कचरे का बोझ पहले से मौजूद है. ऐसे में ताजा कचरे के साथ लेगेसी वेस्ट का समानांतर निस्तारण शहर के लिए अधिक उपयोगी साबित हो सकता है.

स्वच्छता के लिहाज से भी इसका असर केवल लैंडफिल साइट तक सीमित नहीं रहेगा. पुराने कचरे के ढेर कम होने से आसपास के क्षेत्र पर दबाव घट सकता है. लंबे समय तक जमा कचरे से दुर्गंध, धूल और अन्य पर्यावरणीय समस्याओं की आशंका बनी रहती है. यदि पुराने कचरे का वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण होता है तो इन समस्याओं को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है. साथ ही सूखे कचरे की रिसाइक्लिंग और गीले कचरे से खाद बनाने की व्यवस्था शहर में कचरे के पृथक्करण और पुनर्चक्रण को बढ़ावा दे सकती है.

इस परियोजना की सफलता का एक पैमाना यह भी होगा कि ग्वालियर में भविष्य में नया कचरा फिर पुराने कचरे के पहाड़ में तब्दील न हो. केवल मौजूदा 11 लाख टन के आसपास के पुराने कचरे को हटाना स्थायी समाधान नहीं होगा. इसके साथ घरों, बाजारों और संस्थानों से निकलने वाले कचरे के पृथक्करण, संग्रहण और प्रसंस्करण की व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा. तभी ताजा कचरे और लेगेसी वेस्ट दोनों का संकट एक साथ नियंत्रित किया जा सकेगा.

नगर निगम के लिए अब चुनौती मशीन मंगाने से आगे की है. सितंबर में स्थापना और अक्टूबर से गति पकड़ने वाली इस परियोजना की नियमित निगरानी, प्रतिदिन की क्षमता, वास्तव में निस्तारित कचरे की मात्रा और खाली हुई जमीन के उपयोग का सार्वजनिक आकलन महत्वपूर्ण होगा. क्योंकि ग्वालियर में कचरा प्रबंधन से जुड़े पुराने अनुभव यह बताते हैं कि कागज पर तय क्षमता और जमीन पर होने वाले निस्तारण के बीच अंतर नहीं होना चाहिए.

यदि नई व्यवस्था तय क्षमता के करीब काम करती है तो रोज 1200 टन कचरे के निस्तारण से हर महीने करीब 36 हजार टन और एक वर्ष में लगभग 4.38 लाख टन कचरे के प्रसंस्करण की क्षमता बनती है. इस लिहाज से परियोजना केवल सफाई अभियान नहीं, बल्कि ग्वालियर के वर्षों पुराने कचरा संकट को धीरे-धीरे खत्म करने की बड़ी कोशिश है. अब नजर इस बात पर रहेगी कि इटली से आई मशीन लैंडफिल साइट पर कितनी तेजी से कचरे के पहाड़ को जमीन में बदल पाती है और कचरे को बोझ के बजाय संसाधन बनाने का नगर निगम का दावा जमीन पर कितना सफल होता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-