इंदौर मेट्रो के बदले रूट पर उठे सवाल, 20 से 25 हजार मकानों पर अतिरिक्त कर के दावे से मचा हड़कंप

इंदौर मेट्रो के बदले रूट पर उठे सवाल, 20 से 25 हजार मकानों पर अतिरिक्त कर के दावे से मचा हड़कंप

प्रेषित समय :20:02:33 PM / Tue, Sep 1st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

इंदौर. इंदौर में भूमिगत मेट्रो परियोजना के बदले गए रूट और उसके संभावित असर को लेकर मंगलवार को हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान कई गंभीर सवाल उठाए गए. याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया कि मेट्रो की नई कार्ययोजना में अलाइनमेंट बदल चुका है, लेकिन इसके अनुरूप आवश्यक राजपत्र संशोधन अब तक नहीं किया गया. सबसे अहम दावा यह सामने आया कि नए मेट्रो मार्ग के दोनों ओर स्थित बड़ी संख्या में भवनों पर अतिरिक्त कर का भार पड़ सकता है और प्रभावित होने वाले मकानों की संख्या करीब 20 से 25 हजार तक बताई गई है. हालांकि इन दावों पर अभी न्यायालय का कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं आया है और मेट्रो परियोजना पर काम फिलहाल जारी है.

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता किशोर कोडवानी ने भूमिगत मेट्रो के निर्माण से जुड़े कई बिंदु अदालत के सामने रखे. उनका कहना था कि परियोजना की अंडरग्राउंड कार्ययोजना में बदलाव के साथ उसका अलाइनमेंट भी बदल गया है. ऐसे में 22 अगस्त 2024 के राजपत्र में आवश्यक संशोधन किया जाना चाहिए था. उनका तर्क था कि केवल परियोजना की कार्ययोजना बदल देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बदले हुए प्रावधानों और मार्ग को विधिवत राजपत्र में प्रकाशित करना भी जरूरी है.

याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने मेट्रो मार्ग के आसपास रहने वाले लोगों पर पड़ने वाले संभावित वित्तीय प्रभाव का मुद्दा भी उठाया. उनका दावा था कि नए रूट के दोनों तरफ बड़ी संख्या में मकान प्रभावित हो रहे हैं और संबंधित संपत्तियों से अतिरिक्त कर वसूली की स्थिति बन सकती है. उनके अनुसार 20 से 25 हजार भवन इस बदलाव से प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन आम लोगों को इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं है. उन्होंने मांग की कि मेट्रो परियोजना के बदले हुए स्वरूप और उससे संपत्ति मालिकों पर पड़ने वाले प्रभाव की स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट की जानी चाहिए.

इस दावे ने परियोजना को लेकर चल रही बहस को केवल निर्माण और यातायात सुविधा तक सीमित नहीं रहने दिया है. यदि मेट्रो मार्ग के कारण आसपास की संपत्तियों पर किसी प्रकार का अतिरिक्त वित्तीय दायित्व आता है तो इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ सकता है जिनकी संपत्तियां प्रस्तावित या निर्माणाधीन मार्ग के आसपास हैं. हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कितने भवन वास्तव में किसी अतिरिक्त कर के दायरे में आएंगे और इसकी गणना किस आधार पर होगी. इस संबंध में मेट्रो कॉर्पोरेशन की ओर से स्थिति स्पष्ट किया जाना बाकी है.

याचिकाकर्ता ने भूमिगत निर्माण के पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई. उनका कहना था कि भूमिगत मेट्रो के लिए बड़े पैमाने पर खुदाई से भूमिगत जल की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हो सकती है. भूमिगत जल के विखंडन का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने कहा कि इस पहलू पर पर्याप्त विचार नहीं किया जा रहा है. उनका तर्क था कि शहर के विकास और आधुनिक परिवहन व्यवस्था के साथ-साथ जमीन के नीचे मौजूद जल संसाधनों की सुरक्षा पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए.

मेट्रो के बदले हुए अलाइनमेंट से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में पुरातात्विक महत्व वाली इमारतों का भी उल्लेख किया गया. याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि नए प्रस्तावित मार्ग के तहत कुछ निर्माण कार्य ऐसे क्षेत्रों में हो रहे हैं जो पुरातात्विक भवनों के 200 मीटर के दायरे में आते हैं. उनका दावा है कि नियमानुसार ऐसे क्षेत्रों में खुदाई या अन्य निर्माण गतिविधियों को लेकर प्रतिबंध हैं. इस आधार पर उन्होंने मेट्रो की नई कार्ययोजना की वैधानिकता पर भी सवाल उठाया.

सुनवाई में पेड़ों की कटाई का मुद्दा भी उठाया गया. याचिकाकर्ता का आरोप था कि बदली हुई कार्ययोजना के कारण पेड़ों को अनावश्यक रूप से काटा जा रहा है. उनका कहना था कि विकास परियोजना के लिए पर्यावरणीय पहलुओं और लागू नियमों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए. मेट्रो जैसे बड़े सार्वजनिक परिवहन प्रोजेक्ट से शहर को दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है, लेकिन निर्माण के दौरान पर्यावरण, जल और विरासत से जुड़े नियमों का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने फिलहाल मेट्रो के भूमिगत काम पर रोक नहीं लगाई. इसका अर्थ है कि परियोजना का निर्माण कार्य जारी रहेगा. अदालत ने मेट्रो कॉर्पोरेशन से पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट करते हुए प्रतिवेदन प्रस्तुत करने को कहा है. अगली सुनवाई 8 सितंबर को होगी. तब परियोजना के बदले हुए अलाइनमेंट, राजपत्र संशोधन और याचिकाकर्ता की ओर से उठाए गए अन्य सवालों पर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है.

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न परियोजना की गति और उससे जुड़े नियमों के बीच संतुलन का है. मेट्रो शहर के सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने वाली बड़ी परियोजना है. भूमिगत मार्ग से सड़क के ऊपर यातायात और भूमि उपयोग पर दबाव कम करने की संभावना रहती है. लेकिन भूमिगत निर्माण अपने साथ अलग तरह की तकनीकी और पर्यावरणीय चुनौतियां लेकर आता है. इसलिए मार्ग में बदलाव होने पर उससे जुड़े सभी कानूनी, पर्यावरणीय और तकनीकी पहलुओं का नए सिरे से परीक्षण आवश्यक हो सकता है.

राजपत्र में संशोधन का मुद्दा भी इसी कारण महत्वपूर्ण है. किसी बड़ी सार्वजनिक परियोजना का निर्धारित मार्ग यदि बदलता है तो उससे प्रभावित होने वाले क्षेत्रों और संपत्तियों की स्थिति भी बदल सकती है. ऐसे में परियोजना का आधिकारिक रिकॉर्ड और जमीन पर चल रहे निर्माण के बीच स्पष्टता जरूरी है. लोगों को यह पता होना चाहिए कि उनके क्षेत्र से होकर परियोजना किस स्वरूप में गुजर रही है, उनकी संपत्ति पर इसका क्या असर पड़ेगा और भविष्य में किसी प्रकार की अतिरिक्त देनदारी या प्रतिबंध लागू होने की स्थिति है या नहीं.

याचिकाकर्ता की ओर से उठाया गया 20 से 25 हजार भवनों का आंकड़ा फिलहाल दावा है, जिसे संबंधित प्राधिकरण के प्रतिवेदन और आधिकारिक रिकॉर्ड से स्पष्ट किया जाना बाकी है. इसी तरह अतिरिक्त कर लगाए जाने का मुद्दा भी अभी न्यायालय के समक्ष उठाया गया पक्ष है, न कि अदालत द्वारा तय किया गया तथ्य. इसलिए इस मामले में अंतिम स्थिति मेट्रो कॉर्पोरेशन और संबंधित प्रशासनिक एजेंसियों के जवाब के बाद ही स्पष्ट होगी.

फिलहाल हाईकोर्ट ने निर्माण रोकने के बजाय परियोजना संचालक से जवाब मांगकर मामले को अगले चरण में पहुंचाया है. इससे एक ओर मेट्रो का काम जारी रहेगा, वहीं दूसरी ओर बदले हुए अलाइनमेंट और उससे जुड़े कानूनी तथा पर्यावरणीय सवालों पर संबंधित एजेंसी को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी.

8 सितंबर की सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि तब अदालत के सामने यह स्पष्ट हो सकता है कि बदले हुए मेट्रो अलाइनमेंट के लिए राजपत्र में संशोधन की आवश्यकता है या नहीं, प्रभावित भवनों की वास्तविक संख्या कितनी है, संपत्तियों पर अतिरिक्त कर का आधार क्या है और भूमिगत निर्माण के दौरान जल, विरासत तथा पर्यावरण संबंधी नियमों का किस तरह पालन किया जा रहा है. फिलहाल इंदौर के लिए सवाल केवल मेट्रो के भूमिगत मार्ग का नहीं, बल्कि उस मार्ग के ऊपर और नीचे रहने वाले हजारों लोगों के हितों से भी जुड़ गया है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-