एमपी सरकार को वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप जॉर्ज चौधरी को देने होंगे 78.65 लाख रुपये, दिल्ली हाईकोर्ट ने छह सप्ताह में भुगतान के दिए निर्देश

एमपी सरकार को वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप जॉर्ज चौधरी को देने होंगे 78.65 लाख रुपये, दिल्ली हाईकोर्ट ने छह सप्ताह में भुगतान के दिए निर्देश

प्रेषित समय :20:33:27 PM / Wed, Sep 2nd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. मध्य प्रदेश सरकार को सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप जॉर्ज चौधरी की बकाया पेशेवर फीस का भुगतान करना होगा. दिल्ली हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 78 लाख 65 हजार रुपये की राशि 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ अदा करने का निर्देश दिया है. अदालत ने भुगतान के लिए छह सप्ताह की समयसीमा तय की है. फैसला 31 अगस्त 2026 को न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने सुनाया.

मामला सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के समक्ष भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामलों में वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा की गई पैरवी और उससे संबंधित फीस के भुगतान से जुड़ा था. याचिकाकर्ता की ओर से इंदौर विकास प्राधिकरण और मध्य प्रदेश हाउसिंग बोर्ड से जुड़े मामलों में पेश होने का दावा किया गया था. उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार संविधान पीठ के समक्ष कई तारीखों पर उनकी उपस्थिति दर्ज हुई थी.

फीस को लेकर विवाद तब सामने आया जब बड़ी संख्या में बिल राज्य सरकार के समक्ष भुगतान के लिए रखे गए. कुल 35 बिलों में करीब 1.76 करोड़ रुपये की राशि का दावा किया गया था. राज्य सरकार ने इस दावे पर आपत्ति जताते हुए कहा कि अधिवक्ता की औपचारिक नियुक्ति या अधिकृत किए जाने का पर्याप्त आधार नहीं है. सरकार की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि मामला विवादित तथ्यों से जुड़ा है और ऐसे विवाद का फैसला रिट याचिका के माध्यम से नहीं किया जाना चाहिए.

हाईकोर्ट ने राज्य की इस दलील को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने रिकॉर्ड में मौजूद सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही और अन्य दस्तावेजों को महत्वपूर्ण माना. इनमें राज्य के अपने स्थायी अधिवक्ता की ओर से फीस बिलों को भुगतान के लिए आगे भेजे जाने संबंधी पत्राचार भी शामिल था. अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव की ओर से अधिवक्ता की नियुक्ति और फीस के भुगतान को लेकर स्वीकारोक्ति की गई थी.

फीस की गणना के स्तर पर अदालत ने प्रति पेशी 6.05 लाख रुपये, जिसमें क्लर्केज भी शामिल है, की दर को स्वीकार किया. हालांकि जिन दो संबंधित मामलों की सुनवाई एक साथ हुई, उनके लिए अलग-अलग पेशी शुल्क देने का दावा स्वीकार नहीं किया गया. इसी तरह सम्मेलन शुल्क के लिए पर्याप्त दस्तावेजी आधार नहीं मिलने पर उस हिस्से को भी मंजूरी नहीं दी गई.

सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड से समर्थित 13 पेशियों को आधार बनाकर हाईकोर्ट ने कुल देय राशि 78.65 लाख रुपये निर्धारित की. अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राशि याचिका दायर किए जाने की तारीख से भुगतान होने तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ देनी होगी.

इस फैसले में महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि अदालत ने केवल तकनीकी आधार पर पेशेवर फीस के दावे को खारिज करने से इनकार किया. उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड और राज्य के स्तर पर हुए पत्राचार को देखते हुए अदालत ने माना कि मामले को तय करने के लिए अलग से लंबी तथ्यात्मक सुनवाई की आवश्यकता नहीं है. इस तरह अदालत ने उस दावे को राहत दी, जिसे राज्य सरकार ने नियुक्ति और अधिकार के सवाल उठाते हुए चुनौती दी थी.

दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को छह सप्ताह के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया. अदालत के आदेश के बाद अब मध्य प्रदेश सरकार के सामने निर्धारित अवधि में 78.65 लाख रुपये और उस पर लागू ब्याज का भुगतान करने की जिम्मेदारी है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-