टोल प्लाजा से होगी हाईवे की निगरानी, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा एनएचएआई क्यों नहीं लगाता कैमरे, सड़क किनारे खड़े वाहनों पर जताई चिंता

टोल प्लाजा से होगी हाईवे की निगरानी, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा एनएचएआई क्यों नहीं लगाता कैमरे, सड़क किनारे खड़े वाहनों पर जताई चिंता

प्रेषित समय :22:11:50 PM / Thu, Sep 3rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली.राष्ट्रीय राजमार्गों पर अवैध कब्जे और सड़क किनारे खड़े वाहनों से होने वाले हादसों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है. सड़क सुरक्षा से जुड़े एक स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से पूछा कि टोल प्लाजा पर निगरानी कैमरे और नियंत्रण कक्ष स्थापित कर राजमार्गों की लगातार निगरानी क्यों नहीं की जा सकती. अदालत ने कहा कि केवल निरीक्षण और गश्त के लिए परिपत्र जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जिससे राजमार्गों पर होने वाली गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा सके.

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ राजस्थान के फलोदी क्षेत्र में हुए उस सड़क हादसे से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें 15 लोगों की जान चली गई थी. इस मामले में अदालत ने राजमार्गों पर दुर्घटनाओं के पीछे मौजूद परिस्थितियों को व्यापक रूप से देखने का फैसला किया है. सुनवाई के दौरान अवैध कब्जे और राजमार्गों पर वाहनों के खड़े रहने को दो प्रमुख समस्याओं के रूप में सामने रखा गया.

एनएचएआई की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि राजमार्गों पर अनधिकृत पार्किंग रोकने के लिए नियमित निरीक्षण और गश्त से संबंधित परिपत्र जारी किए गए हैं. इस पर पीठ ने निगरानी व्यवस्था को तकनीक से जोड़ने की संभावना पर सवाल किया. अदालत ने सुझाव दिया कि प्रत्येक टोल प्लाजा पर निगरानी की व्यवस्था के साथ नियंत्रण कक्ष बनाए जा सकते हैं, जहां से राजमार्ग के संबंधित हिस्सों पर नजर रखी जा सके.

मामले में शीर्ष अदालत की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एएनएस नडकरनी ने भी राजमार्गों पर अवैध रूप से वाहनों के खड़े होने को दुर्घटनाओं का एक प्रमुख कारण बताया. खासकर तेज गति वाले राजमार्गों पर बिना निर्धारित स्थान के भारी वाहनों का रुकना पीछे से आने वाले वाहनों के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है. ऐसे वाहन रात के समय या कम दृश्यता की स्थिति में और अधिक जोखिम पैदा कर सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी पाया कि सड़क सुरक्षा से जुड़े मामले में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, गृह मंत्रालय और तमिलनाडु सरकार की अनुपालन रिपोर्ट अभी दाखिल नहीं हुई है. अदालत ने दोनों केंद्रीय मंत्रालयों को रिपोर्ट दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया. तमिलनाडु सरकार को भी अगली सुनवाई से पहले अपना हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है. मामले की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर को होगी.

यह मामला नवंबर 2025 में राजस्थान के फलोदी क्षेत्र में हुए गंभीर सड़क हादसे के बाद शीर्ष अदालत द्वारा स्वतः संज्ञान में लिया गया था. 2 नवंबर को हुए इस हादसे में एक टेंपो ट्रैवलर सड़क पर खड़े ट्रेलर ट्रक से टकरा गया था. दुर्घटना मटोड़ा गांव के पास भारतमाला राजमार्ग पर हुई थी. टेंपो ट्रैवलर बीकानेर के कोलायत मंदिर से जोधपुर की ओर जा रहा था. हादसे में 15 लोगों की मौत हुई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 13 अप्रैल को राजमार्ग सुरक्षा को लेकर कई अंतरिम निर्देश जारी किए थे. अदालत ने कहा था कि कोई भी भारी या वाणिज्यिक वाहन राष्ट्रीय राजमार्ग के मुख्य मार्ग या पक्के किनारे वाले हिस्से पर खड़ा या रोका नहीं जा सकेगा, जब तक कि उसके लिए निर्धारित पार्किंग स्थल, ले-बाय या सड़क किनारे सुविधा उपलब्ध न हो. इसका उद्देश्य राजमार्ग के मुख्य यातायात मार्ग में खड़े वाहनों से पैदा होने वाले खतरे को रोकना है.

अदालत ने राष्ट्रीय राजमार्गों के अधिकार क्षेत्र में नए ढाबे, भोजनालय या व्यावसायिक ढांचे के निर्माण और संचालन पर भी रोक लगाई थी. सड़क की निर्धारित सीमा के भीतर अनधिकृत व्यावसायिक गतिविधियां न केवल यातायात व्यवस्था को प्रभावित करती हैं, बल्कि कई स्थानों पर वाहन रोकने और सड़क किनारे भीड़ बढ़ने का कारण भी बनती हैं.

शीर्ष अदालत ने सड़क दुर्घटनाओं के लिहाज से संवेदनशील स्थानों की पहचान करने का निर्देश भी दिया था. सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय तथा एनएचएआई को दुर्घटना संभावित क्षेत्रों और गंभीर जोखिम वाले स्थानों की पहचान कर राष्ट्रीय राजमार्गों के ऐसे सभी स्थानों की विस्तृत सूची तैयार कर सार्वजनिक करने को कहा गया था. इससे दुर्घटनाओं के पीछे मौजूद कारणों की पहचान कर सुधारात्मक कदम उठाने की दिशा में काम किया जा सकेगा.

अदालत ने पहले की सुनवाई में राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई और दुर्घटनाओं के आंकड़ों को लेकर भी चिंता जताई थी. देश की कुल सड़क लंबाई में राष्ट्रीय राजमार्गों की हिस्सेदारी लगभग दो प्रतिशत है, लेकिन सड़क हादसों में होने वाली मौतों में उनका हिस्सा करीब 30 प्रतिशत बताया गया. तेज गति वाले एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्गों पर यातायात की रफ्तार अधिक होने के कारण छोटी सी लापरवाही भी गंभीर दुर्घटना में बदल सकती है.

ताजा सुनवाई में कैमरा निगरानी का सुझाव इसी व्यापक सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा माना जा रहा है. यदि टोल प्लाजा से जुड़े क्षेत्रों में कैमरों के जरिए लगातार निगरानी होती है तो सड़क पर खड़े भारी वाहनों, अनधिकृत पार्किंग और संभावित अवरोधों की जानकारी समय रहते मिलने की संभावना बढ़ सकती है. इसके साथ ही संबंधित एजेंसियां मौके पर कार्रवाई के लिए तुरंत सक्रिय हो सकती हैं.

अब अगली सुनवाई में केंद्रीय मंत्रालयों और तमिलनाडु सरकार की अनुपालन रिपोर्ट पर अदालत की नजर रहेगी. साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि राजमार्गों पर निगरानी और दुर्घटना रोकने के लिए तकनीक के इस्तेमाल को लेकर एनएचएआई किस तरह की व्यवस्था सामने रखता है. शीर्ष अदालत की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि सड़क सुरक्षा को केवल दुर्घटना के बाद की कार्रवाई तक सीमित रखने के बजाय दुर्घटना होने से पहले जोखिम की पहचान और उसकी रोकथाम पर अधिक जोर देने की जरूरत है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-