कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस्तेमाल में दुनिया से आगे निकला भारतीय कार्यबल, माइक्रोसॉफ्ट की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस्तेमाल में दुनिया से आगे निकला भारतीय कार्यबल, माइक्रोसॉफ्ट की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

प्रेषित समय :22:51:08 PM / Thu, Sep 3rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस्तेमाल के मामले में अब केवल तकनीक अपनाने वाले देशों की कतार में नहीं है, बल्कि काम करने के तरीके को बदलने वाले देशों में दुनिया के सामने तेजी से आगे बढ़ रहा है. माइक्रोसॉफ्ट की 2026 कार्य प्रवृत्ति सूचकांक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल करने वाले 32 प्रतिशत पेशेवर ऐसे हैं, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से अपने काम करने के तरीके को नए सिरे से तैयार कर रहे हैं. यह वैश्विक औसत 16 प्रतिशत से दोगुना है. रिपोर्ट में अध्ययन किए गए 10 बाजारों में भारत इस मामले में सबसे आगे रहा है. यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि देश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल अब केवल समय बचाने या सामान्य काम को आसान बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि कर्मचारी इसके जरिए काम की पूरी प्रक्रिया को बदलने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

माइक्रोसॉफ्ट की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल करने वाले 78 प्रतिशत पेशेवरों का कहना है कि इसकी मदद से वे अब ऐसा काम कर पा रहे हैं, जो एक साल पहले उनके लिए संभव नहीं था. वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 58 प्रतिशत है. भारत के उन पेशेवरों में, जिन्हें रिपोर्ट ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ काम के नए तरीके विकसित करने वाले अग्रणी कर्मचारी माना है, यह आंकड़ा बढ़कर 85 प्रतिशत हो जाता है. यानी भारत में बड़ी संख्या में कर्मचारी कृत्रिम बुद्धिमत्ता को केवल एक सहायक साधन नहीं, बल्कि अपने काम की प्रकृति बदलने वाले माध्यम के रूप में देख रहे हैं.

माइक्रोसॉफ्ट के अनुसार ऐसे कर्मचारियों को ‘फ्रंटियर प्रोफेशनल्स’ कहा गया है. ये वे कर्मचारी हैं, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से एक के बाद एक कई चरणों वाले काम को पूरा करते हैं, काम को कृत्रिम बुद्धिमत्ता की क्षमता के अनुसार नए सिरे से व्यवस्थित करते हैं और अपनी टीम के लिए काम करने के नए मानक तैयार करते हैं. भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल करने वाले लगभग हर तीन में से एक कर्मचारी इस श्रेणी में आता है, जबकि दुनिया में यह अनुपात लगभग हर छह में से एक का है.

माइक्रोसॉफ्ट इंडिया और दक्षिण एशिया के अध्यक्ष पुनीत चंडोक ने रिपोर्ट में कहा कि भारत अब मानव और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ मिलकर काम करने की केवल योजना नहीं बना रहा, बल्कि उसे बड़े स्तर पर लागू भी कर रहा है. उनके अनुसार भारत में इस बदलाव की गति दूसरे देशों से पीछे रहने के बजाय एक तरह की बढ़त बन गई है. रिपोर्ट के निष्कर्षों से यह भी पता चलता है कि भारतीय कंपनियों और कर्मचारियों के बीच कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अपनाने की इच्छा के साथ-साथ उसके व्यावहारिक इस्तेमाल की क्षमता भी तेजी से विकसित हो रही है.

हालांकि इस बदलाव के बीच भारतीय कर्मचारियों ने एक बात बिल्कुल स्पष्ट रखी है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता इंसानी सोच का विकल्प नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार भारत में 63 प्रतिशत कर्मचारियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार सामग्री की गुणवत्ता जांचने को महत्वपूर्ण कौशल माना. यह आंकड़ा अध्ययन किए गए सभी बाजारों में सबसे अधिक रहा. वहीं 59 प्रतिशत भारतीय प्रतिभागियों ने महत्वपूर्ण सोच को आवश्यक कौशल बताया. इससे संकेत मिलता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद अंतिम निर्णय और सही-गलत की पहचान में मानवीय भूमिका बनी हुई है.

भारत में 87 प्रतिशत प्रतिभागियों ने कहा कि वे अब भी सोचने और निर्णय लेने की प्रक्रिया के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता से मिलने वाले परिणाम को अंतिम उत्तर नहीं, बल्कि आगे काम करने की शुरुआत मानते हैं. यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की क्षमताएं बढ़ने के साथ उसके परिणामों की जांच और उनके सही संदर्भ में इस्तेमाल की जिम्मेदारी भी बढ़ रही है. भारतीय कार्यबल इस संतुलन को महत्व देता दिखाई दे रहा है, जहां तकनीक काम को तेज और व्यापक बना सकती है, लेकिन अंतिम समझ और निर्णय इंसान के हाथ में रहता है.

रिपोर्ट में भारत में नेतृत्व स्तर पर भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर मजबूत समर्थन सामने आया है. भारत में 44 प्रतिशत प्रतिभागियों ने बताया कि उनके संगठन में नेतृत्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट रूप से साथ है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 26 प्रतिशत रहा. भारतीय प्रबंधक स्वयं भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल कर रहे हैं और कर्मचारियों को काम करने के तरीके बदलने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं. साथ ही उन्हें नए प्रयोग करने के लिए अवसर दिए जा रहे हैं.

माइक्रोसॉफ्ट के अनुसार भारत की 34 प्रतिशत संस्थाओं में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित काम की प्रक्रियाएं अलग-अलग विभागों के स्तर पर सक्रिय हो चुकी हैं. वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 26 प्रतिशत है. भारत में 25 प्रतिशत कर्मचारियों ने यह भी कहा कि यदि नए तरीके अपनाने से तत्काल परिणाम नहीं मिलते, तब भी उनके संगठन में नए प्रयोगों को प्रोत्साहित किया जाता है. वैश्विक स्तर पर ऐसा मानने वाले कर्मचारियों का अनुपात 13 प्रतिशत है. इससे संकेत मिलता है कि भारतीय कंपनियां कृत्रिम बुद्धिमत्ता को केवल तत्काल उत्पादकता बढ़ाने के साधन के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य के कामकाज को बदलने वाली तकनीक के रूप में देख रही हैं.

भारत की बड़ी सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों में भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते इस्तेमाल का असर दिखाई दे रहा है. माइक्रोसॉफ्ट के मुताबिक इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, विप्रो और एलटीएम ने छह महीने से भी कम समय में संयुक्त रूप से चार लाख से अधिक माइक्रोसॉफ्ट 365 कोपायलट लाइसेंस लिए. इंफोसिस में एक लाख से अधिक कर्मचारियों के लिए यह सुविधा उपलब्ध कराई गई है और हर महीने इसका सक्रिय इस्तेमाल करने वाले कर्मचारियों की संख्या 91 प्रतिशत से अधिक है.

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज में कृत्रिम बुद्धिमत्ता सुविधा का लाइसेंस रखने वाले 86 प्रतिशत कर्मचारी इसे अपने दैनिक काम में सक्रिय रूप से इस्तेमाल कर रहे हैं. कंपनी की कुछ चुनी हुई टीमों ने शोध और सामग्री तैयार करने जैसे कामों में 20 से 25 प्रतिशत तक उत्पादकता बढ़ने की जानकारी दी है. वहीं विप्रो में मासिक सक्रिय इस्तेमाल 95 प्रतिशत से अधिक हो गया है. कंपनी के कर्मचारी हर महीने करीब 75 लाख बार कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सवाल या निर्देश दर्ज कर रहे हैं. माइक्रोसॉफ्ट के अनुसार इससे विप्रो में हर तिमाही दो लाख 50 हजार से अधिक पूर्णकालिक कर्मचारी-दिवस के बराबर समय की बचत हुई है.

इन आंकड़ों के बीच सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब भारतीय कार्यस्थलों में केवल प्रयोग के स्तर पर नहीं रह गई है. इसका इस्तेमाल शोध, सामग्री निर्माण, जानकारी जुटाने, विश्लेषण और रोजमर्रा के कई दूसरे कार्यों में बढ़ रहा है. कंपनियां जहां कर्मचारियों का समय बचाने और काम की क्षमता बढ़ाने पर ध्यान दे रही हैं, वहीं कर्मचारी भी अपने काम को नए तरीके से व्यवस्थित करना सीख रहे हैं.

माइक्रोसॉफ्ट की रिपोर्ट भारत के सामने एक बड़ी संभावना के साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी रखती है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अपनाने में तेजी निश्चित रूप से भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बढ़त दे सकती है, लेकिन इस बढ़त को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए प्रशिक्षित कार्यबल, सही नेतृत्व, गुणवत्ता जांच और मानवीय निर्णय की भूमिका को मजबूत रखना होगा. तकनीक जितनी तेजी से आगे बढ़ेगी, उतना ही जरूरी होगा कि कर्मचारी उसके परिणामों को समझने और परखने की क्षमता भी विकसित करें.

रिपोर्ट का व्यापक संकेत यही है कि भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दौर केवल अधिक तेजी से काम करने का दौर नहीं है. यह काम की प्रकृति बदलने का दौर है. भारतीय कर्मचारी जिस तेजी से कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अपने काम में शामिल कर रहे हैं और उसके साथ नई कार्यप्रणालियां विकसित कर रहे हैं, वह देश के लिए आर्थिक और तकनीकी दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण अवसर पैदा कर सकता है. आने वाले समय में कंपनियों की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि उनके पास कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सुविधा है या नहीं, बल्कि इससे होगी कि उनके कर्मचारी उसके साथ कितनी समझदारी, रचनात्मकता और जिम्मेदारी से काम कर पाते हैं. माइक्रोसॉफ्ट के अध्ययन में भारत का शीर्ष स्थान इसी बदलती कार्यसंस्कृति की ओर एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-