डिजिटल अरेस्ट के 42 करोड़ रुपये के नेटवर्क पर सीबीआई की कार्रवाई, 20 राज्यों में 89 ठिकानों पर तलाशी, तीन गिरफ्तार

डिजिटल अरेस्ट के 42 करोड़ रुपये के नेटवर्क पर सीबीआई की कार्रवाई, 20 राज्यों में 89 ठिकानों पर तलाशी, तीन गिरफ्तार

प्रेषित समय :22:25:14 PM / Fri, Sep 4th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. डिजिटल अरेस्ट के नाम पर लोगों को कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारी का भय दिखाकर करोड़ों रुपये की ठगी करने वाले साइबर अपराध नेटवर्क के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो ने देशव्यापी कार्रवाई की है. सीबीआई ने 20 राज्यों में एक साथ 89 ठिकानों पर तलाशी ली और कार्रवाई के दौरान तीन लोगों को गिरफ्तार किया. जांच एजेंसी का फोकस केवल उन लोगों तक पहुंचना नहीं है, जिन्होंने पीड़ितों को फोन या वीडियो काल के जरिये डराकर रकम स्थानांतरित कराई, बल्कि उन लोगों की भूमिका भी सामने लाना है, जिनके बैंक खातों में ठगी की रकम पहुंची और जिन्होंने उसे आगे दूसरे खातों में भेजकर उसके स्रोत को छिपाने की कोशिश की.

सीबीआई अधिकारियों के मुताबिक यह कार्रवाई तीन अलग-अलग साइबर अपराध मामलों की जांच के सिलसिले में की गई है. इन तीन मामलों में पीड़ितों से कुल 42 करोड़ 36 लाख रुपये से अधिक की ठगी किए जाने का आरोप है. गुजरात, राजस्थान के पिलानी और कर्नाटक से जुड़े इन मामलों में पीड़ितों को कथित तौर पर लंबे समय तक डिजिटल अरेस्ट की स्थिति में रखा गया. अपराधियों ने खुद को पुलिस अधिकारी अथवा अन्य सरकारी अधिकारी बताकर पीड़ितों को यह विश्वास दिलाया कि वे किसी गंभीर आपराधिक मामले में जांच के घेरे में हैं. इसके बाद कानूनी कार्रवाई से बचाने या जांच पूरी होने तक रकम सुरक्षित रखने के नाम पर उनसे बड़ी धनराशि विभिन्न खातों में स्थानांतरित कराई गई.

गुजरात से जुड़े मामले में सबसे अधिक 19 करोड़ 24 लाख रुपये की ठगी का आरोप है. जांच के अनुसार पीड़ित को करीब तीन महीने तक डिजिटल अरेस्ट में रखा गया. कथित आरोपितों ने खुद को पुलिस अधिकारी बताकर उसे एक अपराध की जांच में फंसे होने का भय दिखाया और लगातार अपने निर्देशों का पालन करने के लिए मजबूर किया. लंबे समय तक बनाए गए इस मानसिक दबाव के दौरान पीड़ित से बड़ी रकम कथित तौर पर ठग ली गई.

राजस्थान के पिलानी का मामला भी इसी तरह की कार्यप्रणाली से जुड़ा है. यहां एक प्रतिष्ठित निजी विश्वविद्यालय से जुड़े व्यक्ति को कथित तौर पर तीन महीने तक डिजिटल अरेस्ट में रखा गया और उससे 7 करोड़ 67 लाख रुपये की रकम ठग ली गई. तीसरा मामला कर्नाटक का है, जहां पीड़ित को करीब एक महीने तक इसी तरह के दबाव में रखने के बाद 15 करोड़ 45 लाख रुपये की ठगी किए जाने का आरोप है. तीनों मामलों की रकम को जोड़ने पर राशि 42 करोड़ रुपये से अधिक पहुंचती है.

इन मामलों की जांच में अब सीबीआई का ध्यान उस वित्तीय तंत्र पर है, जिसके जरिये ठगी की रकम को एक खाते से दूसरे खाते तक पहुंचाया गया. जांच एजेंसी ने बैंक खातों, ऑनलाइन खातों तक पहुंच से जुड़े आंकड़ों और तकनीकी गतिविधियों का विश्लेषण करने के बाद तलाशी की कार्रवाई की. अधिकारियों के अनुसार इस विश्लेषण से ऐसे लोगों और खातों की पहचान करने में मदद मिली, जिनका इस्तेमाल ठगी की रकम प्राप्त करने और उसे आगे स्थानांतरित करने के लिए किया गया.

सीबीआई की कार्रवाई का यह हिस्सा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि साइबर ठगी में पीड़ित से रकम हासिल करना अपराध की आखिरी कड़ी नहीं होती. रकम सीधे मुख्य आरोपित के खाते में रखे जाने के बजाय कई बार अलग-अलग खातों में भेजी जाती है. इस प्रक्रिया में खाते उपलब्ध कराने वाले लोगों की भूमिका सामने आती है. रकम को एक खाते से दूसरे खाते में तेजी से भेजने, कुछ हिस्सा नकद निकालने या अलग-अलग डिजिटल माध्यमों से आगे स्थानांतरित करने का उद्देश्य कथित तौर पर धन के मूल स्रोत और अंतिम लाभार्थी के बीच की कड़ी को मुश्किल बनाना होता है.

तलाशी के दौरान गिरफ्तार किए गए तीन लोगों की भूमिका इसी वित्तीय नेटवर्क से जुड़ी बताई गई है. हरियाणा निवासी आकाश पर आरोप है कि उसके बैंक खाते में ठगी की रकम में से करीब 1 करोड़ 95 लाख रुपये पहुंचे. सीबीआई के अनुसार उसने खाता खुलवाया और रकम आने के बाद उसे उसी दिन दूसरे खातों में स्थानांतरित कर दिया. जांच एजेंसी का दावा है कि इस तरह रकम को तत्काल आगे भेजने से उसके खाते के इस्तेमाल और कथित धनशोधन में उसकी भूमिका सामने आई.

दूसरा गिरफ्तार व्यक्ति पश्चिम बंगाल के कोलकाता का रहने वाला राजा बताया गया है. उसके फर्म के खाते में कथित तौर पर 1 करोड़ 50 लाख रुपये की ठगी की रकम पहुंची. सीबीआई अब यह जांच कर रही है कि फर्म के खाते का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया, रकम कहां से आई और उसके बाद वह किन खातों में पहुंची. इस तरह की जांच में बैंकिंग दस्तावेजों के साथ डिजिटल लेन-देन और संबंधित व्यक्तियों के बीच संपर्क की जानकारी भी महत्वपूर्ण हो सकती है.

तीसरी गिरफ्तार महिला की पहचान ज्योति के रूप में बताई गई है. सीबीआई के अनुसार उसके बैंक खाते में भी एक पीड़ित से ठगी गई रकम का हिस्सा पहुंचा. आरोप है कि उसने रकम का एक हिस्सा नकद निकाला और शेष रकम दूसरे खातों में स्थानांतरित कर दी. जांच एजेंसी इस लेन-देन को ठगी की रकम के प्रवाह को अलग-अलग हिस्सों में बांटने की प्रक्रिया के तौर पर देख रही है. हालांकि आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान होगी.

सीबीआई अधिकारियों के मुताबिक तलाशी अभियान का उद्देश्य ठगी की रकम के रास्ते का पता लगाने के साथ-साथ ऐसे दस्तावेज और डिजिटल सामग्री हासिल करना भी था, जिनसे अपराध में शामिल अन्य लोगों की पहचान हो सके. जांच एजेंसी ने बैंक खातों और ऑनलाइन गतिविधियों के तकनीकी विश्लेषण को तलाशी की कार्रवाई का आधार बनाया. इससे संकेत मिलता है कि जांच अब केवल पारंपरिक पूछताछ पर निर्भर नहीं है, बल्कि बैंकिंग रिकॉर्ड और डिजिटल गतिविधियों को जोड़कर पूरे नेटवर्क की संरचना समझने का प्रयास किया जा रहा है.

डिजिटल अरेस्ट की कार्यप्रणाली ने साइबर अपराध की गंभीरता को एक नया रूप दिया है. अपराधी आमतौर पर पीड़ित को किसी अनजान नंबर से फोन करते हैं और दावा करते हैं कि उसके नाम से कोई आपराधिक गतिविधि हुई है या उसका मोबाइल नंबर, बैंक खाता अथवा पहचान दस्तावेज किसी अपराध से जुड़ा पाया गया है. इसके बाद फर्जी पुलिस अधिकारी, जांच अधिकारी या अन्य सरकारी अधिकारी बनकर वीडियो काल के माध्यम से पूछताछ की जाती है. पीड़ित को यह विश्वास दिलाया जाता है कि यदि उसने निर्देशों का पालन नहीं किया तो उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा.

इस पूरी प्रक्रिया में अपराधी पीड़ित को परिवार और परिचितों से संपर्क करने से रोकने का प्रयास भी कर सकते हैं. उसे लगातार वीडियो काल पर बने रहने और अपनी गतिविधियों पर निगरानी रखने के लिए कहा जाता है. इसी मानसिक दबाव में उससे बैंक खाते की जानकारी, धनराशि स्थानांतरित करने या किसी खाते में रकम जमा करने के लिए कहा जाता है. कई मामलों में पीड़ित यह समझ ही नहीं पाता कि जिस व्यक्ति से वह बात कर रहा है वह वास्तविक सरकारी अधिकारी नहीं, बल्कि साइबर अपराधी है.

सीबीआई की मौजूदा कार्रवाई इसी वजह से व्यापक महत्व रखती है. यदि जांच केवल फोन करने वाले व्यक्ति तक सीमित रहती है तो अपराध का एक छोटा हिस्सा ही सामने आता है. इसके विपरीत बैंक खातों, धन के हस्तांतरण और डिजिटल संपर्कों की कड़ियां जोड़ने पर उन लोगों तक पहुंचा जा सकता है, जो पर्दे के पीछे रहकर पूरे नेटवर्क को आर्थिक आधार उपलब्ध कराते हैं.

यह कार्रवाई ‘ऑपरेशन चक्र-छह’ के तहत की गई है. अभियान के जरिये देशभर में सक्रिय डिजिटल अरेस्ट और संगठित साइबर अपराध नेटवर्क पर कार्रवाई की जा रही है. सीबीआई अब उन अन्य आरोपितों की तलाश में है, जो पीड़ितों से संपर्क करने, सरकारी अधिकारियों की फर्जी पहचान तैयार करने, बैंक खाते उपलब्ध कराने, रकम प्राप्त करने और उसे आगे भेजने में कथित तौर पर शामिल हो सकते हैं.

डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने भी गंभीरता दिखाई है और सीबीआई को ऐसे अपराधों तथा उनसे जुड़े व्यापक नेटवर्क के खिलाफ समन्वित कार्रवाई के निर्देश दिए हैं. इसके बाद जांच एजेंसी के सामने चुनौती केवल अलग-अलग राज्यों में दर्ज मामलों की जांच करना नहीं, बल्कि उनके बीच मौजूद साझा नेटवर्क और वित्तीय कड़ियों को तलाशना भी है.

सीबीआई अधिकारियों के अनुसार गिरफ्तार किए गए तीन लोगों से पूछताछ में उनकी भूमिका और उनके संपर्कों के बारे में और जानकारी सामने आ सकती है. जांच एजेंसी यह भी पता लगाने में जुटी है कि 89 ठिकानों से मिले संभावित दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य इस नेटवर्क की कितनी परतें खोलते हैं. साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि अलग-अलग राज्यों में सामने आए बैंक खातों और डिजिटल माध्यमों के बीच कोई साझा संपर्क मौजूद है या नहीं.

अभी इस मामले में जांच जारी है और अन्य आरोपितों की तलाश की जा रही है. सीबीआई का प्रयास ठगी की रकम के पूरे रास्ते को सामने लाने का है, ताकि यह पता चल सके कि पीड़ितों से हासिल धन आखिर किन-किन लोगों तक पहुंचा. इस जांच से यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली करोड़ों रुपये की ठगी में कौन लोग प्रत्यक्ष रूप से पीड़ितों को निशाना बनाते हैं और कौन लोग पर्दे के पीछे रहकर धन के लेन-देन की व्यवस्था संभालते हैं.

20 राज्यों में 89 ठिकानों पर हुई एक साथ कार्रवाई ने इस साइबर अपराध की राष्ट्रीय पहुंच को सामने रखा है. तीन मामलों में 42 करोड़ रुपये से अधिक की कथित ठगी और रकम को अलग-अलग खातों के जरिये आगे बढ़ाने के आरोप बताते हैं कि डिजिटल अरेस्ट को केवल एक फोन आधारित धोखाधड़ी मानना पर्याप्त नहीं होगा. इसके पीछे तकनीकी छल, मानसिक दबाव और वित्तीय लेन-देन की कई परतें हो सकती हैं. अब सीबीआई की जांच का अगला महत्वपूर्ण चरण इन्हीं परतों को खोलना और उस पूरे नेटवर्क तक पहुंचना है, जो कथित तौर पर लोगों को डिजिटल अरेस्ट के जाल में फंसाकर उनकी मेहनत की करोड़ों रुपये की कमाई तक पहुंच बना रहा था.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-