नई दिल्ली. दिल्ली की साकेत अदालत ने विवाहेतर संबंध से जुड़े 50 लाख रुपये के हर्जाने के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी विवाहित पुरुष का दूसरी महिला से संबंध होना या उस संबंध से बच्चे का जन्म होना, मात्र इसी आधार पर उस महिला को वैवाहिक संबंध तोड़ने के लिए आर्थिक हर्जाने का जिम्मेदार नहीं बनाया जा सकता. अदालत ने कहा कि ‘एलियनेशन ऑफ अफेक्शन’ यानी पति-पत्नी के बीच प्रेम और स्नेह में जानबूझकर दूरी पैदा करने के दावे के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि विवाह में पहले से वास्तविक प्रेम और स्नेह मौजूद था और तीसरे व्यक्ति के सक्रिय तथा अनुचित हस्तक्षेप के कारण वह संबंध समाप्त हुआ.
जिला न्यायाधीश अतुल अहलावत ने पत्नी की ओर से दायर 50 लाख रुपये के मुआवजा दावे को खारिज करते हुए कहा कि केवल विवाहेतर संबंध की मौजूदगी किसी तीसरे व्यक्ति के खिलाफ हर्जाने का स्वतः आधार नहीं बनती. अदालत के अनुसार, इस तरह के दावे में वादी को यह स्थापित करना होगा कि विवाह में पहले से वास्तविक प्रेम और स्नेह था, तीसरे व्यक्ति ने जानबूझकर उस वैवाहिक संबंध में हस्तक्षेप किया और उसके हस्तक्षेप के कारण पति-पत्नी के बीच मौजूद प्रेम एवं स्नेह खत्म हुआ.
मामले में पत्नी का आरोप था कि उसके पति और दूसरी महिला के बीच वर्ष 2009 से संबंध थे. महिला को पति के विवाहित होने की जानकारी होने के बावजूद उसने कथित रूप से वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप किया. पत्नी ने अपने दावे के समर्थन में कई दस्तावेज अदालत के समक्ष रखे. इनमें तस्वीरें, फोन और यात्रा से संबंधित रिकॉर्ड, बैंक लेन-देन, होटल के बिल तथा दूसरी महिला से जन्मे बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र शामिल था. पत्नी का कहना था कि इन दस्तावेजों से पति और दूसरी महिला के संबंध तथा उसके वैवाहिक जीवन पर पड़े प्रभाव का पता चलता है.
मामले की सुनवाई के दौरान हालांकि पत्नी के अपने बयानों से अदालत के सामने अलग तस्वीर उभरी. जिरह के दौरान उसने स्वीकार किया कि उसके पति के जीवन में दूसरी महिला के आने से पहले ही वैवाहिक संबंधों में गंभीर मतभेद मौजूद थे. रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2003 से 2009 के बीच पति-पत्नी के बीच विवाह परामर्श की प्रक्रिया भी चली थी. पत्नी ने यह भी बताया कि उसका पति वर्ष 2010 से विवाह समाप्त करने की योजना बना रहा था.
अदालत ने इन तथ्यों को महत्वपूर्ण माना. पीठ के समक्ष उपलब्ध सामग्री से यह स्पष्ट नहीं हो सका कि दूसरी महिला के कथित हस्तक्षेप से पहले पति-पत्नी के बीच ऐसा मजबूत प्रेम और स्नेह मौजूद था, जिसे बाद में तीसरे व्यक्ति ने समाप्त कर दिया. अदालत ने माना कि जब विवाह पहले से ही गंभीर मतभेदों और तनाव से गुजर रहा था तो केवल बाद में सामने आए विवाहेतर संबंध को वैवाहिक संबंध टूटने का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता.
साकेत अदालत ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के Pinakin Mahipatray Rawal बनाम State of Gujarat मामले में की गई टिप्पणियों का भी उल्लेख किया. अदालत ने माना कि तीसरे व्यक्ति की भूमिका का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसका किसी विवाहित व्यक्ति से संबंध था. यह भी देखना होगा कि क्या उसने वैवाहिक संबंध में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप किया, क्या उसका उद्देश्य उस संबंध को प्रभावित करना था और क्या उसके आचरण के कारण पति-पत्नी के बीच मौजूद प्रेम और स्नेह वास्तव में समाप्त हुआ.
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि दो बालिग व्यक्तियों के बीच सहमति से बना विवाहेतर संबंध अपने आप में ‘एलियनेशन ऑफ अफेक्शन’ के दावे की सभी कानूनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता. इसी तरह उस संबंध से बच्चे का जन्म होना भी अपने आप में तीसरी महिला को हर्जाने के लिए उत्तरदायी नहीं बनाता. हर्जाने के दावे के लिए विवाह की वास्तविक स्थिति और तीसरे व्यक्ति की कथित भूमिका के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित करना आवश्यक है.
अदालत ने मामले में पेश किए गए दस्तावेजों को भी इसी कसौटी पर देखा. तस्वीरें, फोन रिकॉर्ड, यात्रा संबंधी विवरण, बैंक रिकॉर्ड, होटल के बिल और बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र संबंधों के अस्तित्व की ओर संकेत कर सकते हैं, लेकिन केवल इनसे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि दूसरी महिला ने जानबूझकर एक स्वस्थ वैवाहिक संबंध को तोड़ने के लिए हस्तक्षेप किया था. अदालत ने कहा कि संबंध का अस्तित्व और वैवाहिक स्नेह को समाप्त करने के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार होना दो अलग-अलग बातें हैं.
फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि अदालत ने वैवाहिक संबंध के पूरे घटनाक्रम को देखने पर जोर दिया. यदि पति-पत्नी के बीच पहले से गंभीर मतभेद थे, विवाह परामर्श हो चुका था और पति पहले ही विवाह समाप्त करने की इच्छा व्यक्त कर चुका था, तो बाद में सामने आए किसी संबंध को अकेले विवाह टूटने का कारण मानने के लिए अतिरिक्त ठोस साक्ष्य की आवश्यकता होगी.
अदालत ने यह भी माना कि वैवाहिक विवाद से उत्पन्न भावनात्मक पीड़ा और कानूनी रूप से सिद्ध होने वाला आर्थिक दायित्व अलग-अलग विषय हैं. किसी पत्नी या पति को विवाहेतर संबंध के कारण मानसिक और भावनात्मक आघात पहुंच सकता है, लेकिन किसी तीसरे व्यक्ति से आर्थिक क्षतिपूर्ति दिलाने के लिए अदालत के समक्ष कानूनी आधार और आवश्यक तत्वों का प्रमाण होना जरूरी है.
इस मामले में पत्नी यह साबित नहीं कर सकीं कि दूसरी महिला के जीवन में आने से पहले उनके विवाह में वास्तविक और प्रभावी प्रेम एवं स्नेह मौजूद था और उसी महिला के दुर्भावनापूर्ण हस्तक्षेप के कारण वह समाप्त हुआ. अदालत ने इसी आधार पर 50 लाख रुपये के हर्जाने का दावा खारिज कर दिया.
फैसले का व्यापक महत्व इसलिए है क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि विवाहेतर संबंध और ‘एलियनेशन ऑफ अफेक्शन’ के दावे को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता. किसी संबंध का होना अपने आप में तीसरे व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी तय नहीं करता. अदालत को यह देखना होगा कि क्या तीसरे व्यक्ति ने सक्रिय रूप से वैवाहिक रिश्ते में हस्तक्षेप किया और क्या उसके कारण पहले से मौजूद वैवाहिक प्रेम एवं स्नेह का वास्तविक रूप से विघटन हुआ.
साकेत अदालत के इस फैसले से यह संदेश भी सामने आता है कि ऐसे मामलों में केवल आरोप या संबंधों के दस्तावेज पर्याप्त नहीं होंगे. हर्जाने का दावा करने वाले पक्ष को विवाह की पूर्व स्थिति, प्रेम और स्नेह के अस्तित्व तथा तीसरे व्यक्ति के कथित जानबूझकर हस्तक्षेप के बीच स्पष्ट कानूनी और तथ्यात्मक संबंध स्थापित करना होगा. इसी कसौटी पर पत्नी का 50 लाख रुपये का दावा अदालत ने अस्वीकार कर दिया.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

