पति जहां नौकरी के लिए जाए पत्नी का हर जगह साथ चलना जरूरी नहीं, मद्रास हाई कोर्ट ने वोडाफोन के पग का दिया सहज उदाहरण

पति जहां नौकरी के लिए जाए पत्नी का हर जगह साथ चलना जरूरी नहीं, मद्रास हाई कोर्ट ने वोडाफोन के पग का दिया सहज उदाहरण

प्रेषित समय :21:34:51 PM / Fri, Sep 4th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

मदुरै. वैवाहिक जीवन में पति-पत्नी का साथ रहना सामान्य अपेक्षा हो सकती है, लेकिन रोजगार, स्थानांतरण और अन्य व्यावहारिक परिस्थितियों के कारण दोनों का अलग-अलग रहना अपने आप में वैवाहिक अपराध या वैवाहिक दायित्वों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता. मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने एक वैवाहिक विवाद की सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए फैमिली कोर्ट की उस सोच को खारिज कर दिया, जिसमें पति के नौकरी के सिलसिले में दूसरे शहर चले जाने और पत्नी को साथ नहीं ले जाने को वैवाहिक दायित्वों के उल्लंघन के रूप में देखा गया था. कोर्ट ने चर्चित वोडाफोन विज्ञापन का उदाहरण देते हुए कहा कि पत्नी से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह हर परिस्थिति में पति के पीछे उसी तरह चलती रहे, जैसे उस विज्ञापन में पग अपने मालिक के पीछे चलता दिखाई देता था.

यह टिप्पणी मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच की डिवीजन बेंच ने A v. P, CMA(MD) No. 967 of 2021 मामले में की. मामले की सुनवाई जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस एम.डी. सुमति की पीठ ने की. विवाद की पृष्ठभूमि में पति-पत्नी के बीच लंबे समय से चला आ रहा अलगाव था. दोनों करीब 16 वर्षों से अलग रह रहे थे और वैवाहिक संबंधों में इतनी दूरी और कड़वाहट पैदा हो चुकी थी कि उनके फिर से साथ आने की संभावना बेहद कम रह गई थी.

मामले में पति रोजगार के सिलसिले में मुंबई चला गया था. फैमिली कोर्ट के समक्ष तलाक की कार्यवाही के दौरान इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना गया कि पति ने नौकरी के लिए दूसरे शहर जाने के बाद पत्नी को अपने साथ नहीं रखा. फैमिली कोर्ट की reasoning यह थी कि पति का इस प्रकार पत्नी से अलग रहना और उसे अपने साथ नहीं ले जाना वैवाहिक दायित्वों के निर्वहन में कमी को दर्शाता है. इसी आधार पर फैमिली कोर्ट ने पति को राहत देने से इनकार किया था.

हाई कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया. डिवीजन बेंच ने कहा कि आधुनिक जीवन में रोजगार और पेशे से जुड़ी परिस्थितियां कई बार पति-पत्नी को अलग-अलग स्थानों पर रहने के लिए मजबूर कर सकती हैं. नौकरी के कारण किसी व्यक्ति को दूसरे शहर में जाना पड़ सकता है और हर बार यह संभव नहीं होता कि उसका जीवनसाथी भी उसी समय उसके साथ वहां चला जाए. इसलिए केवल इस तथ्य से कि पति नौकरी के लिए दूसरे शहर गया और पत्नी उसके साथ नहीं गई, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पति ने वैवाहिक दायित्वों का उल्लंघन किया है.

इसी संदर्भ में कोर्ट की पग वाली टिप्पणी सामने आई, जिसने इस फैसले को विशेष रूप से चर्चा में ला दिया. कोर्ट ने कहा कि पत्नी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह उस चर्चित वोडाफोन विज्ञापन में दिखाई देने वाले पग की तरह पति के पीछे-पीछे चलती रहे. यह उदाहरण देते हुए कोर्ट ने मूल रूप से वैवाहिक संबंधों में दोनों पक्षों की स्वतंत्र परिस्थितियों और व्यावहारिक जरूरतों को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया. कोर्ट का संकेत था कि विवाह का अर्थ यह नहीं है कि पति की नौकरी, पदस्थापना या स्थान परिवर्तन के साथ पत्नी का हर स्थिति में उसी स्थान पर जाना अनिवार्य हो जाए.

मामले में पति की ओर से पत्नी के खिलाफ विवाहेतर संबंध का आरोप भी लगाया गया था. हालांकि, हाई कोर्ट ने इस आरोप को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने इस पहलू पर ध्यान दिया कि जिस व्यक्ति को कथित रूप से पत्नी का प्रेमी बताया गया था, उसे कार्यवाही में पक्षकार ही नहीं बनाया गया था. ऐसे में केवल आरोप के आधार पर वैवाहिक संबंधों को समाप्त करने के लिए उस दावे को निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता था. इस तरह हाई कोर्ट ने पति द्वारा लगाए गए विवाहेतर संबंध के आरोप को भी तलाक का स्वतः सिद्ध आधार नहीं माना.

इसके बावजूद, कोर्ट ने पूरे वैवाहिक विवाद की परिस्थितियों को व्यापक रूप से देखा. पीठ के सामने सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि पति-पत्नी लगभग 16 वर्षों से अलग रह रहे थे. इतने लंबे समय तक अलग रहने के दौरान संबंधों में गहरी कड़वाहट पैदा हो चुकी थी और वैवाहिक जीवन की वह भावनात्मक एवं व्यावहारिक निरंतरता समाप्त हो चुकी थी, जो किसी विवाह को वास्तविक रूप से बनाए रखने के लिए आवश्यक होती है. कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए माना कि यह विवाह व्यावहारिक रूप से सुधार से परे स्थिति में पहुंच चुका है और दोनों के बीच फिर से वैवाहिक जीवन शुरू होने की वास्तविक संभावना नहीं दिखाई देती.

हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय तक टूटे हुए वैवाहिक संबंध को केवल औपचारिक रूप से बनाए रखना हमेशा व्यावहारिक समाधान नहीं हो सकता. जब पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे हों, उनके बीच गंभीर मतभेद और कड़वाहट हो तथा साथ रहने की कोई वास्तविक संभावना दिखाई नहीं देती हो, तब न्यायालय को पूरे विवाद की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखना होता है. इसी व्यापक परिस्थिति को देखते हुए हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया और पति को तलाक की डिक्री प्रदान कर दी.

हालांकि, तलाक प्रदान करते हुए कोर्ट ने पत्नी के आर्थिक हितों का भी ध्यान रखा. पीठ ने पत्नी के लिए सात लाख रुपये की गुजारा भत्ता राशि निर्धारित की. साथ ही यह महत्वपूर्ण शर्त भी रखी गई कि जब तक यह राशि जमा नहीं की जाती, तब तक तलाक की डिक्री प्रभावी नहीं होगी. इस व्यवस्था के माध्यम से कोर्ट ने एक ओर लंबे समय से निष्प्रभावी हो चुके वैवाहिक संबंध को समाप्त करने का रास्ता साफ किया, वहीं दूसरी ओर पत्नी के आर्थिक हितों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया.

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें वैवाहिक दायित्वों की व्याख्या को केवल पति-पत्नी के साथ रहने की पारंपरिक धारणा तक सीमित नहीं रखा गया. कोर्ट ने रोजगार और जीवन की व्यावहारिक परिस्थितियों को भी वैवाहिक विवादों के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण माना. पति का नौकरी के लिए दूसरे शहर जाना और पत्नी का उसके साथ नहीं जाना अपने आप में ऐसा आचरण नहीं है, जिसे वैवाहिक गलती माना जाए. इसी तरह पत्नी की अपनी परिस्थितियां और स्वतंत्र निर्णय भी विवाह के भीतर सम्मान के योग्य हैं.

फैसले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाई कोर्ट ने तलाक देने के लिए पति के विवाहेतर संबंध के आरोप पर निर्भरता नहीं दिखाई. आरोप स्वीकार नहीं किए जाने के बावजूद अदालत ने विवाह की वास्तविक स्थिति, करीब 16 वर्षों के अलगाव, संबंधों में पैदा हुई गहरी कड़वाहट और सुलह की समाप्त हो चुकी संभावना को समग्र रूप से देखा. इस आधार पर अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि विवाह को केवल कानूनी अस्तित्व के नाम पर बनाए रखना व्यावहारिक नहीं रह गया है.

A v. P, CMA(MD) No. 967 of 2021 में मद्रास हाई कोर्ट की यह टिप्पणी विवाह संस्था के भीतर व्यक्तिगत परिस्थितियों, रोजगार की अनिवार्यताओं और पति-पत्नी की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की ओर भी संकेत करती है. पग वाले विज्ञापन का सहज उदाहरण भले ही सुनने में हल्का लगे, लेकिन उसके पीछे कोर्ट का संदेश गंभीर है—विवाह साथ चलने का संबंध है, किसी एक व्यक्ति के पीछे दूसरे के अनिवार्य रूप से चलते रहने का नहीं. पति और पत्नी दोनों की परिस्थितियों को समझे बिना केवल अलग रहने के तथ्य से वैवाहिक दोष तय नहीं किया जा सकता.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-