नौकरी जारी रखने के बावजूद 100 प्रतिशत कार्यात्मक अक्षमता, सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजा बढ़ाकर 3 करोड़ 77 लाख रुपये किया

नौकरी जारी रखने के बावजूद 100 प्रतिशत कार्यात्मक अक्षमता, सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजा बढ़ाकर 3 करोड़ 77 लाख रुपये किया

प्रेषित समय :21:44:11 PM / Fri, Sep 4th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. मोटर दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल कोई व्यक्ति हादसे के बाद भी नौकरी करता रहे तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी कमाने की क्षमता सामान्य बनी हुई है. यदि वह विशेष सॉफ्टवेयर, सहायक तकनीक, लचीले काम के घंटे और नियोक्ता की अतिरिक्त सुविधाओं के सहारे काम कर पा रहा है, तो मुआवजा तय करते समय उसकी वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि कार्यात्मक अक्षमता का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि पीड़ित खुले और प्रतिस्पर्धी श्रम बाजार में अपनी क्षमता के अनुरूप कितना कमा सकता है, न कि केवल इस आधार पर कि किसी विशेष नियोक्ता ने उसे सुविधाएं देकर नौकरी पर बनाए रखा है. इसी आधार पर अदालत ने गंभीर रूप से घायल महिला की कार्यात्मक अक्षमता को 100 प्रतिशत मानते हुए उनका मुआवजा बढ़ाकर 3,77,84,297 रुपये कर दिया.

जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने Reliance General Insurance Company v. Priyanka Das & Ors. मामले में यह फैसला सुनाया. मामला मोटर दुर्घटना मुआवजे से जुड़ा था और इसमें अदालत के सामने यह महत्वपूर्ण सवाल था कि किसी व्यक्ति की वास्तविक कार्यात्मक अक्षमता का निर्धारण किस आधार पर किया जाए, खासकर तब जब वह दुर्घटना के बाद भी नौकरी में बना हुआ हो.

मामला वर्ष 2011 की एक गंभीर सड़क दुर्घटना से जुड़ा है. दुर्घटना के समय पीड़िता 35 वर्ष की थीं और गुरुग्राम में आईबीएम दक्ष के साथ डिप्टी ग्रुप मैनेजर के पद पर कार्यरत थीं. दुर्घटना ने उनका जीवन पूरी तरह बदल दिया. हादसे में उनकी दृष्टि पूरी तरह चली गई. उन्हें पेल्विक क्षेत्र में गंभीर चोटें आईं और स्थायी रूप से कोलोस्टॉमी की स्थिति से गुजरना पड़ा. उनकी चोटों का प्रभाव केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं था, बल्कि सामान्य जीवन, काम करने की क्षमता और भविष्य के करियर पर भी पड़ा.

दुर्घटना के बाद भी उन्होंने नौकरी जारी रखी. इसी तथ्य को बीमा कंपनी ने अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश की. बीमा कंपनी का तर्क था कि यदि पीड़िता दुर्घटना के बाद भी नौकरी कर रही हैं, तो उनकी कार्यात्मक अक्षमता को 100 प्रतिशत नहीं माना जा सकता. कंपनी के अनुसार मुआवजा वास्तविक काम करने की क्षमता में हुई कमी के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए और नौकरी जारी रहने से यह स्पष्ट होता है कि उनकी कमाने की क्षमता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई.

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने कहा कि केवल नौकरी पर बने रहना किसी व्यक्ति की वास्तविक कार्यात्मक क्षमता का प्रमाण नहीं हो सकता. रिकॉर्ड से पता चला कि पीड़िता दुर्घटना के बाद सामान्य तरीके से काम करने की स्थिति में नहीं थीं. उन्हें विशेष रूप से तैयार किए गए सहायक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करना पड़ता था. इसके अलावा उनके काम के घंटे लचीले किए गए थे और नियोक्ता ने उन्हें कई ऐसी सुविधाएं उपलब्ध कराईं, जिनके बिना उनके लिए सामान्य तरीके से नौकरी करना संभव नहीं था.

यही परिस्थिति सुप्रीम कोर्ट के फैसले का केंद्रीय आधार बनी. अदालत ने स्पष्ट किया कि कार्यात्मक अक्षमता का आकलन इस बात से नहीं किया जा सकता कि किसी विशेष नियोक्ता ने कर्मचारी को कितनी सुविधाएं देकर उसकी नौकरी बरकरार रखी. असली सवाल यह है कि सामान्य और प्रतिस्पर्धी श्रम बाजार में वही व्यक्ति अपनी योग्यता, अनुभव और क्षमता के आधार पर कितना काम और कितनी कमाई कर सकता है. यदि दुर्घटना के बाद वह केवल विशेष सहूलियतों के कारण मौजूदा पद पर बना हुआ है, तो उसकी इस स्थिति को सामान्य रोजगार क्षमता का पैमाना नहीं बनाया जा सकता.

अदालत के सामने पीड़िता के करियर पर पड़े प्रभाव का भी रिकॉर्ड था. नियोक्ता की ओर से जारी करियर ग्रोथ संबंधी पत्र से पता चला कि दुर्घटना के बाद उनकी सामान्य पदोन्नति और करियर प्रगति प्रभावित हुई. रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि दुर्घटना के बाद वह जनरल मैनेजर, डायरेक्टर और वाइस प्रेसिडेंट जैसे उच्च पदों तक पहुंचने के अवसरों से वंचित रह गईं. इसलिए नौकरी जारी रहने के बावजूद भविष्य में उनकी आय और पेशेवर उन्नति की संभावनाओं पर गंभीर असर पड़ा था.

मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने पहले उनकी कार्यात्मक अक्षमता 60 प्रतिशत मानते हुए 1,35,53,298 रुपये का मुआवजा तय किया था. इसके बाद हाई कोर्ट ने अक्षमता का प्रतिशत बढ़ाकर 80 प्रतिशत कर दिया और भविष्य की आय की संभावनाओं के लिए 50 प्रतिशत अतिरिक्त राशि जोड़ते हुए कुल मुआवजा 2,94,48,617 रुपये कर दिया था. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

पीड़िता की गंभीर चोटों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नई दिल्ली स्थित वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज और सफदरजंग अस्पताल के बहु-विषयक मेडिकल बोर्ड से उनकी दोबारा जांच कराने का निर्देश दिया. मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में दुर्घटना के कारण उन्हें पूरे शरीर के स्तर पर 100 प्रतिशत स्थायी शारीरिक अक्षमता होने की पुष्टि की. सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट को मुआवजे के निर्धारण में महत्वपूर्ण आधार माना.

बीमा कंपनी ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर भी आपत्ति जताई. उसका कहना था कि मुआवजे का निर्धारण केवल चिकित्सा संबंधी अक्षमता के आधार पर नहीं किया जा सकता और वास्तविक कार्यात्मक अक्षमता को देखा जाना चाहिए. लेकिन अदालत ने कहा कि जब मेडिकल बोर्ड से जांच कराने का संदर्भ स्वयं बीमा कंपनी की मांग पर हुआ था, तब उसके प्रतिकूल आने वाली रिपोर्ट का केवल इसलिए विरोध नहीं किया जा सकता कि उसका निष्कर्ष बीमा कंपनी के हित में नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने 100 प्रतिशत कार्यात्मक अक्षमता को आधार बनाते हुए भविष्य की आय के नुकसान की फिर से गणना की. भविष्य की संभावनाओं के लिए 50 प्रतिशत वृद्धि और 16 के गुणक को लागू किया गया. इससे भविष्य की आय के नुकसान की राशि 2,42,08,416 रुपये तय हुई. इसके साथ परिचारक के खर्च, भविष्य के चिकित्सा खर्च, दर्द और पीड़ा तथा विवाह की संभावनाओं के नुकसान के लिए भी राशि में वृद्धि की गई.

विवाह की संभावनाओं के नुकसान के लिए अदालत ने 20 लाख रुपये निर्धारित किए. हालांकि, पीठ ने साफ किया कि यह राशि इस मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए दी गई है और इसे भविष्य के मामलों में सामान्य मिसाल नहीं माना जाएगा. सभी मदों को जोड़ने के बाद पीड़िता के चोट संबंधी दावे का कुल मुआवजा बढ़कर 3,77,84,297 रुपये हो गया. इस राशि पर दावा याचिका दाखिल करने की तारीख से 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा.

इसी मामले में एक अन्य मृत्यु संबंधी दावा भी सुप्रीम कोर्ट के सामने था. यह मामला उस मोटरसाइकिल से जुड़ा था जिसे मृतक चला रहा था और जिस पर प्रियंका दास पीछे बैठी थीं. मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, गुरुग्राम ने मृतक की उम्र 33 वर्ष मानते हुए 16 का गुणक लागू किया और दावेदारों के पक्ष में 82,56,152 रुपये का मुआवजा निर्धारित किया था.

प्रियंका दास ने मृतक की पत्नी होने का दावा किया था, लेकिन विवाह का दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सका. अधिकरण ने उन्हें कानूनी पत्नी मानने से इनकार करते हुए नौकरी संबंधी रिकॉर्ड के आधार पर मृतक की मंगेतर माना और उन्हें मुआवजे में सीमित हिस्सा दिया. पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने बाद में उनके हिस्से की राशि पांच लाख रुपये से बढ़ाकर 7.5 लाख रुपये कर दी थी.

बीमा कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में यह तर्क दिया कि चूंकि मुआवजा मृतक के माता-पिता को दिया जाना था, इसलिए मुआवजे की गणना में गुणक मृतक की उम्र के बजाय आश्रितों की उम्र के आधार पर तय किया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया. अदालत ने Munna Lal Jain v. Vipin Kumar Sharma के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि गुणक मृतक की उम्र के आधार पर तय किया जाता है, न कि आश्रितों की उम्र के आधार पर. इस सिद्धांत की पुष्टि Sube Singh v. Shyam Singh मामले में भी हो चुकी है.

चूंकि मृतक 33 वर्ष का था और 31 से 35 वर्ष की आयु सीमा में आता था, इसलिए 16 का गुणक सही माना गया. वहीं प्रियंका दास के कानूनी पत्नी होने के दावे पर सुप्रीम कोर्ट ने अधिकरण और हाई कोर्ट के समान निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि कानूनी पत्नी होने का दावा करने वाले व्यक्ति पर उस स्थिति को साबित करने का दायित्व था और निचली अदालतों ने उपलब्ध मौखिक तथा दस्तावेजी साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन किया था.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मुआवजा तय करने के मूल उद्देश्य को भी रेखांकित किया. अदालत ने कहा कि दावेदार को वह मिलना चाहिए जिसका वह कानूनन हकदार है, लेकिन ऐसा लाभ नहीं दिया जाना चाहिए जिसका वह हकदार नहीं है. इसी आधार पर मृत्यु संबंधी दोनों अपीलों को खारिज कर दिया गया.

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि दुर्घटना के बाद नौकरी जारी रखना अपने आप में कम कार्यात्मक अक्षमता का प्रमाण नहीं है. किसी व्यक्ति को विशेष सॉफ्टवेयर, सहायक तकनीक, लचीले समय और नियोक्ता की असाधारण सहायता के सहारे काम पर बनाए रखा गया हो तो उसकी स्थिति को सामान्य श्रम बाजार की क्षमता के बराबर नहीं माना जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि मोटर दुर्घटना मुआवजे में असली कसौटी यह होगी कि पीड़ित सामान्य और प्रतिस्पर्धी बाजार में अपनी क्षमता के आधार पर कितना काम और कमाई कर सकता है. इस दृष्टिकोण ने गंभीर रूप से घायल लेकिन नौकरी जारी रखने वाले दुर्घटना पीड़ितों की कार्यात्मक अक्षमता के आकलन के लिए महत्वपूर्ण न्यायिक आधार तय किया है.

Case: Reliance General Insurance Company v. Priyanka Das & Ors.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-