नई दिल्ली. मादक पदार्थों से जुड़े मामलों में जब्त वाहनों के निपटारे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि एनडीपीएस अधिनियम के तहत किसी वाहन को स्थायी रूप से जब्त करने का अधिकार उस न्यायालय के पास है, जो संबंधित अपराध की सुनवाई कर रहा है. ड्रग डिस्पोजल कमेटी केवल वाहन के निपटारे की प्रक्रिया पूरी कर सकती है, लेकिन उसे न्यायालय के आदेश और वाहन मालिक को सुनवाई का अवसर दिए बिना आगे बढ़ने का अधिकार नहीं है.
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह फैसला R Manimaran v State of Tamil Nadu मामले में सुनाया. विवाद एक ऐसी लॉरी से जुड़ा था, जिसे कथित तौर पर 66 किलोग्राम गांजा बरामद होने के बाद जब्त किया गया था. मामले में चार लोगों के खिलाफ एनडीपीएस अधिनियम के तहत मुकदमा चला, लेकिन संबंधित अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय ने सभी आरोपितों को बरी कर दिया.
ट्रायल कोर्ट ने आरोपितों को बरी करते समय अभियोजन की कार्रवाई में कई कमियों को महत्वपूर्ण माना था. अदालत के समक्ष गिरफ्तारी मेमो में विसंगतियां, जब्त पदार्थ की सुरक्षित अभिरक्षा का पर्याप्त रिकॉर्ड नहीं होना, महामारी के दौरान लॉरी के इस्तेमाल से जुड़े सवाल और नमूनों को अदालत तथा प्रयोगशाला तक पहुंचाने में हुई देरी जैसे पहलू सामने आए थे. आरोपितों को बरी करने के साथ ट्रायल कोर्ट ने अपील की अवधि समाप्त होने के बाद लॉरी उसके मालिक को लौटाने का निर्देश भी दिया था.
मामले में उस समय पेच फंस गया जब अपील की अवधि समाप्त होने के बाद वाहन मालिक लॉरी की सुपुर्दगी के लिए ट्रायल कोर्ट पहुंचा. उसकी अर्जी खारिज कर दी गई. इसके बाद मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा, जहां धारा 52ए, संबंधित स्थायी आदेशों और 2022 के नियमों के आधार पर ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा गया. जांच अधिकारी ने भी ट्रायल कोर्ट में अलग से आवेदन देकर वाहन को ड्रग डिस्पोजल कमेटी के पास भेजने का अनुरोध किया था. इसके बाद वाहन मालिक ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.
सुप्रीम कोर्ट ने एनडीपीएस अधिनियम की धारा 63 और एनडीपीएस जब्ती, भंडारण, नमूनाकरण एवं निपटान नियम, 2022 के बीच संबंध को स्पष्ट करते हुए कहा कि दोनों प्रावधानों को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि ड्रग डिस्पोजल कमेटी को न्यायालय की भूमिका से ऊपर कर दिया जाए. धारा 63 के तहत जब्ती का अंतिम अधिकार ट्रायल कोर्ट के पास रहता है.
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि मुकदमे के दौरान पुलिस या न्यायालय की अभिरक्षा में पड़े वाहन के लंबे समय तक खड़े रहने से उसकी स्थिति खराब हो सकती है. वाहन उपयोग के लायक नहीं रह सकता और उसकी कीमत भी कम हो सकती है. इसलिए ऐसे मामलों में अंतरिम अभिरक्षा देने के लिए आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 451 और 457 के प्रावधानों का उपयोग किया जा सकता है. अब संबंधित प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में धारा 497 और 503 के रूप में मौजूद हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया भी निर्धारित की. यदि वाहन का मालिक उसकी अंतरिम अभिरक्षा लेने के लिए अदालत के सामने नहीं आता है और वाहन लंबे समय तक पड़े रहने से खराब होने की आशंका है, तो जांच अधिकारी ट्रायल कोर्ट के समक्ष आवेदन देकर वाहन को निपटारे के लिए ड्रग डिस्पोजल कमेटी को भेजने का अनुरोध कर सकता है. लेकिन ऐसा आवेदन अपने आप वाहन के निपटारे का आधार नहीं बन सकता.
पीठ ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट को सबसे पहले वाहन के मालिक को नोटिस देना होगा और उसे अपना पक्ष रखने का अवसर देना होगा. मालिक को सुनवाई का पर्याप्त अवसर दिए जाने के बाद ही वाहन को ड्रग डिस्पोजल कमेटी के पास भेजने का संदर्भ तैयार किया जा सकता है. यानी वाहन के मालिक को पूरी प्रक्रिया से बाहर रखकर उसकी संपत्ति के संबंध में फैसला नहीं लिया जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने ड्रग डिस्पोजल कमेटी की भूमिका को लेकर भी महत्वपूर्ण सीमा तय की. अदालत के अनुसार, यदि वाहन उसके पास निपटारे के लिए पहुंचता है, तब भी कमेटी को सार्वजनिक नीलामी के माध्यम से वाहन बेचने से पहले उसके मालिक की बात सुननी होगी. इससे यह सुनिश्चित होगा कि संपत्ति के मालिक को अपना दावा रखने का अवसर मिले और वाहन के संबंध में कोई कार्रवाई एकतरफा तरीके से न हो.
पीठ ने साथ ही यह स्पष्ट किया कि ड्रग डिस्पोजल कमेटी द्वारा सार्वजनिक नीलामी के माध्यम से वाहन बेच देना अपने आप में वाहन की कानूनी जब्ती नहीं माना जाएगा. नीलामी से प्राप्त राशि संबंधित ट्रायल कोर्ट में जमा करनी होगी. यह रकम तब तक न्यायालय की अभिरक्षा और नियंत्रण में रहेगी, जब तक एनडीपीएस अधिनियम की धारा 63 के तहत वाहन की जब्ती का अंतिम प्रश्न तय नहीं हो जाता.
इस व्यवस्था का सीधा असर उन मामलों पर पड़ेगा, जिनमें एनडीपीएस मामलों में वाहन लंबे समय से पुलिस या अदालत की अभिरक्षा में पड़े हैं और उनका मालिक अंतरिम कस्टडी लेने के लिए आगे नहीं आता. अदालत ने एक ओर ऐसे वाहनों को बेकार होकर मूल्यहीन होने से बचाने का रास्ता दिया है, वहीं दूसरी ओर मालिक के संपत्ति अधिकार और सुनवाई के अधिकार की सुरक्षा भी सुनिश्चित की है.
सुप्रीम कोर्ट ने अंततः संबंधित लॉरी को उसके मालिक को सौंपने का निर्देश दिया. अदालत ने यह भी कहा कि यदि लॉरी पहले ही ड्रग डिस्पोजल कमेटी के पास भेजी जा चुकी है तो उसे तत्काल अपीलकर्ता को सौंपा जाए. इस तरह शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि एनडीपीएस मामले में वाहन जब्त होना उसके मालिक के अधिकारों को स्वतः समाप्त नहीं करता. वाहन के निपटारे और उसकी अंतिम जब्ती के बीच कानूनी अंतर बनाए रखना जरूरी है.
फैसले का व्यापक महत्व इसलिए है क्योंकि एनडीपीएस मामलों में जब्त वाहनों के संबंध में अब केवल निपटारे की सुविधा या प्रशासनिक प्रक्रिया पर्याप्त नहीं होगी. वाहन मालिक को नोटिस, सुनवाई का अवसर और न्यायिक निगरानी प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा होंगे. वहीं अंतिम जब्ती का निर्णय संबंधित अपराध की सुनवाई कर रहे न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में ही रहेगा.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

