ग्वालियर. साइबर ठगी का चेहरा लगातार बदल रहा है. अब अपराधी केवल बैंक खाते, एटीएम, ओटीपी या क्यूआर कोड के जरिये लोगों को निशाना नहीं बना रहे, बल्कि मोबाइल फोन में मौजूद निजी तस्वीरों और संपर्कों को भी वसूली का हथियार बना रहे हैं. ग्वालियर के झांसी रोड क्षेत्र में सामने आए एक मामले में एक महिला को पहले बेहद कम ब्याज दर पर लोन देने का झांसा दिया गया. महिला ने लोन लेने से इन्कार किया तो कथित ठगों ने उसके मोबाइल में मौजूद तस्वीरों और संपर्क सूची के आधार पर उसे बदनाम करने की धमकी देना शुरू कर दिया. पुलिस में दर्ज शिकायत के अनुसार आरोपितों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से सामान्य तस्वीरों को अश्लील रूप देने का दावा किया और इन्हें रिश्तेदारों व परिचितों तक भेजने की धमकी देकर महिला से करीब चार लाख रुपये अलग-अलग किश्तों में ट्रांसफर करा लिए.
पुलिस शिकायत के मुताबिक झांसी रोड निवासी पिंकी यादव को एक अनजान नंबर से फोन आया था. फोन करने वाले ने कम ब्याज दर पर लोन उपलब्ध कराने की बात कही. बातचीत के दौरान महिला ने जब लोन लेने से मना कर दिया तो कथित ठगों का तरीका बदल गया. आरोप है कि अपराधियों ने महिला को बताया कि उनके पास उसके मोबाइल से हासिल की गई तस्वीरें और संपर्क नंबर मौजूद हैं. इसके बाद उन्होंने इन तस्वीरों में डिजिटल तरीके से बदलाव कर उन्हें आपत्तिजनक तस्वीरों में बदलने और रिश्तेदारों तथा परिचितों के मोबाइल पर भेजने की धमकी दी.
यहां जिस तकनीक का इस्तेमाल करने का दावा किया गया, उसे समझना भी जरूरी है. किसी व्यक्ति की असली तस्वीर में डिजिटल तरीके से बदलाव करके उसे ऐसी तस्वीर का रूप देना, जो वास्तविक दिखाई दे, सामान्य भाषा में मॉर्फिंग कहलाता है. उदाहरण के लिए किसी सामान्य फोटो में चेहरे, शरीर, कपड़ों या पृष्ठभूमि को बदलकर आपत्तिजनक तस्वीर तैयार कर दी जाए तो यह तस्वीर के साथ डिजिटल छेड़छाड़ का मामला हो सकता है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते इस्तेमाल से ऐसी छेड़छाड़ पहले की तुलना में अधिक वास्तविक दिखाई दे सकती है. हालांकि इस मामले में पुलिस जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि आरोपितों ने वास्तव में तस्वीरों में किस तरह की छेड़छाड़ की या केवल एआई के नाम पर महिला को डराकर रकम वसूली.
शिकायत के अनुसार अपराधियों ने महिला को केवल फोन पर धमकी नहीं दी, बल्कि उसके परिचितों और रिश्तेदारों से संपर्क करने की बात कहकर दबाव बढ़ाया. महिला को डर था कि यदि तस्वीरें उसके परिचितों तक पहुंच गईं तो उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है. इसी भय का फायदा उठाते हुए आरोपितों ने कथित तौर पर बार-बार रकम की मांग की. महिला ने उनके बताए बैंक खातों में अलग-अलग समय पर पैसे भेजे और यह सिलसिला करीब चार लाख रुपये तक पहुंच गया.
इस मामले में साइबर अपराध का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है. ठगी की शुरुआत आर्थिक लालच से हुई, लेकिन रकम वसूलने के लिए अपराधियों ने कथित तौर पर सामाजिक प्रतिष्ठा और निजी जिंदगी को निशाना बनाया. कम ब्याज पर लोन का प्रस्ताव केवल संपर्क स्थापित करने का माध्यम बना और महिला के इन्कार के बाद निजी जानकारी के दुरुपयोग की धमकी सामने आ गई. इस तरह अपराधियों ने आर्थिक धोखाधड़ी को डिजिटल ब्लैकमेलिंग में बदल दिया.
लगातार बढ़ती मांग और मानसिक दबाव के बीच महिला ने साइबर हेल्पलाइन से संपर्क किया और पुलिस को शिकायत दी. शिकायत के आधार पर पहले ई-जीरो एफआईआर दर्ज की गई. इसके बाद पुलिस ने अज्ञात साइबर अपराधियों के खिलाफ धोखाधड़ी, ब्लैकमेलिंग और सूचना प्रौद्योगिकी कानून की संबंधित धाराओं में प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू की. शिकायतकर्ता के अनुसार साइबर हेल्पलाइन पर संपर्क करने के बाद भी कथित ठगों के फोन आते रहे.
अब पुलिस के सामने सबसे अहम सवाल यह है कि आरोपितों ने महिला के मोबाइल फोन तक कथित रूप से पहुंच कैसे बनाई. जांच में यह पता लगाया जा रहा है कि क्या किसी संदिग्ध लिंक, एप, फाइल या अन्य डिजिटल माध्यम के जरिये मोबाइल की जानकारी हासिल की गई थी. मोबाइल फोन में मौजूद गैलरी और संपर्क सूची तक पहुंच मिलने की स्थिति में अपराधियों के पास पीड़ित को मानसिक रूप से दबाव में लेने के कई रास्ते खुल जाते हैं.
पुलिस उन मोबाइल नंबरों, वाट्सऐप खातों और बैंक खातों की भी जानकारी जुटा रही है, जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर ठगी में किया गया. शिकायत में 8447947157, 9318996048, 9075503802, 8693099425, 9354461658 और 8447237905 नंबरों से कॉल आने का उल्लेख है. इन नंबरों की तकनीकी जांच के साथ यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि इनके पीछे कौन लोग हैं और क्या सभी नंबर एक ही गिरोह से जुड़े हैं.
ठगी की रकम के लेन-देन की जांच में भी कई राज्यों का जुड़ाव सामने आया है. शिकायत के अनुसार रकम ओडिशा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली से जुड़े बैंक खातों में पहुंची. इसके अलावा दिल्ली और बंगाल से जुड़े पे-वालेट नंबरों का भी उल्लेख है. इससे पुलिस को आशंका है कि रकम को एक खाते से दूसरे खाते या अलग-अलग डिजिटल माध्यमों में स्थानांतरित किया गया हो सकता है. जांच के दौरान बैंक लेन-देन और डिजिटल भुगतान की कड़ियां जोड़कर कथित गिरोह के नेटवर्क तक पहुंचने का प्रयास किया जाएगा.
इस तरह के मामलों में साइबर अपराधियों के लिए मोबाइल फोन स्वयं एक महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है. फोन में मौजूद फोटो, संपर्क नंबर, संदेश और दूसरी निजी सूचनाएं यदि किसी अनधिकृत व्यक्ति तक पहुंच जाएं तो उनका इस्तेमाल केवल आर्थिक ठगी के लिए नहीं, बल्कि डराने और सामाजिक दबाव बनाने के लिए भी किया जा सकता है. इसलिए किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर मोबाइल में कोई संदिग्ध एप डाउनलोड करना या अनजान लिंक खोलना जोखिमपूर्ण हो सकता है.
साइबर सुरक्षा के जानकार लगातार सलाह देते हैं कि अनजान नंबर से आए लिंक, एप या एपीके फाइल को बिना जांचे डाउनलोड नहीं करना चाहिए. किसी एप को फोटो गैलरी, संपर्क सूची या दूसरी निजी जानकारी तक पहुंच की अनुमति देने से पहले यह देखना जरूरी है कि उसे ऐसी अनुमति की आवश्यकता वास्तव में है या नहीं. विशेष रूप से लोन, नौकरी, पुरस्कार या निवेश के नाम पर भेजे जाने वाले संदिग्ध लिंक से सावधान रहने की जरूरत है.
यदि किसी व्यक्ति को उसकी तस्वीर या वीडियो को सार्वजनिक करने की धमकी देकर पैसे मांगे जाएं तो लगातार रकम भेजते रहना समाधान नहीं है. ऐसी स्थिति में संबंधित संदेश, नंबर, भुगतान विवरण और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखना तथा तत्काल साइबर अपराध की शिकायत करना अधिक महत्वपूर्ण है. इससे जांच एजेंसियों को अपराधियों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है.
ग्वालियर के इस मामले में फिलहाल पुलिस आरोपितों की पहचान और उनके डिजिटल नेटवर्क की जांच कर रही है. यह भी जांच का विषय है कि महिला के मोबाइल से वास्तविक रूप से कौन-सी जानकारी हासिल की गई और कथित तौर पर तैयार की गई तस्वीरों में किस प्रकार की डिजिटल छेड़छाड़ हुई. यदि जांच में तस्वीरों के साथ आपत्तिजनक डिजिटल बदलाव की पुष्टि होती है तो मामले की तकनीकी और कानूनी गंभीरता और स्पष्ट होगी.
इस घटना ने यह भी दिखाया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल जहां उपयोगी तकनीक के रूप में हो रहा है, वहीं उसके दुरुपयोग का खतरा भी बढ़ रहा है. किसी व्यक्ति की सामान्य तस्वीर को डिजिटल रूप से बदलकर उसे आपत्तिजनक रूप देना केवल तकनीकी छेड़छाड़ नहीं, बल्कि पीड़ित की निजता और प्रतिष्ठा पर सीधा हमला बन सकता है. ऐसे में सबसे बड़ा बचाव सतर्कता, निजी डिजिटल जानकारी की सुरक्षा और धमकी मिलने पर समय पर शिकायत है.
फिलहाल चार लाख रुपये की ठगी और तस्वीरों के कथित दुरुपयोग का यह मामला पुलिस जांच के दायरे में है. आरोपितों ने वास्तव में किस तकनीक से महिला की तस्वीरों तक पहुंच बनाई, क्या तस्वीरों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिये बदलाव किया गया और रकम किन लोगों तक पहुंची, इन सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद सामने आएंगे. लेकिन इस घटना ने एक चेतावनी जरूर सामने रख दी है कि मोबाइल में सुरक्षित निजी तस्वीरें और संपर्क सूची अब केवल व्यक्तिगत जानकारी नहीं रह गई हैं, यदि उनकी सुरक्षा में चूक हुई तो साइबर अपराधी इन्हें आर्थिक वसूली और सामाजिक दबाव का हथियार बना सकते हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

