हाईकोर्ट ने विध्वंस नोटिस के खिलाफ याचिका खारिज की जरूरी, तथ्य छिपाने पर 20 हजार रुपये जुर्माना

हाईकोर्ट ने विध्वंस नोटिस के खिलाफ याचिका खारिज की जरूरी, तथ्य छिपाने पर 20 हजार रुपये जुर्माना

प्रेषित समय :19:45:20 PM / Fri, Sep 4th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

इंदौर. सड़क चौड़ीकरण के लिए जारी विध्वंस नोटिस को चुनौती देने वाले आनंद कुमार केडिया को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली. इंदौर स्थित हाईकोर्ट की एकलपीठ ने उनकी रिट याचिका खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने मामले से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों और दस्तावेजों का पूरी तरह खुलासा नहीं किया. अदालत ने इसे कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के रूप में देखा और 20 हजार रुपये की लागत लगाने का निर्देश दिया. यह राशि सात दिनों के भीतर मध्य प्रदेश लीगल एड सर्विसेज अथॉरिटी, इंदौर के खाते में जमा करनी होगी.

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट की पीठ ने की. यह प्रकरण Anand Kumar Kedia v State of Madhya Pradesh, Writ Petition No. 33717 of 2026 के नाम से दर्ज है. मामले का न्यूट्रल साइटेशन 2026:MPHC-IND:23452 है और इसे 2026 LiveLaw (MP) 349 के रूप में रिपोर्ट किया गया है.

केडिया ने इंदौर नगर निगम के भवन अधिकारी द्वारा 11 अगस्त 2026 को जारी किए गए विध्वंस नोटिस को चुनौती दी थी. उनका कहना था कि उनकी आवासीय संपत्ति पर प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरण के लिए कार्रवाई की जा रही है, जबकि इसके लिए मध्य प्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 के तहत निर्धारित प्रक्रिया और भूमि अधिग्रहण संबंधी कानूनी प्रावधानों का पालन किया जाना आवश्यक है. याचिका में अधिकारियों को उनकी संपत्ति पर सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई से रोकने की मांग भी की गई थी.

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि उन्होंने संबंधित संपत्ति वर्ष 2017 में पंजीकृत बिक्री विलेख के माध्यम से खरीदी थी. उनके अनुसार राजस्व अधिकारियों द्वारा संपत्ति का सीमांकन किया गया था और इसके आधार पर वर्ष 2019 में नगर तथा ग्राम निवेश विभाग से अनुमति मिली थी. इसके बाद वर्ष 2020 में इंदौर नगर निगम से आवासीय भवन निर्माण की अनुमति भी प्राप्त हुई. उनका तर्क था कि बाद में इंदौर विकास योजना 2021 के तहत सड़क चौड़ीकरण के लिए उनकी संपत्ति के एक हिस्से को हटाने की कार्रवाई शुरू की गई.

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि सड़क की निर्धारित धुरी में बदलाव किया गया और संपत्ति पर कार्रवाई करते समय 1973 के अधिनियम में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. संविधान के अनुच्छेद 14 और 300-ए का हवाला देते हुए यह तर्क रखा गया कि किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से कानून में निर्धारित प्रक्रिया के बिना वंचित नहीं किया जा सकता. इसके अलावा नगर निगम अधिनियम, 1956 की धारा 305 के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए गए.

दूसरी ओर, इंदौर नगर निगम की ओर से याचिका का विरोध किया गया. निगम ने अदालत को बताया कि संयुक्त निरीक्षण के दौरान यह सामने आया कि याचिकाकर्ता ने सरकारी भूमि के हिस्से पर कब्जा कर उसे अपनी संपत्ति में शामिल करते हुए दीवार बना ली थी. निगम के अनुसार प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरण इंदौर विकास योजना 2021 के अनुरूप किया जा रहा है. योजना में सिटी फॉरेस्ट के माध्यम से बाईपास रोड को लाइटहाउस परियोजना और प्रधानमंत्री आवास योजना से जोड़ने वाली सड़क का प्रावधान बताया गया.

निगम की ओर से यह भी कहा गया कि सड़क का विकास योजना में निर्धारित स्वरूप के अनुसार किया जा रहा है और निगम उस योजना को लागू करने वाली संस्था है. विकास योजना को आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित करने की प्रक्रिया के बाद अंतिम रूप दिया गया था. इसलिए उसके प्रावधान निगम के लिए बाध्यकारी हैं. निगम ने सुप्रीम कोर्ट के रवींद्र रामचंद्र वाघमारे बनाम इंदौर नगर निगम मामले का हवाला देते हुए विकास योजना के बाध्यकारी स्वरूप पर भी जोर दिया.

मामले में अदालत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदु याचिकाकर्ता द्वारा पूर्व में हुई संयुक्त जांच से संबंधित जानकारी का खुलासा न करना रहा. रिकॉर्ड के अनुसार इससे पहले केडिया की एक अन्य याचिका, डब्ल्यूपी नंबर 27726/2026, में हाईकोर्ट ने अधिकारियों को संयुक्त निरीक्षण करने और उसकी रिपोर्ट याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे. मौजूदा मामले में केडिया ने इस पूर्व आदेश और उससे जुड़े घटनाक्रम को अपनी याचिका में पूरी तरह सामने नहीं रखा.

अदालत के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से यह कहा गया कि संयुक्त निरीक्षण की रिपोर्ट उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई थी. हालांकि, प्रतिवादियों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि निरीक्षण के दौरान याचिकाकर्ता का प्रतिनिधि मौजूद था और उसने संबंधित कार्यवाही पर हस्ताक्षर भी किए थे. अदालत ने रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद पाया कि संयुक्त निरीक्षण से संबंधित रिपोर्ट उपलब्ध कराए जाने के तथ्य को याचिका में सही तरीके से सामने नहीं रखा गया था.

पीठ ने माना कि याचिकाकर्ता ने ऐसे महत्वपूर्ण तथ्यों का पूर्ण खुलासा नहीं किया, जो मामले के निर्णय के लिए प्रासंगिक थे. अदालत ने कहा कि महत्वपूर्ण तथ्य छिपाकर न्यायालय से राहत मांगना कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के रूप में देखा जा सकता है. इसी आधार पर अदालत ने राहत देने से इनकार कर दिया.

पीठ ने अपने आदेश में लैटिन विधिक सिद्धांत ‘falsus in uno, falsus in omnibus’ का भी उल्लेख किया, जिसका सामान्य अर्थ है कि एक बात में झूठ पाए जाने पर पूरे मामले की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ सकता है. अदालत ने कहा कि महत्वपूर्ण दस्तावेजों और तथ्यों के संबंध में याचिकाकर्ता का आचरण उसे मांगी गई राहत पाने से वंचित करता है.

हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील भी ध्यान में रखी कि उन्हें संबंधित तथ्य की जानकारी नहीं थी. इसी पहलू को देखते हुए पीठ ने अपेक्षाकृत सीमित राशि के रूप में 20 हजार रुपये की लागत निर्धारित की. अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि आदेश की तारीख से सात दिनों के भीतर मध्य प्रदेश लीगल एड सर्विसेज अथॉरिटी, इंदौर के खाते में जमा की जाए और उसकी रसीद हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में प्रस्तुत की जाए.

अदालत ने मामले के गुण-दोष पर विचार करते हुए इंदौर नगर निगम की कार्रवाई में कोई ऐसी मनमानी या गैरकानूनी कार्रवाई नहीं पाई, जिसके आधार पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप किया जा सके. परिणामस्वरूप रिट याचिका को लागत सहित खारिज कर दिया गया.

इस फैसले का अहम पक्ष यह है कि संपत्ति और सड़क चौड़ीकरण जैसे विवाद में केवल अपने अधिकार का दावा करना पर्याप्त नहीं माना गया. हाईकोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि न्यायालय से संवैधानिक राहत मांगने वाला पक्ष अपने मामले से जुड़े सभी महत्वपूर्ण तथ्यों और पूर्व न्यायिक कार्यवाहियों को पूरी ईमानदारी से सामने रखे. इस मामले में अदालत ने इसी कसौटी पर याचिकाकर्ता के आचरण को देखते हुए राहत देने से इनकार किया और लागत के साथ याचिका खारिज कर दी.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-