शरद अग्रवाल
जबलपुर. कुछ लोग अपने जीवन में इतने रास्ते तय करते हैं कि उनके व्यक्तित्व को किसी एक परिचय में बांधना मुश्किल हो जाता है. वे कभी परिवार के लिए अपने होते हैं, कभी समाज के लिए सहारा, कभी संगठन के लिए समर्पित कार्यकर्ता और फिर एक दिन उसी जीवन को साधना और सेवा के लिए अर्पित कर देते हैं. समय बीतता रहता है, भूमिकाएं बदलती रहती हैं, लेकिन ऐसे व्यक्तित्व लोगों की स्मृतियों में बने रहते हैं.
संस्कारधानी जबलपुर में स्वामी रामचंद्रदास जी महाराज की जीवन यात्रा भी कुछ ऐसी ही है. कभी जिन्हें परिवार और परिचित स्नेह से ‘मिट्ठू भैया’ कहकर पुकारते थे, वही मिठाई लाल अग्रवाल आगे चलकर संन्यास की राह पर चले और स्वामी रामचंद्रदास बने. सात दशकों से अधिक लंबी इस यात्रा में सेवा है, संगठन है, समाज है, संस्कृति है और अंततः अध्यात्म है. लेकिन इन सबके बीच सबसे स्थायी चीज रही-दूसरों के लिए कुछ करने की सहज इच्छा.
एक भरे-पूरे परिवार से निकला ‘मिट्ठू भैया’
9 सितंबर 1940 को स्वर्गीय खुन्नेलाल जी अग्रवाल और स्वर्गीय श्रीमती रुक्कन बाई (रुक्को) के घर उनका जन्म हुआ. परिवार बड़ा था और रिश्तों की गर्माहट से भरा हुआ. चाचाजी स्वर्गीय छिंगेलाल जी अग्रवाल, भाई बल्लभदास जी, परसराम जी, रमेशचंद्र जी अग्रवाल तथा बहन पुत्तोबाई और बहनोई स्वर्गीय बद्रीप्रसाद जी अग्रवाल के सान्निध्य में उनका बचपन बीता.
माता-पिता ने उनका नाम मिठाईलाल अग्रवाल रखा, मगर घर और आसपास के लोगों के बीच यह औपचारिक नाम धीरे-धीरे पीछे छूट गया. स्नेह ने उन्हें एक छोटा-सा नाम दे दिया—मिट्ठू भैया.
यही नाम उनकी लोकप्रिय पहचान बन गया.
गौर वर्ण, अच्छी कद-काठी और सहज आकर्षक व्यक्तित्व के साथ उनकी सबसे बड़ी विशेषता लोगों से घुलने-मिलने की सहजता थी. शायद यही कारण था कि उनके व्यक्तित्व में ‘भैया’ शब्द केवल संबोधन नहीं रहा, बल्कि अपनत्व का भाव बन गया.
संस्कारों की पहली पाठशाला घर ही था
उनके जीवन की दिशा किसी एक घटना से तय नहीं हुई. परिवार ने उन्हें धीरे-धीरे वह संस्कार दिए, जो आगे चलकर उनके पूरे जीवन में दिखाई दिए.
व्यावसायिक परिवार में पले-बढ़े होने के बावजूद समाज के प्रति जिम्मेदारी और जरूरतमंद के लिए कुछ करने का भाव उनके संस्कारों का हिस्सा रहा. व्यवसाय उनके जीवन में आया, लेकिन उसके साथ समाज भी हमेशा उनके साथ चलता रहा.
यही वजह है कि बाद में जब उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में जिम्मेदारियां संभालीं तो उनमें केवल पद की औपचारिकता नहीं दिखाई दी. हर भूमिका के पीछे काम करने और लोगों को साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति दिखाई देती रही.
नौ साल की उम्र में शुरू हुई संगठन की राह
वर्ष 1949 में, जब उम्र केवल नौ वर्ष थी, वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने. हनुमान शाखा में मुख्य शिक्षक की जिम्मेदारी तक पहुंचे.
बचपन में शुरू हुआ यह जुड़ाव आगे चलकर उनके जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय बना. संगठन ने उनके भीतर अनुशासन, सामूहिकता और समाज के लिए काम करने की भावना को और मजबूत किया.
वर्ष 1964 में उन्होंने जिलहरीघाट तैराकी क्लब की स्थापना की. इसके अगले वर्ष 1965-66 में वे अग्रवाल सेवा समिति के अध्यक्ष रहे.
यह वह समय था जब उनका सामाजिक दायरा लगातार बढ़ रहा था और जबलपुर के सार्वजनिक जीवन में उनकी सक्रिय उपस्थिति दिखाई देने लगी थी.
व्यवसाय भी बना सेवा का माध्यम
पैतृक आयुर्वेद व्यवसाय को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने केवल व्यापार विस्तार तक स्वयं को सीमित नहीं रखा. औषधि निर्माण के क्षेत्र में कदम बढ़ाया और वर्ष 1970 में बाबा आयुर्वेदिक फार्मेसी की स्थापना की.
इस पहल ने उनके जीवन में एक और आयाम जोड़ा. संस्था के माध्यम से 100 से अधिक लोगों को रोजगार मिला.
किसी के लिए रोजगार केवल नौकरी हो सकता है, लेकिन ऐसे प्रयासों में रोजगार के साथ परिवारों की आजीविका और आत्मनिर्भरता भी जुड़ी होती है. शायद इसी व्यापक दृष्टि ने उनके व्यवसाय को भी सामाजिक सरोकार से जोड़े रखा.
जनसंघ से आपातकाल तक संघर्ष का दौर
राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रभाव में उन्होंने भारतीय जनसंघ के कार्यों में भी अपनी भूमिका निभाई. वर्तमान उत्तर विधानसभा क्षेत्र में 1967, 1970 के उपचुनाव और 1972 के चुनाव में वे कार्यालय प्रभारी रहे.
इस दौरान उन्हें स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी, स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे, स्वर्गीय प्यारेलाल खंडेलवाल, स्वर्गीय नारायण प्रसाद गुप्ता और स्वर्गीय कैलाश सारंग जैसे वरिष्ठ नेताओं के संपर्क का अवसर मिला.
फिर आया वर्ष 1975 का आपातकाल.
जून 1975 में वे भूमिगत रहे और 15 जिलों में गुप्त रूप से संघ साहित्य पहुंचाने का कार्य किया. करीब 12 वर्षों तक जबलपुर ग्रामीण, कटनी, पन्ना, जशपुर-अंबिकापुर सहित अनेक जिलों में विभाग प्रचारक की जिम्मेदारी निभाई.
इस दौर में उन्हें परम पूज्य गुरु गोलवलकर जी और बालासाहेब देवरस जी का सान्निध्य मिला.
यह उनके जीवन का वह अध्याय था, जहां व्यक्तिगत सुविधा से अधिक संगठन और विचार के प्रति प्रतिबद्धता महत्वपूर्ण थी.
जब ‘मिट्ठू भैया’ ने चुनी संन्यास की राह
लेकिन जीवन की यात्रा केवल संगठन और सामाजिक कार्यों तक नहीं रुकनी थी.
अध्यात्म के प्रति उनका झुकाव पहले से था. संतों का सत्संग और आध्यात्मिक चिंतन उनके जीवन का हिस्सा बनता गया. वर्ष 1989 में उन्हें इस्कॉन से गुरु दीक्षा मिली और 1991 में फ्रांस में सन्यास दीक्षा.
मिठाईलाल अग्रवाल अब स्वामी रामचंद्रदास बन चुके थे.
नाम बदला, वेश बदला, जीवन की दिशा भी बदली—लेकिन भीतर का सेवा भाव वही रहा.
यही शायद उनकी यात्रा की सबसे सुंदर कड़ी है. उन्होंने समाज से दूरी बनाकर अध्यात्म नहीं चुना, बल्कि अध्यात्म को समाज तक पहुंचाने का माध्यम बनाया.
जबलपुर से दुनिया तक पहुंचा कृष्ण भक्ति का संदेश
सन्यास के बाद उनकी यात्रा देश की सीमाओं से आगे बढ़ी. इंग्लैंड, अमेरिका, फ्रांस, मलेशिया सहित 35 देशों में उन्होंने कृष्ण भक्ति का प्रचार किया.
जिन कदमों ने कभी जबलपुर की गलियों और सामाजिक जीवन में लोगों के बीच जगह बनाई थी, वही कदम आगे चलकर दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचे.
लेकिन यात्राओं और देशों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण वह संदेश था, जिसे वे अपने साथ लेकर गए—भारतीय आध्यात्मिक परंपरा, कृष्ण भक्ति और सेवा का संदेश.
संतों का सान्निध्य बना जीवन का आध्यात्मिक आधार
आध्यात्मिक जीवन में उन्हें अनेक संतों का सान्निध्य मिला. ब्रह्मलीन स्वामी प्रेमानंद जी महाराज, जिलहरीघाट, ब्रह्मलीन भागवताचार्य द्वारका प्रसाद जी शास्त्री, जमुनिया, बरेला तथा ब्रह्मलीन नृसिंह पीठाधीश्वर श्यामदास जी महाराज के सान्निध्य ने उनकी आध्यात्मिक यात्रा को दिशा दी.
संतों के बीच बैठना, सत्संग सुनना और उस भाव को जीवन में उतारना उनके लिए केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं था. उनके जीवन में अध्यात्म धीरे-धीरे सेवा का दूसरा नाम बनता गया.
आज भी जारी है भोजन और गौसेवा की साधना
भेड़ाघाट स्थित हरे कृष्णा आश्रम में आज वे 100 गायों की गौशाला का संचालन कर रहे हैं. गौसेवा उनके वर्तमान जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
इसके साथ ही 4 अप्रैल 2011 को शुरू हुई निःशुल्क चलित प्रसादम सेवा पिछले 15 वर्षों से लगातार चल रही है. इस सेवा के माध्यम से प्रतिदिन करीब 200 लोगों को भोजन कराया जाता है.
यहां उनकी पूरी जीवनयात्रा जैसे एक जगह आकर ठहरती दिखाई देती है.
जिस व्यक्ति ने कभी संगठन के लिए दूर-दराज के जिलों की यात्राएं कीं, जिसने समाजसेवा की, जिसने व्यवसाय के माध्यम से लोगों को रोजगार दिया, जिसने दुनिया के 35 देशों में कृष्ण भक्ति का संदेश पहुंचाया—वही आज भोजन की एक थाली और गौसेवा के माध्यम से अपने आसपास के जीवन को स्पर्श कर रहा है.
सम्मान से बड़ी है लोगों के मन में बनी जगह
स्वामी रामचंद्रदास जी महाराज को अग्रशिरोमणि अलंकरण और धर्म रत्न अलंकरण से सम्मानित किया जा चुका है.
लेकिन किसी भी व्यक्ति के जीवन का सबसे बड़ा सम्मान शायद वह नहीं होता जो मंच पर मिलता है. उससे बड़ा सम्मान वह होता है, जब वर्षों बाद भी लोग उसे उसके पद या उपलब्धि से नहीं, बल्कि अपनेपन से याद करते हैं.
‘मिट्ठू भैया’ नाम में शायद यही अपनापन आज भी बचा हुआ है.
सात दशक की यात्रा का सार सेवा ही है
87वें जन्मोत्सव पर जब उनकी जीवन यात्रा के पन्ने पलटते हैं तो लगता है, यह केवल एक व्यक्ति के जीवन की कहानी नहीं, बल्कि उन संस्कारों की कहानी है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलते हैं. एक बालक, जिसे घर में प्यार से ‘मिट्ठू भैया’ कहा गया, समय के साथ समाज का कार्यकर्ता बना, संगठन का समर्पित स्वयंसेवक बना, कठिन दौर में अपने विश्वास के लिए खड़ा रहा और अंततः उसी जीवन को कृष्ण भक्ति, गौसेवा और अन्नसेवा में अर्पित कर दिया.
आज भी जब कोई उन्हें ‘स्वामी रामचंद्रदास जी महाराज’ कहकर संबोधित करता है, तो शायद कहीं भीतर वह ‘मिट्ठू भैया’ भी मुस्कुरा उठते होंगे—वही सरल, सहज और अपनेपन से भरा चेहरा, जो कभी परिवार और समाज के बीच जाना-पहचाना था. नाम बदल गया, जीवन की दिशा बदल गई, लेकिन लोगों के प्रति वह स्नेह नहीं बदला.
कुछ जीवन बीतते नहीं हैं, वे दूसरों के जीवन में थोड़ा-थोड़ा होकर बस जाते हैं. स्वामी रामचंद्रदास जी महाराज की यात्रा भी ऐसी ही है. उनके हिस्से में आए वर्षों की गिनती भले 87 हो, लेकिन उनकी स्मृतियों में बसे लोगों के लिए वे आज भी वही ‘मिट्ठू भैया’ हैं—जिनकी पहचान किसी पद, पुरस्कार या परिचय से नहीं, बल्कि उस अपनत्व से होती है जिसे समय भी छीन नहीं पाता.
शायद यही किसी जीवन की सबसे बड़ी साधना है-अपने लिए कम और दूसरों के लिए इतना जीना कि उम्र आगे बढ़ जाए, नाम बदल जाए, दुनिया बदल जाए, लेकिन स्मृतियों में आपका अपनापन कभी पुराना न हो.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

