इंदौर. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि बालिग व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने और अपनी इच्छा के अनुसार जीवन जीने का अधिकार है. अदालत ने 20 वर्षीय युवती के उस निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, जिसमें उसने श्वेतांबर जैन धर्म का पालन करते हुए सांसारिक जीवन त्यागकर दीक्षा लेने और साध्वी बनने की इच्छा जताई थी. युवती के माता-पिता और रिश्तेदार उसके इस फैसले का विरोध कर रहे थे और युवती ने आशंका जताई थी कि उसके धार्मिक निर्णय, आवागमन और स्वतंत्रता में बाधा डाली जा सकती है.
न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट ने 7 सितंबर 2026 को रिट याचिका क्रमांक 48919/2025, तनिशा बनाम मध्यप्रदेश शासन एवं अन्य में यह आदेश पारित किया. अदालत ने कहा कि 18 वर्ष से अधिक उम्र की भारतीय नागरिक युवती अपने धर्म का पालन अपनी इच्छा के अनुसार करने और अपने जीवन के बारे में स्वयं निर्णय लेने की अधिकारी है. साथ ही, यदि उसके खिलाफ कोई जबरदस्ती या दबाव किया जाता है तो वह पुलिस से सहायता मांग सकती है और पुलिस को तत्काल कार्रवाई करनी होगी.
20 साल की युवती ने मांगी थी पुलिस सुरक्षा
याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में मुख्य रूप से अपनी सुरक्षा, स्वतंत्रता और निर्बाध आवागमन के लिए पुलिस संरक्षण की मांग की थी. उसने अदालत से यह निर्देश देने का आग्रह भी किया था कि उसके माता-पिता, अभिभावक, रिश्तेदार अथवा कोई अन्य व्यक्ति उसके श्वेतांबर जैन धर्म के पालन, दीक्षा लेने के निर्णय या भविष्य में होने वाले धार्मिक दीक्षा समारोह में हस्तक्षेप न करे.
युवती ने यह भी मांग की थी कि उसके खिलाफ किसी तरह की जबरदस्ती, झूठी शिकायत, आरोप या निगरानी की अनुमति न दी जाए. उसने संविधान के अनुच्छेद 19, 21, 25 और 26 के तहत अपने मौलिक अधिकारों को बिना किसी बाधा के इस्तेमाल करने की बात कही थी.
परिवार के विरोध और दबाव की जताई थी आशंका
याचिका में युवती की ओर से बताया गया कि उसने श्वेतांबर जैन धर्म को अपनाने और दीक्षा के धार्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने का निर्णय लिया है. उसके अनुसार, माता-पिता और रिश्तेदार उसके धार्मिक निर्णय का विरोध कर रहे हैं तथा उसे परेशान कर रहे हैं.
उसे आशंका थी कि परिवार के लोग उसके अंत:करण की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप कर सकते हैं. साथ ही उसके आवागमन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने का प्रयास किया जा सकता है. इस संबंध में उसने इंदौर के पुलिस आयुक्त के समक्ष सुरक्षा की मांग करते हुए आवेदन भी दिया था, जो उस समय लंबित था.
हाई कोर्ट ने माता-पिता की भावनाओं को भी समझा
अदालत ने अपने आदेश में केवल युवती के अधिकारों पर ही विचार नहीं किया, बल्कि माता-पिता की भावनात्मक स्थिति को भी स्वीकार किया. न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट ने कहा कि मामले के विशेष तथ्यों को देखते हुए अदालत को युवती और उसके माता-पिता दोनों के प्रति समान सहानुभूति है.
अदालत ने माना कि माता-पिता का विरोध अपनी बेटी के प्रति लगाव से पैदा हुआ है. यानी अदालत ने परिवार की भावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि माता-पिता का भावनात्मक लगाव किसी बालिग व्यक्ति के कानूनी अधिकारों पर रोक लगाने का आधार नहीं बन सकता.
बालिग होने के बाद अपना फैसला लेने का अधिकार
आदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा युवती की उम्र और उसकी कानूनी स्थिति को लेकर है. हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि युवती 20 वर्ष की है और भारत की नागरिक है. इसलिए वह अपने धर्म का पालन अपने तरीके से करने और अपनी इच्छा के अनुसार जीवन जीने की अधिकारी है.
अदालत ने यह भी कहा कि 18 वर्ष से अधिक उम्र के बालिग व्यक्ति को अपने परिवार और अन्य कानूनी अधिकारों की सुरक्षा पाने का अधिकार है. किसी भी व्यक्ति की ओर से उसके अधिकारों में बाधा पैदा करना कानून की नजर में स्वीकार्य नहीं हो सकता.
धर्म पालन के अधिकार को मिली स्पष्ट मान्यता
इस मामले में धार्मिक स्वतंत्रता का पहलू विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. युवती पहले से जैन धर्म का पालन कर रही थी और उसने अब सांसारिक जीवन का त्याग कर दीक्षा लेकर साध्वी बनने की इच्छा जताई थी.
हाई कोर्ट ने उसके इस निर्णय को परिवार की अनुमति से जोड़ने के बजाय एक बालिग नागरिक के व्यक्तिगत और धार्मिक अधिकार के संदर्भ में देखा. अदालत की टिप्पणी का व्यापक अर्थ यह है कि केवल पारिवारिक असहमति किसी बालिग व्यक्ति की धार्मिक पसंद को नियंत्रित करने का आधार नहीं बन सकती.
सुप्रीम कोर्ट के लता सिंह फैसले का सहारा
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का उल्लेख किया. अदालत ने कहा कि शीर्ष अदालत ने 18 वर्ष से अधिक उम्र के बालिग व्यक्तियों के संबंध में स्पष्ट किया है कि वे अपने फैसले स्वयं लेने के लिए स्वतंत्र हैं और अदालत का दायित्व ऐसे व्यक्ति के हितों की रक्षा करना है.
इस फैसले का संदर्भ देते हुए हाई कोर्ट ने युवती के मामले में भी यही सिद्धांत लागू किया कि बालिग व्यक्ति के जीवन संबंधी निर्णय पर केवल परिवार के विरोध के आधार पर रोक नहीं लगाई जा सकती.
पुलिस को नहीं दिया गया सामान्य आदेश
हाई कोर्ट ने युवती को ऐसा कोई स्थायी या असीमित पुलिस सुरक्षा आदेश नहीं दिया कि पुलिस हर परिस्थिति में उसके साथ रहे. इसके बजाय अदालत ने व्यावहारिक व्यवस्था बनाई.
अदालत ने कहा कि यदि युवती को किसी व्यक्ति की ओर से जबरदस्ती या दबाव का सामना करना पड़ता है, तो वह पुलिस अधीक्षक, संबंधित पुलिस थाने या संबंधित अधिकारी के सामने आवेदन कर सकती है. आवेदन मिलने के बाद संबंधित अधिकारी या थाना प्रभारी को मामले को देखना होगा और तत्काल कार्रवाई करनी होगी.
माता-पिता भी जबरदस्ती नहीं कर सकते
अदालत के निर्देश में विशेष रूप से यह महत्वपूर्ण है कि युवती के खिलाफ जबरदस्ती करने वाला व्यक्ति कोई भी हो सकता है, इसमें उसके माता-पिता भी शामिल हैं. यानी पारिवारिक संबंध पुलिस कार्रवाई में बाधा नहीं बनेंगे, यदि बालिग युवती स्वयं सुरक्षा की मांग लेकर सामने आती है.
अदालत ने संबंधित पुलिस अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के लता सिंह और शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ फैसलों में दिए गए निर्देशों के अनुरूप कार्रवाई करने को कहा है.
दीक्षा का फैसला अदालत ने अपने हाथ में नहीं लिया
इस आदेश का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि हाई कोर्ट ने युवती को दीक्षा लेने का निर्देश नहीं दिया और न ही यह तय किया कि उसे साध्वी बनना चाहिए या नहीं. अदालत ने उसके व्यक्तिगत निर्णय में हस्तक्षेप करने के बजाय यह सुनिश्चित किया कि वह एक बालिग नागरिक के रूप में अपने फैसले पर अमल करने के दौरान गैरकानूनी दबाव या बाधा से सुरक्षित रहे.
यानी अदालत का आदेश दीक्षा की धार्मिक प्रक्रिया को मंजूरी देने के बजाय युवती की स्वतंत्र इच्छा और कानूनी अधिकारों की रक्षा पर केंद्रित है. यह अंतर इस मामले को समझने के लिए महत्वपूर्ण है.
परिवार की चिंता बनाम बालिग की स्वतंत्रता
मामले में मूल टकराव दो अलग-अलग पक्षों के बीच दिखाई देता है. एक ओर माता-पिता का अपनी बेटी के प्रति भावनात्मक लगाव और उसके दीक्षा लेने के फैसले का विरोध है, दूसरी ओर 20 वर्षीय युवती की अपनी धार्मिक आस्था और जीवन की दिशा चुनने की इच्छा है.
हाई कोर्ट ने माता-पिता की भावनाओं को स्वीकार करते हुए भी कानूनी अधिकारों को प्राथमिक आधार बनाया. अदालत ने स्पष्ट किया कि भावनात्मक या सामाजिक दबाव के कारण किसी बालिग व्यक्ति के अधिकारों में हस्तक्षेप की अनुमति नहीं दी जा सकती.
याचिका का हुआ निपटारा
इन निर्देशों के साथ हाई कोर्ट ने रिट याचिका का निपटारा कर दिया. अब यदि युवती को अपने माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति से जबरदस्ती, दबाव या अन्य प्रकार की बाधा का सामना करना पड़ता है, तो वह संबंधित पुलिस अधिकारी के पास आवेदन कर सकती है. आवेदन मिलने पर पुलिस को सुप्रीम कोर्ट के संबंधित फैसलों के अनुरूप तत्काल कार्रवाई करनी होगी.
इस फैसले का व्यापक संदेश यह है कि बालिग नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता और अपने जीवन के संबंध में निर्णय लेने की क्षमता केवल इसलिए समाप्त नहीं हो जाती क्योंकि परिवार उसके फैसले से सहमत नहीं है. मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने माता-पिता की भावनाओं का सम्मान करते हुए भी कानून की सीमा स्पष्ट कर दी है कि किसी 18 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति के स्वतंत्र निर्णय में जबरन बाधा नहीं डाली जा सकती.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

