लखनऊ. सरकारी स्कूल की बदहाली को लेकर खबर प्रकाशित करने वाले पत्रकार के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है. अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि पत्रकार अमित यादव के खिलाफ दर्ज मामला स्कूल की कमियों को सामने लाने की उसकी रिपोर्टिंग के बाद की गई प्रतिशोधात्मक कार्रवाई प्रतीत होता है. अदालत ने टिप्पणी की कि स्कूल की व्यवस्था में कमियां सामने आई थीं तो अधिकारियों को उन पर ध्यान देकर सुधार की कार्रवाई करनी चाहिए थी, न कि इसे अहं का मुद्दा बनाकर पत्रकार के खिलाफ एफआईआर दर्ज करनी चाहिए थी.
न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने पत्रकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 223, 353 और 356 के तहत दर्ज एफआईआर के संचालन पर रोक लगा दी. अदालत ने निर्देश दिया कि अगले आदेश तक इस एफआईआर के आधार पर पत्रकार अमित यादव के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाए.
सरकारी स्कूल की हालत देखने पहुंचे थे पत्रकार
मामला लखनऊ के गोसाईंगंज क्षेत्र स्थित पूर्व माध्यमिक विद्यालय बेगरिया मऊ का है. अदालत के समक्ष रखे गए तथ्यों के अनुसार पत्रकार अमित यादव 20 अगस्त को स्कूल की स्थिति की रिपोर्टिंग करने पहुंचे थे.
पत्रकार ने स्कूल के शौचालयों की खराब स्थिति, पीने के पानी की उपलब्धता नहीं होने और परिसर की अन्य कमियों को देखा. उन्होंने स्कूल के कुछ शिक्षकों से बातचीत भी की. इसके बाद उन्होंने स्कूल की स्थिति से संबंधित रिपोर्ट तैयार की.
रिपोर्ट प्रकाशित होने के चार दिन बाद 24 अगस्त को पत्रकार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई.
एफआईआर में लगाए गए कई आरोप
एफआईआर में दावा किया गया कि स्कूल की स्थिति अच्छी थी, शौचालय साफ थे और वहां किसी तरह की समस्या नहीं थी. इसके विपरीत पत्रकार पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने बिना अनुमति स्कूल परिसर में प्रवेश किया, बच्चों की पढ़ाई में व्यवधान डाला और दो महिला शिक्षकों को स्कूल के संबंध में बोलने के लिए मजबूर किया.
एफआईआर में यह आरोप भी लगाया गया कि पत्रकार की रिपोर्टिंग राजनीतिक पूर्वाग्रह से प्रेरित थी.
पत्रकार ने हाई कोर्ट का रुख करते हुए एफआईआर रद्द करने और उसके आधार पर गिरफ्तारी या अन्य कार्रवाई से सुरक्षा की मांग की.
मानहानि के मामले में एफआईआर पर अदालत की आपत्ति
हाई कोर्ट ने एफआईआर में लगाई गई धाराओं की कानूनी स्थिति की भी जांच की. भारतीय न्याय संहिता की धारा 356 मानहानि से संबंधित है. अदालत ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ मामले के फैसले का उल्लेख किया.
अदालत ने कहा कि आपराधिक मानहानि की कार्यवाही सामान्य रूप से एफआईआर के माध्यम से शुरू नहीं की जा सकती. इसके लिए उस व्यक्ति की शिकायत जरूरी होती है, जिसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने का आरोप है.
भारतीय न्याय संहिता की धारा 222 में भी यह व्यवस्था है कि धारा 356 के अपराध का संज्ञान संबंधित व्यक्ति की शिकायत के आधार पर ही लिया जा सकता है. इस आधार पर अदालत ने एफआईआर में धारा 356 लगाए जाने को प्रथम दृष्टया कानूनी रूप से सवालों के घेरे में माना.
स्कूल की तस्वीरों ने भी उठाए सवाल
अदालत के सामने स्कूल परिसर और शौचालयों की तस्वीरें भी पेश की गईं. पीठ ने कहा कि तस्वीरें प्रथम दृष्टया स्कूल के शौचालयों और परिसर की बेहद खराब स्थिति की ओर इशारा करती हैं.
अदालत ने इसी संदर्भ में भारतीय न्याय संहिता की धारा 353 पर भी विचार किया. यह धारा सार्वजनिक शांति या व्यवस्था को प्रभावित करने वाले कथनों से संबंधित है. अदालत ने ध्यान दिलाया कि इस प्रावधान में ऐसी स्थिति के लिए अपवाद भी है, जहां संबंधित व्यक्ति के पास प्रकाशित सामग्री को सही मानने का उचित आधार हो और उसने सद्भावना में उसे प्रकाशित किया हो.
ऐसे में पत्रकार की रिपोर्ट के साथ सामने आई तस्वीरों और उपलब्ध सामग्री को देखते हुए अदालत ने माना कि इस कानूनी अपवाद पर भी अधिकारियों को विचार करना चाहिए था.
स्कूल में प्रवेश रोकने का कोई आदेश नहीं दिखा
भारतीय न्याय संहिता की धारा 223 के तहत भी एफआईआर दर्ज की गई थी. यह धारा किसी लोक सेवक द्वारा विधिवत जारी किए गए आदेश की अवहेलना से संबंधित है.
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि ऐसा कोई आदेश उनके पास उपलब्ध नहीं है, जिसके तहत पत्रकार का स्कूल में प्रवेश प्रतिबंधित किया गया हो.
इसके बाद अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि धारा 223 लगाने में अधिकारियों से गलती हुई प्रतीत होती है. अदालत के सामने ऐसा कोई आदेश नहीं रखा गया, जिसकी अवहेलना के आधार पर पत्रकार के खिलाफ यह धारा लगाई जा सके.
कमियां बताने पर सुधार होना चाहिए था
हाई कोर्ट ने मामले को केवल पत्रकार और प्रशासन के बीच विवाद के रूप में नहीं देखा. पीठ ने बच्चों की शिक्षा और सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कानूनी मानकों का भी उल्लेख किया.
अदालत ने बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार से संबंधित कानून का संदर्भ देते हुए कहा कि स्कूलों में बच्चों के लिए सुरक्षित और पर्याप्त पेयजल तथा लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं होना आवश्यक है.
ऐसे में यदि कोई पत्रकार किसी सरकारी स्कूल में इन सुविधाओं की कमी की रिपोर्ट करता है तो प्रशासन की पहली जिम्मेदारी यह देखना होनी चाहिए कि वास्तव में कमी है या नहीं. यदि कमी मिलती है तो उसे दूर करने के लिए कार्रवाई की जानी चाहिए.
अदालत ने कहा कि इसके बजाय मामले को अहं का मुद्दा बनाकर पत्रकार के खिलाफ एफआईआर दर्ज करना उचित रास्ता नहीं है.
अदालत ने माना प्रतिशोध की आशंका
पीठ ने पूरे घटनाक्रम को देखते हुए प्रथम दृष्टया माना कि पत्रकार द्वारा स्कूल की कमियां उजागर किए जाने के बाद उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई. अदालत के अनुसार, यह कार्रवाई प्रथम दृष्टया प्रतिशोधात्मक प्रतीत होती है.
पीठ ने इसे पत्रकार को उसकी रिपोर्टिंग के लिए निशाना बनाने जैसा माना और कहा कि मामला प्रथम दृष्टया पत्रकार के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई का संकेत देता है.
अदालत की इस टिप्पणी का अर्थ यह है कि इस स्तर पर कोर्ट ने अंतिम रूप से यह तय नहीं किया है कि एफआईआर में लगाए गए सभी आरोप झूठे हैं. लेकिन उपलब्ध सामग्री और एफआईआर में लगाई गई धाराओं को देखते हुए अदालत को हस्तक्षेप करने का पर्याप्त प्रथम दृष्टया आधार मिला.
पत्रकारिता की आजादी पर भी जोर
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पत्रकारिता की स्वतंत्रता को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़ा.
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के अर्णब रंजन गोस्वामी बनाम भारत संघ मामले में कही गई उस बात का उल्लेख किया, जिसमें पत्रकारों को बिना प्रतिशोध के डर के सत्ता से सवाल करने और सच सामने रखने की स्वतंत्रता के महत्व पर जोर दिया गया था.
अदालत ने माना कि यदि पत्रकारों को किसी व्यवस्था की कमियों को सामने लाने पर कार्रवाई का डर रहेगा तो इसका असर स्वतंत्र पत्रकारिता पर पड़ेगा.
स्कूल की मौजूदा स्थिति की रिपोर्ट मांगी
हाई कोर्ट ने केवल एफआईआर पर रोक लगाकर मामला समाप्त नहीं किया. अदालत ने बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है.
उन्हें चार सप्ताह के भीतर स्कूल की वर्तमान स्थिति की तस्वीरें पेश करनी होंगी. साथ ही यह भी बताना होगा कि पत्रकार की 20 अगस्त की रिपोर्ट के बाद स्कूल में किसी प्रकार की मरम्मत, निर्माण या बदलाव कराया गया है या नहीं.
अदालत ने अगली सुनवाई तक एफआईआर के आधार पर पत्रकार अमित यादव के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई पर रोक लगा दी है.
मामला अमित यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य से संबंधित है और आदेश 8 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन तथा न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने पारित किया.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

