महाकाल मंदिर के पास शाही मस्जिद का हिस्सा हटाने पर हाई कोर्ट की मंजूरी, सड़क चौड़ीकरण के खिलाफ दोनों याचिकाएं खारिज

महाकाल मंदिर के पास शाही मस्जिद का हिस्सा हटाने पर हाई कोर्ट की मंजूरी, सड़क चौड़ीकरण के खिलाफ दोनों याचिकाएं खारिज

प्रेषित समय :19:01:12 PM / Thu, Sep 10th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

इंदौर. सिंहस्थ कुंभ 2028 से पहले उज्जैन में सड़क और यातायात व्यवस्था को लेकर चल रही तैयारियों को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से महत्वपूर्ण कानूनी आधार मिल गया है. महाकाल मंदिर के समीप स्थित शाही मस्जिद के एक हिस्से को हटाकर सड़क चौड़ी करने के नगर निगम के निर्णय के खिलाफ दायर दो याचिकाओं को हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया. अदालत ने माना कि नगर निगम ने कार्रवाई से पहले संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया.

न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट की पीठ ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए कहा कि प्रस्तावित कार्रवाई को संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 300-ए का उल्लंघन नहीं माना जा सकता. अदालत के सामने मुख्य सवाल केवल धार्मिक संरचना के प्रभावित होने का नहीं था, बल्कि यह भी था कि सार्वजनिक सड़क के विस्तार के लिए की जा रही कार्रवाई मनमानी है या कानून के अनुरूप.

सिंहस्थ के दौरान बढ़ेगा दबाव
उज्जैन में वर्ष 2028 में सिंहस्थ कुंभ होना है. महाकालेश्वर मंदिर और क्षिप्रा नदी के आसपास का क्षेत्र इस आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं की भारी आवाजाही वाला प्रमुख क्षेत्र रहेगा. ऐसे में सड़क की क्षमता, पैदल यात्रियों की आवाजाही और वाहनों के दबाव को लेकर प्रशासन अभी से तैयारी कर रहा है.

नगर निगम का कहना था कि शाही सवारी, पेशवाई और सिंहस्थ के दौरान लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही के बीच मौजूदा मार्गों पर यातायात का दबाव काफी बढ़ सकता है. इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए सड़क को 15 मीटर तक चौड़ा करने की योजना बनाई गई है.

हाई कोर्ट ने भी इस व्यापक सार्वजनिक आवश्यकता को मामले के तथ्यों के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण माना.

मस्जिद के हिस्से पर उठी थी आपत्ति
मस्जिद के प्रबंधन का दावा करने वाले दो पक्षों ने नगर निगम के नोटिस और प्रस्तावित कार्रवाई को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. उनका कहना था कि सड़क चौड़ीकरण के लिए मस्जिद के जिस हिस्से को हटाने की योजना है, उसमें जमातखाना, करीब 120 फुट ऊंची मीनार और मजहर चौक शाही का हिस्सा प्रभावित होगा.

याचिकाकर्ताओं ने मस्जिद को पुरानी धार्मिक संरचना बताते हुए तर्क दिया कि नमाज स्थल, वजू की सुविधा और मीनार केवल भवन के हिस्से नहीं हैं, बल्कि धार्मिक गतिविधियों से जुड़े महत्वपूर्ण अंग हैं. इसलिए सड़क चौड़ीकरण के नाम पर इनका प्रभावित होना धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है.

निगम ने बताया 10 प्रतिशत से भी कम हिस्सा प्रभावित
नगर निगम ने अदालत के समक्ष अपने पक्ष में कहा कि प्रस्तावित कार्रवाई पूरी मस्जिद को प्रभावित नहीं करती. निगम के अनुसार मस्जिद के कुल ढांचे के 10 प्रतिशत से भी कम हिस्से को हटाने की आवश्यकता है.

निगम ने यह भी बताया कि उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण की व्यापक योजना के तहत करीब 90 धार्मिक संरचनाओं को हटाने या स्थानांतरित करने की कार्रवाई की जा रही है. इनमें मंदिर और मस्जिद दोनों शामिल हैं. निगम के अनुसार 10 मंदिर और एक मस्जिद पहले ही हटाए जा चुके हैं.

इसी आधार पर निगम ने भेदभाव के आरोप को खारिज किया और कहा कि कार्रवाई किसी एक धर्मस्थल को निशाना बनाकर नहीं की जा रही है, बल्कि सड़क विस्तार की व्यापक योजना का हिस्सा है.

क्या सड़क का विकल्प उपलब्ध था
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने यह भी दलील रखी कि सड़क चौड़ी करने के लिए वैकल्पिक जमीन उपलब्ध है. उनका कहना था कि यदि मार्ग में उपलब्ध दूसरी भूमि का उपयोग किया जाए तो मस्जिद की संरचना को नुकसान पहुंचाए बिना भी यातायात परियोजना को आगे बढ़ाया जा सकता है.

यह तर्क इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि मामला केवल धार्मिक अधिकारों तक सीमित नहीं था. यदि समान उद्देश्य कम नुकसान के साथ किसी दूसरे विकल्प से पूरा किया जा सकता हो तो प्रशासन को उस विकल्प पर विचार करना चाहिए या नहीं, यह भी न्यायिक समीक्षा का हिस्सा बन सकता है.

अदालत ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए निगम की कार्रवाई को केवल इस आधार पर मनमाना या पक्षपातपूर्ण नहीं माना.

वक्फ संपत्ति होने की दलील भी नहीं बनी आधार
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि शाही मस्जिद वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत है और मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड को समुचित तरीके से नोटिस नहीं दिया गया. इसके अलावा नगर निगम अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं होने का दावा भी किया गया.

हाई कोर्ट ने उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि मस्जिद के प्रबंधन से जुड़े पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया गया था. संबंधित आपत्तियों पर विचार करने के बाद कार्रवाई से जुड़े आदेश पारित किए गए. ऐसे में केवल प्रक्रिया पर सवाल उठाकर निगम की पूरी कार्रवाई को निरस्त करने का आधार अदालत को नहीं मिला.

धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर अदालत की नजर
याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन से जुड़े अधिकारों का हवाला दिया था. उनका तर्क था कि सार्वजनिक उद्देश्य का हवाला देकर किसी पुराने धार्मिक स्थल के आवश्यक हिस्से को प्रभावित नहीं किया जा सकता.

हाई कोर्ट ने हालांकि मामले की परिस्थितियों में माना कि प्रस्तावित कार्रवाई को धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता. अदालत ने यह भी देखा कि कार्रवाई किसी एक धार्मिक समुदाय तक सीमित नहीं बताई गई है और निगम ने सड़क चौड़ीकरण परियोजना के तहत अन्य धार्मिक संरचनाओं के संबंध में भी कदम उठाए हैं.

अनुच्छेद 14 के तहत भेदभाव का आरोप नहीं टिक सका
याचिकाकर्ताओं की एक प्रमुख आपत्ति यह थी कि निगम की कार्रवाई चयनात्मक और भेदभावपूर्ण है. अदालत ने इस पहलू पर भी रिकॉर्ड में मौजूद जानकारी को देखा.

नगर निगम द्वारा बड़ी संख्या में धार्मिक संरचनाओं के संबंध में कार्रवाई किए जाने की जानकारी को ध्यान में रखते हुए पीठ ने माना कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि शाही मस्जिद के खिलाफ कार्रवाई केवल धार्मिक पहचान के आधार पर की जा रही है.

इसी कारण अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार के उल्लंघन का तर्क भी स्वीकार नहीं किया गया.

सार्वजनिक हित और धार्मिक संरचना के बीच संतुलन
फैसले का व्यापक महत्व इस बात में है कि अदालत ने सार्वजनिक परियोजना और धार्मिक संरचना के विवाद को केवल धार्मिक अधिकारों के चश्मे से नहीं देखा. सिंहस्थ जैसे बड़े आयोजन में यातायात, श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सार्वजनिक सुविधाओं की आवश्यकता को भी मामले का हिस्सा माना गया.

साथ ही अदालत ने यह भी देखा कि प्रशासन ने प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर दिया या नहीं और कार्रवाई मनमानी तरीके से तो नहीं की गई. यानी सड़क चौड़ीकरण अपने आप में कार्रवाई को वैध नहीं बनाता, बल्कि उसके लिए कानूनी प्रक्रिया और परिस्थितियों का पालन भी जरूरी है.

अब निगम के लिए चुनौती अमल की
दोनों याचिकाएं खारिज होने के बाद शाही मस्जिद के प्रभावित हिस्से को लेकर नगर निगम की कार्रवाई के सामने फिलहाल हाई कोर्ट स्तर पर बाधा नहीं रही. अब आगे की प्रक्रिया प्रशासनिक स्तर पर होगी.

हालांकि सड़क चौड़ीकरण का काम केवल एक संरचना से जुड़े निर्णय तक सीमित नहीं है. सिंहस्थ 2028 को देखते हुए उज्जैन में सड़कों, यातायात मार्गों और श्रद्धालुओं की आवाजाही से जुड़े कई विकास कार्य प्रस्तावित हैं. ऐसे में धार्मिक और ऐतिहासिक संरचनाओं से जुड़े मामलों में प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती विकास कार्यों को आगे बढ़ाते हुए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया, प्रभावित पक्षों की आपत्तियों और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन बनाए रखना होगी.

हाई कोर्ट के इस आदेश से फिलहाल इतना स्पष्ट है कि उपलब्ध रिकॉर्ड और मामले की परिस्थितियों में शाही मस्जिद के प्रभावित हिस्से को हटाकर सड़क चौड़ी करने की नगर निगम की कार्रवाई को अदालत ने असंवैधानिक या मनमाना नहीं माना है. दोनों याचिकाएं खारिज कर दी गई हैं.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-