जयपुर. बीमा पॉलिसी जारी करने से पहले यदि कोई बैंक अपनी सुरक्षा व्यवस्था की कमियों की जानकारी बीमा कंपनी को दे देता है और कंपनी इसके बावजूद प्रीमियम स्वीकार कर पॉलिसी जारी करती है, तो बाद में उन्हीं कमियों को आधार बनाकर बीमा दावा खारिज नहीं किया जा सकता. राजस्थान हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट करते हुए बीमा कंपनी की याचिका खारिज कर दी. अदालत ने बैंक को 8.67 लाख रुपये का भुगतान करने के स्थायी लोक अदालत के आदेश को बरकरार रखा.
जस्टिस अनूप कुमार ढांड की अदालत ने कहा कि बीमा कंपनी को पॉलिसी जारी करने से पहले बैंक की सुरक्षा व्यवस्था की स्थिति की जानकारी थी. इसके बावजूद उसने प्रीमियम लिया और बीमा कवर प्रदान किया. ऐसी स्थिति में डकैती के बाद सुरक्षा व्यवस्था में कमी का हवाला देकर अपने दायित्व से पीछे नहीं हटा जा सकता.
डकैती के बाद बीमा कंपनी से मांगा था मुआवजा
मामला एक बैंक की बीमा पॉलिसी से जुड़ा था. बैंक ने अपनी निर्धारित राशि का बीमा कराया था. पॉलिसी प्रभावी होने के दौरान बैंक में डकैती की घटना हो गई. डकैती के कारण बैंक को आर्थिक नुकसान हुआ, जिसके बाद उसने बीमा कंपनी के समक्ष नुकसान की भरपाई के लिए दावा प्रस्तुत किया.
दावे को लेकर बैंक और बीमा कंपनी के बीच विवाद उत्पन्न हो गया. मामला स्थायी लोक अदालत के समक्ष पहुंचा. सुनवाई के बाद लोक अदालत ने बीमा कंपनी को बैंक को 8.67 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया.
बीमा कंपनी ने इस आदेश को राजस्थान हाई कोर्ट में चुनौती दी और दावा किया कि बैंक ने सुरक्षा से जुड़े निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया था.
सीसीटीवी और सुरक्षाकर्मी नहीं होने का दिया तर्क
बीमा कंपनी की ओर से हाई कोर्ट में दलील दी गई कि बैंक परिसर में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी. वहां सीसीटीवी कैमरे उपलब्ध नहीं थे और सुरक्षा के लिए बंदूकधारी सुरक्षाकर्मी भी तैनात नहीं था.
कंपनी ने भारतीय रिजर्व बैंक के सुरक्षा संबंधी निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि बैंक को निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन करना चाहिए था. कंपनी के अनुसार सुरक्षा में इन कमियों के कारण हुई डकैती से हुए नुकसान की जिम्मेदारी बीमा कंपनी पर नहीं डाली जा सकती.
बीमा कंपनी ने इसी आधार पर स्थायी लोक अदालत के आदेश को रद्द करने की मांग की थी.
हाई कोर्ट ने दलील को क्यों नहीं माना
हाई कोर्ट ने बीमा कंपनी की दलील को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने मामले के रिकॉर्ड के आधार पर पाया कि बैंक ने बीमा पॉलिसी लेने से पहले अपनी सुरक्षा व्यवस्था में मौजूद कमियों की जानकारी बीमा कंपनी को दे दी थी.
इसके बावजूद बीमा कंपनी ने बैंक से प्रीमियम स्वीकार किया और बीमा पॉलिसी जारी कर दी. अदालत ने इसी तथ्य को मामले का महत्वपूर्ण आधार माना.
कोर्ट ने कहा कि यदि बीमा कंपनी को लगता था कि बैंक की सुरक्षा व्यवस्था निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है तो उसके पास पॉलिसी जारी करने से पहले बैंक को आवश्यक सुधार करने के लिए कहने का विकल्प था. वह पॉलिसी जारी करने से इनकार भी कर सकती थी.
लेकिन जब कंपनी ने सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति जानते हुए प्रीमियम स्वीकार कर लिया और बीमा कवर प्रदान किया, तो घटना के बाद उन्हीं परिस्थितियों को आधार बनाकर दावा खारिज करने का रुख नहीं अपनाया जा सकता.
प्रीमियम लेने के बाद जिम्मेदारी से नहीं बच सकती कंपनी
जस्टिस अनूप कुमार ढांड ने अपने फैसले में बीमा अनुबंध की मूल भावना पर जोर दिया. अदालत ने कहा कि बीमा कंपनी को पॉलिसी जारी करने से पहले जोखिम का आकलन करने का पूरा अवसर मिलता है.
यदि किसी जोखिम या सुरक्षा कमी की जानकारी पहले से उपलब्ध है और कंपनी उस जानकारी के बावजूद बीमा कवर देती है, तो बाद में उसी जानकारी को दावा नकारने का आधार बनाना उचित नहीं होगा.
अदालत ने स्पष्ट किया कि पॉलिसी जारी करने के बाद कंपनी अपने पहले के रुख से पीछे नहीं हट सकती. यानी जिस परिस्थिति की जानकारी बीमा कंपनी को पॉलिसी जारी करते समय थी, उसी को बाद में अपने दायित्व से बचने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
स्थायी लोक अदालत का आदेश बरकरार
हाई कोर्ट ने स्थायी लोक अदालत के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें बैंक को 8.67 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था.
अदालत ने बीमा कंपनी की याचिका खारिज करते हुए भुगतान के आदेश को बरकरार रखा. इस फैसले से बैंक के पक्ष में स्थायी लोक अदालत द्वारा दिया गया मुआवजे का आदेश प्रभावी बना रहा.
फैसले का व्यापक महत्व
यह फैसला बीमा अनुबंधों में जोखिम के आकलन और बीमा कंपनी की जिम्मेदारी के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा सकता है. अदालत के निर्णय का मूल आधार यह है कि बीमा कंपनी पॉलिसी जारी करने से पहले जोखिम और सुरक्षा व्यवस्था की जांच कर सकती है. यदि उसे किसी कमी की जानकारी मिलती है, तो वह ग्राहक से उसे दूर करने के लिए कह सकती है या पॉलिसी जारी नहीं कर सकती.
लेकिन यदि कंपनी जानकारी होने के बावजूद प्रीमियम स्वीकार करती है और बीमा पॉलिसी जारी करती है, तो बाद में उसी ज्ञात कमी को आधार बनाकर दावा खारिज करने की स्थिति अलग होगी.
मामले में बैंक ने सुरक्षा संबंधी कमियों को पहले ही बीमा कंपनी के संज्ञान में ला दिया था. इसलिए हाई कोर्ट ने कंपनी की उस दलील को महत्व नहीं दिया कि सुरक्षा मानकों का पालन नहीं होने के कारण वह डकैती से हुए नुकसान की भरपाई के लिए जिम्मेदार नहीं है.
फैसले का संदेश स्पष्ट है कि बीमा कंपनी को पॉलिसी जारी करते समय जोखिम का मूल्यांकन पूरी सावधानी से करना होगा. ग्राहक द्वारा पहले से बताई गई परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए पॉलिसी जारी करने के बाद दावा उत्पन्न होने पर उन्हीं परिस्थितियों को अचानक दायित्व से बचने का आधार नहीं बनाया जा सकता.
राजस्थान हाई कोर्ट ने इसी आधार पर बीमा कंपनी की चुनौती खारिज करते हुए बैंक के पक्ष में 8.67 लाख रुपये के भुगतान का आदेश कायम रखा.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

