रांची. नाबालिग बच्चों की कस्टडी को लेकर चलने वाले विवादों में माता-पिता के कानूनी अधिकारों से अधिक महत्वपूर्ण बच्चे का कल्याण और उसका सर्वोत्तम हित है. झारखंड हाईकोर्ट ने चार साल छह महीने की बच्ची की अंतरिम कस्टडी उसकी मां को सौंपते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि इतनी कम उम्र में बच्ची को मां के प्यार, दुलार और देखभाल की विशेष जरूरत है. मामले में यह तथ्य भी अदालत के सामने था कि बच्ची का जन्म आईवीएफ प्रक्रिया के माध्यम से हुआ था और मां ने इस प्रक्रिया से जुड़ी तकलीफों और त्याग को सहा था.
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ ने डॉ. संगीता विश्वकर्मा उर्फ संगीता विश्वकर्मा बनाम राहुल रंजन, एफए संख्या 335/2026 मामले की सुनवाई करते हुए हजारीबाग फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मां की ओर से दायर अंतरिम कस्टडी की मांग खारिज कर दी गई थी. हाईकोर्ट ने मुख्य कस्टडी और अभिभावकत्व की कार्यवाही पूरी होने तक बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को सौंपने का निर्देश दिया है.
फैमिली कोर्ट ने कस्टडी देने से किया था इनकार
मामला हजारीबाग फैमिली कोर्ट के समक्ष पहुंचा था, जहां मां ने गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 12 के तहत अपनी नाबालिग बेटी की अंतरिम कस्टडी मांगी थी. फैमिली कोर्ट ने उसकी मांग स्वीकार नहीं की और बच्ची को मां की अंतरिम कस्टडी में देने के बजाय उसे बच्ची से मिलने का अधिकार प्रदान किया था.
फैमिली कोर्ट का कहना था कि नाबालिग बच्चे को माता-पिता दोनों के प्यार और स्नेह की आवश्यकता होती है. इसके बाद मां ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी.
हाईकोर्ट ने पूरे मामले के तथ्यों, बच्ची की उम्र और लागू कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए फैमिली कोर्ट के दृष्टिकोण की समीक्षा की और माना कि अंतरिम कस्टडी के सवाल पर बच्चे के सर्वोत्तम हित को केंद्र में रखकर विचार किया जाना आवश्यक था.
दोनों पक्ष विनोबा भावे विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर
मामले में अपीलकर्ता मां और प्रतिवादी पिता दोनों विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग में सहायक प्रोफेसर हैं. दोनों की शादी 16 मई 2017 को हुई थी. अदालत के समक्ष यह भी तथ्य था कि दोनों पक्षों का पहले भी विवाह हो चुका था.
बाद में दोनों ने आपसी सहमति से परिवार बढ़ाने का निर्णय लिया. इसके लिए उन्होंने आईवीएफ प्रक्रिया का सहारा लिया. इस प्रक्रिया के बाद मां ने 8 मार्च 2022 को बच्ची को जन्म दिया.
बच्ची के जन्म के बाद दंपती के बीच वैवाहिक संबंधों में विवाद उत्पन्न हुआ और मामला अंततः कस्टडी के विवाद तक पहुंच गया.
मां ने प्रताड़ना और बेटी से दूर रखने का लगाया आरोप
मां की ओर से अदालत के समक्ष आरोप लगाया गया कि उसे वैवाहिक जीवन के दौरान शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा. उसने आरोप लगाया कि परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उसे ससुराल छोड़ना पड़ा.
मां का यह भी आरोप था कि उसे अपनी बेटी तक पहुंचने से रोका गया और वह बच्ची से मिलने तथा उसकी देखभाल करने में सक्षम नहीं थी. इसी परिस्थिति में उसने बच्ची की अंतरिम कस्टडी हासिल करने के लिए फैमिली कोर्ट का रुख किया था.
दूसरी ओर, पिता ने इन आरोपों से इनकार किया. उनका कहना था कि मां अपनी इच्छा से बच्ची को छोड़कर ससुराल से चली गई थी. इस प्रकार दोनों पक्षों के बीच बच्ची की देखभाल और उसके साथ रहने को लेकर विवाद बना रहा.
हाईकोर्ट ने बच्चे के कल्याण को माना निर्णायक कारक
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कस्टडी से जुड़े कानूनी सिद्धांत पर विशेष जोर दिया. अदालत ने कहा कि कस्टडी और अभिभावकत्व के मामलों में निर्णायक आधार माता-पिता का कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि बच्चे का कल्याण और उसका सर्वोत्तम हित होना चाहिए.
पीठ ने हिंदू अल्पसंख्यक और अभिभावकता अधिनियम, 1956 की धारा 6(ए) और धारा 13 के साथ गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 12 को ध्यान में रखते हुए मामले पर विचार किया.
अदालत ने स्पष्ट किया कि कस्टडी का फैसला केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि किस माता-पिता का कानूनी अधिकार अधिक है. अदालत का प्रमुख दायित्व यह देखना है कि बच्चे के शारीरिक, भावनात्मक और समग्र विकास के लिए कौन-सी व्यवस्था बेहतर होगी.
चार साल की बच्ची को मां की जरूरत पर दिया जोर
हाईकोर्ट ने बच्ची की उम्र को मामले का महत्वपूर्ण पहलू माना. अदालत ने कहा कि बच्ची की उम्र लगभग चार साल छह महीने है और इतनी कम उम्र में उसे मां के प्यार और दुलार की बहुत आवश्यकता है.
अदालत ने यह भी माना कि बच्ची अभी इतनी उम्र की नहीं है कि वह अपने हित में स्वतंत्र और समझदारी से अपनी पसंद तय कर सके. ऐसे में उसकी कस्टडी को लेकर फैसला करते समय उसकी उम्र और विकासात्मक जरूरतों को प्राथमिकता देना जरूरी है.
पीठ ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि बच्ची का जन्म आईवीएफ के जरिए हुआ था. अदालत ने कहा कि मां ने इस प्रक्रिया से जुड़ी तकलीफों और त्याग को सहा है.
यह तथ्य अदालत के समक्ष मां और बच्ची के संबंध की परिस्थितियों को समझने के लिए एक प्रासंगिक पहलू के रूप में आया.
आईवीएफ से जुड़े दर्द और त्याग का अदालत ने किया उल्लेख
फैसले में आईवीएफ प्रक्रिया से जुड़े मां के अनुभव का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा. अदालत ने कहा कि यह एक स्वीकार किया गया तथ्य है कि बच्ची का जन्म आईवीएफ के माध्यम से हुआ और अपीलकर्ता मां ने इससे जुड़ी तकलीफों और त्याग को सहा है.
हालांकि कस्टडी का निर्णय केवल आईवीएफ के आधार पर नहीं किया गया. अदालत ने बच्ची की उम्र, मां की भूमिका, परिस्थितियों और बच्चे के सर्वोत्तम हित को समग्र रूप से देखते हुए अंतरिम कस्टडी का निर्णय लिया.
यानी अदालत के आदेश का मूल आधार बच्ची का कल्याण रहा, जबकि आईवीएफ से जुड़ी मां की तकलीफ और त्याग उन परिस्थितियों में विचार किए गए कारकों में शामिल रहे.
मुख्य कस्टडी का फैसला अभी बाकी
हाईकोर्ट ने बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को देने का आदेश दिया है. इसका अर्थ यह नहीं है कि मुख्य कस्टडी का अंतिम विवाद भी तय हो गया है.
अदालत ने निर्देश दिया कि मुख्य कस्टडी और अभिभावकत्व से जुड़ी कार्यवाही पूरी होने तक बच्ची मां के साथ रहेगी. अंतिम कस्टडी का प्रश्न संबंधित कार्यवाही और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर तय किया जा सकता है.
इस प्रकार हाईकोर्ट का आदेश तत्काल अंतरिम व्यवस्था से संबंधित है, जिसका उद्देश्य मुख्य कार्यवाही लंबित रहने के दौरान बच्ची के हितों की रक्षा करना है.
पिता को भी बच्ची से मिलने का अधिकार
हाईकोर्ट ने बच्ची को मां की अंतरिम कस्टडी में सौंपते हुए पिता के अधिकारों को भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया. अदालत ने पिता को बच्ची से मिलने का अधिकार दिया है.
पिता को सप्ताहांत में सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक बच्ची से मिलने की अनुमति दी गई है. हालांकि इस मुलाकात की व्यवस्था इस तरह करने को कहा गया है कि बच्ची की पढ़ाई या उसकी नियमित गतिविधियों में किसी प्रकार की बाधा न आए.
इस व्यवस्था का उद्देश्य बच्ची को दोनों माता-पिता के स्नेह और संपर्क से जोड़े रखना है.
माता-पिता का विवाद बच्चे के हित पर हावी नहीं हो सकता
फैसले का व्यापक संदेश यही है कि माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद या कस्टडी को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई का प्रभाव बच्चे के हित पर हावी नहीं होना चाहिए. अदालत को हर स्थिति में यह देखना होता है कि बच्चे के लिए सुरक्षित, स्थिर और भावनात्मक रूप से बेहतर वातावरण कहां उपलब्ध है.
फैमिली कोर्ट ने जहां मां को बच्ची से मिलने का अधिकार देकर दोनों माता-पिता के संपर्क को बनाए रखने की कोशिश की थी, वहीं हाईकोर्ट ने बच्ची की कम उम्र और परिस्थितियों को देखते हुए अंतरिम कस्टडी मां को देने को अधिक उपयुक्त माना.
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया
सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मां की अंतरिम कस्टडी की मांग खारिज की गई थी.
पीठ ने मुख्य कस्टडी और अभिभावकत्व की कार्यवाही पूरी होने तक बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को सौंपने का निर्देश दिया. साथ ही पिता के लिए सप्ताहांत में मुलाकात की व्यवस्था कायम रखी गई.
डॉ. संगीता विश्वकर्मा उर्फ संगीता विश्वकर्मा बनाम राहुल रंजन, एफए संख्या 335/2026 में हाईकोर्ट का यह आदेश एक बार फिर इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि बाल कस्टडी के मामलों में सबसे ऊपर बच्चे का कल्याण और सर्वोत्तम हित है. माता-पिता के अधिकार महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन अंतिम कसौटी यह होगी कि बच्चे के लिए कौन-सी व्यवस्था उसके समग्र विकास और हित में बेहतर है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

