ब्रिक्स में जलवायु पर बड़ा बदलाव, अब पर्यावरण नहीं, अर्थव्यवस्था के केंद्र में होगा संकट

ब्रिक्स में जलवायु पर बड़ा बदलाव, अब पर्यावरण नहीं, अर्थव्यवस्था के केंद्र में होगा संकट

प्रेषित समय :18:37:33 PM / Sun, Sep 13th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक बहस लंबे समय से उत्सर्जन घटाने, कार्बन कटौती और तापमान वृद्धि को सीमित करने के इर्द-गिर्द घूमती रही है. लेकिन नई दिल्ली में हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की घोषणा इस बहस को एक व्यापक आर्थिक और रणनीतिक संदर्भ में देखने का संकेत देती है. 45 पन्नों की नई दिल्ली घोषणा में जलवायु को केवल पर्यावरणीय संकट के रूप में नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, वित्त, बुनियादी ढांचे, खाद्य सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों और आपदा प्रबंधन से जुड़े आर्थिक सवाल के रूप में सामने रखा गया है.

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रिक्स में शामिल देशों के सामने विकास और जलवायु कार्रवाई की दोहरी चुनौती है. उन्हें एक ओर गरीबी, रोजगार, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे की जरूरत पूरी करनी है, तो दूसरी ओर बाढ़, सूखा, अत्यधिक गर्मी, भूस्खलन और अन्य जलवायु जोखिमों से अपनी अर्थव्यवस्थाओं को बचाना है. घोषणा का केंद्रीय संदेश यही दिखाई देता है कि जलवायु परिवर्तन को अब विकास की मुख्यधारा से बाहर रखकर नहीं देखा जा सकता.

जलवायु संकट अब सीधे अर्थव्यवस्था पर असर डाल रहा
किसी शहर में बाढ़ आने का अर्थ केवल पानी भरना नहीं है. इससे सड़कें बंद होती हैं, बिजली व्यवस्था प्रभावित होती है, कारोबार रुकता है और आपूर्ति शृंखला टूटती है. इसी तरह सूखा केवल कृषि की समस्या नहीं रहता, बल्कि खाद्य कीमतों, ग्रामीण आय और समूची अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है. अत्यधिक गर्मी बिजली की मांग बढ़ाती है और स्वास्थ्य तथा श्रम उत्पादकता पर असर डालती है.

इसी आर्थिक वास्तविकता को ब्रिक्स की नई दिल्ली घोषणा में व्यापक रूप से जोड़ा गया है. जलवायु जोखिम को औद्योगिक नीति, ऊर्जा व्यवस्था, महत्वपूर्ण खनिज, आपूर्ति शृंखला, छोटे कारोबार, बीमा और खाद्य सुरक्षा से जोड़ना बताता है कि जलवायु नीति का दायरा अब पर्यावरण मंत्रालयों से आगे बढ़कर वित्त, उद्योग, ऊर्जा और शहरी नियोजन तक पहुंच चुका है.

नेपाल की आपदा ने चेतावनी और तैयारी का फर्क दिखाया
घोषणा के समय हाल में सामने आई पर्वतीय आपदाओं ने भी इस बहस को और प्रासंगिक बना दिया है. नेपाल में 26 अगस्त को रसुवा क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टान के बड़े हिस्से के टूटने से अचानक पैदा हुई आपदा ने दिखाया कि हर प्राकृतिक खतरे के लिए लंबी चेतावनी अवधि उपलब्ध नहीं होती.

यहीं जलवायु-लचीले बुनियादी ढांचे की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. शुरुआती चेतावनी प्रणाली कई आपदाओं में जान बचा सकती है, लेकिन अचानक होने वाली घटनाओं में चेतावनी का समय बेहद कम हो सकता है. ऐसे में सवाल यह बन जाता है कि क्या सड़कें, पुल, बिजली व्यवस्था, अस्पताल और शहर उस अचानक आने वाले झटके को सहने के लिए तैयार हैं.

ब्रिक्स घोषणा में शुरुआती चेतावनी के आंकड़ों को योजना में शामिल करने, जलवायु-लचीले शहरी बुनियादी ढांचे और जोखिम आधारित योजना पर जोर इसी बदलती सोच की ओर संकेत करता है.

जलवायु वित्त सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौती
जलवायु कार्रवाई की चर्चा में वित्त का सवाल सबसे कठिन मुद्दों में से एक है. विकासशील देशों को जलवायु अनुकूलन के लिए भारी निवेश की जरूरत है. उन्हें बाढ़ से बचाने वाली सड़कें, जल-संरक्षण व्यवस्था, गर्मी सहने वाले शहर, सुरक्षित बिजली तंत्र और जलवायु-अनुकूल कृषि विकसित करनी है. दूसरी तरफ कई देशों पर पहले से ही कर्ज का दबाव है.

नई दिल्ली घोषणा में विकासशील देशों के लिए वित्तीय गुंजाइश बढ़ाने, कर्ज की स्थिरता और अनुकूलन के लिए पर्याप्त, अतिरिक्त, पूर्वानुमेय तथा आसानी से उपलब्ध वित्त की आवश्यकता पर जोर दिया गया है.

इसका राजनीतिक अर्थ भी महत्वपूर्ण है. विकासशील देशों का तर्क है कि जलवायु परिवर्तन उनके विकास के रास्ते को प्रभावित कर रहा है, इसलिए जलवायु वित्त को विकास वित्त से पूरी तरह अलग करके नहीं देखा जा सकता. नई विकास बैंक की भूमिका, स्थानीय मुद्रा में ऋण और बुनियादी ढांचा निवेश का विस्तार इसी व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण से जुड़ता है.

कार्बन सीमा शुल्क पर ब्रिक्स की चिंता
जलवायु और व्यापार का टकराव कार्बन सीमा समायोजन के मुद्दे पर सबसे स्पष्ट दिखाई देता है. घोषणा में ऐसे कार्बन सीमा उपायों का विरोध किया गया है जिन्हें सदस्य देश एकतरफा, दंडात्मक, भेदभावपूर्ण या संरक्षणवादी मानते हैं.

इसका मूल विवाद यह है कि विकसित अर्थव्यवस्थाएं अपने बाजारों में कार्बन उत्सर्जन से जुड़े मानक लागू करती हैं, लेकिन उन मानकों का प्रभाव दूसरे देशों से आने वाले उत्पादों पर भी पड़ सकता है. विकासशील देशों को आशंका है कि इससे उनके निर्यात की लागत बढ़ेगी और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा प्रभावित होगी.

यही कारण है कि ब्रिक्स जलवायु से जुड़े व्यापार नियमों को अधिक बहुपक्षीय और प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने की बात कर रहा है. यहां जलवायु नीति आर्थिक शक्ति और वैश्विक व्यापार व्यवस्था से सीधे जुड़ जाती है.

हरित ऊर्जा की दौड़ में महत्वपूर्ण खनिज नया मोर्चा
ऊर्जा संक्रमण की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने के लिए दुनिया को जिन तकनीकों की जरूरत है, उनके लिए कई महत्वपूर्ण खनिज आवश्यक हैं. बैटरी, विद्युत वाहन, सौर ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण और आधुनिक बिजली ग्रिड सभी के लिए इन संसाधनों की जरूरत बढ़ रही है.

ऐसे में महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति केवल तकनीकी सवाल नहीं रह जाती. यह औद्योगिक और रणनीतिक शक्ति का विषय बन जाती है.

ब्रिक्स घोषणा में इन खनिजों की आपूर्ति शृंखलाओं को विश्वसनीय, विविध, टिकाऊ और न्यायपूर्ण बनाने पर जोर दिया गया है. साथ ही संसाधन संपन्न विकासशील देशों के लिए केवल कच्चा माल निर्यात करने के बजाय देश के भीतर प्रसंस्करण, विनिर्माण और मूल्यवर्धन बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया गया है.

इसका मतलब स्पष्ट है कि हरित अर्थव्यवस्था में केवल संसाधन होना पर्याप्त नहीं होगा. असली आर्थिक लाभ उस देश को मिलेगा जो संसाधन से लेकर तकनीक और विनिर्माण तक मूल्य शृंखला में अधिक हिस्सा हासिल कर सके.

नेट जीरो से आगे विकास का सवाल
कौटिल्य स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी के प्रोफेसर रथिन रॉय ने घोषणा में टिकाऊ विकास के व्यापक दृष्टिकोण की ओर ध्यान आकर्षित किया है. उनके अनुसार, दस्तावेज में टिकाऊ विकास को जलवायु परिवर्तन से बड़े सामाजिक और आर्थिक संदर्भ में देखा गया है और पश्चिमी जलवायु विमर्श में प्रमुखता से इस्तेमाल होने वाला ‘नेट जीरो’ यहां केंद्रीय फ्रेम के रूप में सामने नहीं आता.

यह अंतर विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण है. उनके लिए जलवायु कार्रवाई का सवाल केवल यह नहीं है कि उत्सर्जन कब शून्य होगा. सवाल यह भी है कि ऊर्जा सस्ती रहेगी या नहीं, उद्योगों को बिजली मिलेगी या नहीं, रोजगार पैदा होंगे या नहीं और किसानों तथा गरीब आबादी को जलवायु जोखिम से कैसे बचाया जाएगा.

इसीलिए घोषणा में न्यायसंगत संक्रमण, राष्ट्रीय परिस्थितियों और साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों के सिद्धांत पर जोर दिया गया है.

फॉसिल फ्यूल पर रुख भी आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा
ब्रिक्स की दृष्टि में ऊर्जा संक्रमण का अर्थ तत्काल जीवाश्म ईंधन को पूरी तरह समाप्त करना नहीं है. ऊर्जा सुरक्षा और विकासशील देशों की वास्तविक जरूरतों को भी इसमें शामिल किया गया है. यह दृष्टिकोण पश्चिमी जलवायु विमर्श से अलग राजनीतिक प्राथमिकता को सामने रखता है.

चीन क्लाइमेट हब और एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के निदेशक ली शुओ के आकलन के अनुसार, ब्रिक्स विकास और डीकार्बोनाइजेशन को एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्य के बजाय साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहा है. यानी संक्रमण जरूरी है, लेकिन उसकी गति और शर्तें देशों की आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप होनी चाहिए.

घोषणा की असली परीक्षा अब जमीन पर होगी
नई दिल्ली घोषणा में कार्बन बाजार, जलवायु अनुसंधान, समुदाय आधारित अनुकूलन, स्मार्ट ग्रिड, ऊर्जा भंडारण, हाइड्रोजन, महत्वपूर्ण खनिज, परिवहन के डीकार्बोनाइजेशन, आपदा जोखिम और जलवायु-लचीले बुनियादी ढांचे जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग की दिशा दिखाई गई है.

लेकिन किसी भी अंतरराष्ट्रीय घोषणा की वास्तविक सफलता उसके क्रियान्वयन से तय होती है. साझा प्राथमिकताओं को वास्तविक परियोजनाओं, वित्तीय संसाधनों, तकनीकी सहयोग और स्थानीय स्तर की तैयारी में बदलना सबसे बड़ी चुनौती होगी.

विश्व संसाधन संस्थान इंडिया की कार्यकारी निदेशक उल्का केलकर ने जलवायु-लचीले शहरी बुनियादी ढांचे और आपदा जोखिम साझा करने की व्यवस्थाओं के महत्व की ओर संकेत किया है. वहीं ऊर्जा और जलवायु नीति विशेषज्ञ अंब मंजीव पुरी के अनुसार, वैश्विक दक्षिण के लिए सहयोग, आपूर्ति शृंखलाओं का लचीलापन और आपदा तैयारी आने वाले दौर में और महत्वपूर्ण होंगे.

असली सवाल जलवायु नहीं आर्थिक सुरक्षा का है
ब्रिक्स की नई दिल्ली घोषणा का विश्लेषण करें तो इसका सबसे बड़ा संकेत यही है कि जलवायु परिवर्तन अब किसी एक मंत्रालय या नीति क्षेत्र का विषय नहीं रह गया है. यह तय करेगा कि आने वाले वर्षों में कौन से उद्योग प्रतिस्पर्धी रहेंगे, ऊर्जा कितनी महंगी होगी, महत्वपूर्ण खनिजों पर किसका नियंत्रण होगा, विकासशील देशों को कितना वित्त मिलेगा और आपदाओं का आर्थिक नुकसान कौन उठाएगा.

इसलिए ब्रिक्स की जलवायु राजनीति को केवल उत्सर्जन के आंकड़ों से समझना अधूरा होगा. असली बहस विकास, वित्त, व्यापार, ऊर्जा और रणनीतिक संसाधनों की है.

जलवायु संकट अब पर्यावरण की सीमा पार कर चुका है. वह सीधे अर्थव्यवस्था, विकास और वैश्विक शक्ति-संतुलन के केंद्र में पहुंच चुका है. नई दिल्ली घोषणा इसी बदलती वैश्विक राजनीति का संकेत देती है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-