राज्यपाल का कार्यकाल खत्म होते ही पद खाली नहीं होता, हाई कोर्ट ने जनहित याचिका खारिज की

राज्यपाल का कार्यकाल खत्म होते ही पद खाली नहीं होता, हाई कोर्ट ने जनहित याचिका खारिज की

प्रेषित समय :19:37:36 PM / Thu, Sep 17th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. मध्य प्रदेश के राज्यपाल के पांच वर्ष के कार्यकाल की अवधि पूरी होने के बाद नए राज्यपाल की नियुक्ति को लेकर दायर जनहित याचिका पर हाई कोर्ट ने संविधान में निहित निरंतरता की व्यवस्था को स्पष्ट किया है. न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल का कार्यकाल समाप्त हो जाने मात्र से पद संवैधानिक रूप से रिक्त नहीं हो जाता. संविधान के अनुच्छेद 156(3) के परंतुक के अनुसार वर्तमान राज्यपाल तब तक पद पर बने रहते हैं, जब तक उनका उत्तराधिकारी पदभार ग्रहण नहीं कर लेता. इसी आधार पर न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की युगलपीठ ने याचिका खारिज कर दी.

नए राज्यपाल की नियुक्ति के लिए निर्देश मांगने पहुंचा मामला
मामला जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डाॅ. एमए खान द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा था. याचिका में मध्य प्रदेश के राज्यपाल का पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के बाद नए राज्यपाल की नियुक्ति किए जाने की मांग की गई थी. याचिकाकर्ता की ओर से यह भी मांग रखी गई थी कि जब तक नए राज्यपाल की नियुक्ति नहीं होती, तब तक मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को राज्यपाल का प्रभार सौंपा जाए.

याचिका में राज्यपाल के कार्यकाल की अवधि पूरी होने के बाद संवैधानिक स्थिति को लेकर प्रश्न उठाया गया था. इसी सवाल पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से संविधान के अनुच्छेद 156 की व्यवस्था पर भरोसा किया गया. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा था और अब याचिका पर अपना निर्णय सुनाया है.

संविधान की व्यवस्था पर केंद्रित रहा न्यायालय का फैसला
मामले में हाई कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 156(3) के परंतुक को महत्वपूर्ण माना. संविधान में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि राज्यपाल पांच वर्ष की अवधि के लिए पद पर रहते हैं, लेकिन कार्यकाल समाप्त हो जाने के बाद भी वे तब तक पद पर बने रहते हैं, जब तक उनका उत्तराधिकारी पदभार ग्रहण नहीं कर लेता.

इस संवैधानिक प्रावधान का सीधा अर्थ यह है कि केवल पांच वर्ष की अवधि पूरी हो जाना अपने आप में पद पर तत्काल रिक्तता पैदा नहीं करता. उत्तराधिकारी के पदभार ग्रहण करने तक मौजूदा राज्यपाल के पद पर बने रहने की व्यवस्था संविधान में ही की गई है. हाई कोर्ट ने इसी प्रावधान के आधार पर याचिका में उठाए गए संवैधानिक रिक्तता के तर्क को स्वीकार नहीं किया.

राज्यपाल के पद पर रिक्तता से बचाने की संवैधानिक व्यवस्था
हाई कोर्ट के फैसले में जिस संवैधानिक व्यवस्था पर भरोसा किया गया है, उसका संबंध केवल वर्तमान मामले से नहीं बल्कि राज्यपाल के पद की निरंतरता से है. संविधान के अनुच्छेद 153 में प्रत्येक राज्य के लिए राज्यपाल का प्रावधान है. वहीं अनुच्छेद 156 राज्यपाल के कार्यकाल और उसके बाद पद पर बने रहने की स्थिति को निर्धारित करता है.

सर्वोच्च न्यायालय भी पहले यह स्पष्ट कर चुका है कि राज्यपाल का पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद भी, उत्तराधिकारी के पदभार ग्रहण करने तक मौजूदा राज्यपाल पद पर बने रह सकते हैं. कृष्ण बल्लभ सहाय बनाम आयोग जांच एवं अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 156(3) के इसी परंतुक की व्याख्या की थी. न्यायालय ने माना था कि राज्य में राज्यपाल के पद पर अंतराल की स्थिति पैदा न हो, इसलिए उत्तराधिकारी के पदभार ग्रहण करने तक मौजूदा राज्यपाल के बने रहने की व्यवस्था लागू होती है.

1968 के सुप्रीम कोर्ट फैसले का भी उल्लेख
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में जिस सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, वह वर्ष 1968 का कृष्ण बल्लभ सहाय बनाम आयोग जांच एवं अन्य मामला है. इस मामले में भी यह प्रश्न उठा था कि पांच वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद क्या राज्यपाल अपने पद पर वैध रूप से बने रह सकते हैं.

सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 156(3) के परंतुक की व्याख्या करते हुए कहा था कि राज्यपाल अपने उत्तराधिकारी के पदभार ग्रहण करने तक पद पर बने रहते हैं. फैसले में यह भी कहा गया कि संविधान राज्य में राज्यपाल के पद को बिना किसी पदाधिकारी के छोड़ने वाली स्थिति की कल्पना नहीं करता.

इस पुराने निर्णय का महत्व वर्तमान मामले में इसलिए भी रहा क्योंकि याचिका का मूल प्रश्न ही कार्यकाल समाप्त होने के बाद राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति से जुड़ा था.

मुख्य न्यायाधीश को प्रभार देने की मांग पर भी असर
याचिकाकर्ता की ओर से नए राज्यपाल की नियुक्ति होने तक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को राज्यपाल का प्रभार सौंपने की मांग भी की गई थी. लेकिन जब न्यायालय ने यह माना कि मौजूदा राज्यपाल उत्तराधिकारी के पदभार ग्रहण करने तक पद पर बने रह सकते हैं, तब ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था की आवश्यकता का आधार ही समाप्त हो गया.

संविधान में राज्यपाल के पद की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा किए जाने का प्रावधान है. अनुच्छेद 155 के अनुसार राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुहरयुक्त अधिपत्र से करते हैं. इसलिए राज्यपाल की नियुक्ति की संवैधानिक प्रक्रिया और कार्यकाल पूरा होने के बाद उत्तराधिकारी के आने तक मौजूदा राज्यपाल के बने रहने की व्यवस्था अलग-अलग संवैधानिक प्रावधानों से संचालित होती है.

याचिकाकर्ता की जनहित याचिका पर भी सवाल
हाई कोर्ट ने केवल संवैधानिक प्रावधान की व्याख्या तक मामला सीमित नहीं रखा. न्यायालय ने याचिकाकर्ता द्वारा जनहित याचिकाकर्ता के रूप में अपनी वास्तविक जनहित भावना और विश्वसनीयता को पर्याप्त रूप से सामने नहीं रखने संबंधी टिप्पणी भी की. इसके बाद याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया गया.

इससे मामले में दो पहलू सामने आए. पहला, राज्यपाल के कार्यकाल की समाप्ति के बाद पद की संवैधानिक निरंतरता और दूसरा, जनहित याचिका दायर करने वाले व्यक्ति की वास्तविक जनहित भावना तथा विश्वसनीयता.

पहले ही सुरक्षित रखा जा चुका था फैसला
इस मामले की सुनवाई 15 सितंबर को पूरी हुई थी. उस समय न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की युगलपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था. याचिका में राज्यपाल के कार्यकाल और नए राज्यपाल की नियुक्ति के बीच की स्थिति को चुनौती दी गई थी, जबकि केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 156 के तहत उत्तराधिकारी के पदभार ग्रहण करने तक मौजूदा राज्यपाल के बने रहने की संवैधानिक व्यवस्था पर जोर दिया था.

अब फैसला आने के साथ हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि पांच वर्ष की अवधि पूरी होना और राज्यपाल के पद से तत्काल हट जाना संविधान की व्यवस्था नहीं है. उत्तराधिकारी के पदभार ग्रहण करने तक पद पर निरंतरता बनी रहती है.

दोनों पक्षों की ओर से अधिवक्ताओं ने रखा पक्ष
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अजय शंकर रायजादा और अभिमन्यु सिंह ने पैरवी की. केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सालिसिटर जनरल सुनील जैन, उप सालिसिटर जनरल सुयश मोहन गुरु और अधिवक्ता कुरियन जे. वर्गीस उपस्थित हुए. राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने पक्ष रखा.

हाई कोर्ट के इस फैसले से राज्यपाल के कार्यकाल की समाप्ति के बाद उत्तराधिकारी के पदभार ग्रहण करने तक की संवैधानिक स्थिति को लेकर उठाए गए प्रश्न पर न्यायालय की स्थिति स्पष्ट हो गई है. संविधान के अनुच्छेद 156(3) का परंतुक और सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व व्याख्या इस मामले में निर्णय का प्रमुख आधार रहे. 

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-