ट्रेन से गिरकर मौत मामला: माता-पिता को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का सुप्रीम कोर्ट ने दिया आदेश

ट्रेन से गिरकर मौत मामला: माता-पिता को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का सुप्रीम कोर्ट ने दिया आदेश

प्रेषित समय :18:30:50 PM / Sat, Sep 26th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. गुजरात में साल 2017 में चलती ट्रेन से गिरकर जान गंवाने वाले एक युवक के दुखी माता-पिता की पीड़ा तब और बढ़ गई, जब उन्हें यह साबित करने के लिए कड़वी कानूनी लड़ाई लडऩी पड़ी कि उनका बेटा वैध टिकट के साथ यात्रा कर रहा था. पीड़ित माता-पिता की शुक्रवार को न्याय के लिए लंबी लड़ाई खत्म हो गई, जब सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल का फैसला बहाल कर दिया, और कहा कि टिकट न होने से किसी परिवार का मुआवजे का दावा खारिज नहीं किया जा सकता.

जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस एएस चांदूरकर की पीठ ने नोट किया कि अपीलकर्ता, महेशभाई के बदकिस्मत माता-पिता हैं, जो सितंबर 2017 में अहमदाबाद के रास्ते सूरत जाते समय एक अप्रिय घटना के शिकार हो गए थे. सामान्य डिब्बे में यात्रा करते समय, जब ट्रेन साबरमती और अहमदाबाद रेलवे स्टेशनों के बीच थी, तो अचानक झटका लगने के कारण वह नीचे गिर गए थे. महेशभाई को कई गंभीर चोटें आईं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया. हालांकि, अक्टूबर 2017 में उन्होंने चोटों के कारण दम तोड़ दिया. रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल ने जून 2022 में रेलवे दावा न्यायाधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 16 के तहत माता-पिता द्वारा दायर दावा आवेदन को स्वीकार कर लिया.

ट्रिब्यूनल ने माना कि महेशभाई एक अप्रिय घटना के शिकार हुए थे और वह दुर्घटनावश गिर गए थे. अपीलकर्ता घटना की तारीख से लेकर आदेश की तारीख तक 9त्न प्रति वर्ष की दर से ब्याज के साथ 8 लाख रुपये के मुआवजे के हकदार थे. इस फैसले से असंतुष्ट होकर, भारत सरकार ने अधिनियम की धारा 23 के तहत एक अपील दायर की.

जुलाई 2025 में, गुजरात हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार की अपील स्वीकार कर ली, और कहा कि मृतक व्यक्ति के ट्रेन से गिरने के कोई सबूत नहीं हैं, इसलिए, इस घटना को रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 123(ष्)(2) के तहत अप्रिय घटना नहीं कहा जा सकता. इसके बाद पीडि़त माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.

दावेदारों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नचिकेता जोशी ने दलील दी कि हाई कोर्ट ने सिर्फ इस बात को महत्व दिया कि पीडि़त के यात्रा विवरण, जैसे कि ट्रेन का नाम, का खुलासा नहीं किया गया था. उन्होंने निवेदन किया कि चूंकि दावेदारों ने स्पष्ट रूप से यह दलील दी थी कि पीडि़त एक वैध टिकट के साथ यात्रा कर रहा था जो खो गया था, इसलिए पीडि़त को एक अनधिकृत यात्री साबित करने का बोझ रेलवे पर था.

केंद्र सरकार के वकील ने दलील दी कि किसी भी चश्मदीद गवाह से पूछताछ नहीं की गई, न ही पीडि़त के पास कोई रेलवे टिकट मिला, और पीडि़त को लगी चोट को सही रूप से खुद से लगी चोट माना गया; इसलिए, 1989 के अधिनियम की धारा 124-्र के तहत दावेदारों को कोई मुआवजा नहीं मिलना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हाई कोर्ट ने पीडि़त के पिता द्वारा शपथ पर दिए गए बयान और इस तथ्य को ध्यान में रखे बिना कि पीडि़त एक महीने से अधिक समय तक अस्पताल में भर्ती था, रेलवे टिकट न होने को बेवजह महत्व दिया.
 

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-