बजट की कमी का बहाना बनाकर ठेकेदार का बकाया नहीं रोक सकती सरकार, हाईकोर्ट ने 5 लाख रुपये ब्याज समेत देने काआदेश

बजट की कमी का बहाना बनाकर ठेकेदार का बकाया नहीं रोक सकती सरकार, हाईकोर्ट ने 5 लाख रुपये ब्याज समेत देने काआदेश

प्रेषित समय :22:09:18 PM / Wed, Sep 30th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

ग्वालियर. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी विभागों में भुगतान को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी ठेकेदार द्वारा सौंपा गया काम पूरा किए जाने और विभाग की ओर से उसकी देनदारी स्वीकार किए जाने के बाद केवल बजट उपलब्ध नहीं होने का हवाला देकर भुगतान को अनिश्चितकाल तक रोका नहीं जा सकता. कोर्ट ने राज्य सरकार को मुरैना जिले में पोंटून पुल से जुड़े कार्य के एवज में ठेकेदार की बकाया 5 लाख रुपये की राशि छह प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ चार सप्ताह के भीतर जारी करने का निर्देश दिया है.

पोंटून पुल के काम के बदले अटका था भुगतान

मामला मुरैना जिले में पोंटून पुल के संयोजन, खोलने, खड़ा करने, स्थापित करने और उसके रखरखाव से संबंधित कार्य का है. याचिकाकर्ता ठेकेदार का कहना था कि विभाग की ओर से उसे सौंपा गया कार्य उसने पूरा कर दिया था. कार्य पूरा होने के बाद सक्षम अधिकारियों ने उसके 5 लाख रुपये के भुगतान को स्वीकार भी किया, लेकिन इसके बावजूद राशि का भुगतान नहीं किया गया.

ठेकेदार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बकाया 5 लाख रुपये की राशि आठ प्रतिशत ब्याज के साथ दिलाए जाने की मांग की थी. उसका तर्क था कि जब विभाग ने काम पूरा होने और भुगतान की देनदारी को स्वीकार कर लिया है, तो राशि को लंबे समय तक रोकने का कोई उचित आधार नहीं है.

सरकार ने कहा बजट उपलब्ध नहीं
याचिका की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश सरकारी वकील ने बताया कि संबंधित अधिकारियों ने भुगतान के लिए आवश्यक राशि उपलब्ध कराने के लिए कई बार मांग भेजी है. इसके बावजूद अभी तक बजट का आवंटन नहीं हो सका है. सरकार की ओर से भुगतान में देरी के पीछे यही प्रशासनिक और वित्तीय कारण बताया गया.

रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित अधिकारियों ने 11 दिसंबर 2024 को ही आवश्यक राशि के आवंटन की मांग भेज दी थी. इसके बावजूद ठेकेदार को उसका भुगतान नहीं मिल सका. राज्य की ओर से यह भी बताया गया कि संबंधित बजट मद में राशि उपलब्ध होते ही ठेकेदार को भुगतान करने की कार्रवाई की जाएगी.

हाईकोर्ट ने बजट की दलील को पर्याप्त नहीं माना
जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि जिस व्यक्ति ने सरकार की ओर से सौंपा गया काम पूरा कर दिया है, उसे केवल इसलिए उसके वैध भुगतान से वंचित नहीं किया जा सकता कि विभाग ने उसके लिए आवश्यक बजट प्रावधान नहीं किया है.

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब सक्षम विभागीय अधिकारी किसी भुगतान की देनदारी को स्वीकार कर चुके हैं, तब बजट आवंटन की कमी को भुगतान अनिश्चितकाल तक रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता. बजट और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ी कठिनाइयां सरकार की आंतरिक व्यवस्था का हिस्सा हैं. उसका भार उस व्यक्ति पर नहीं डाला जा सकता, जिसने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है और जिसके काम का भुगतान विभाग के स्तर पर स्वीकार किया जा चुका है.

विभागीय प्रक्रिया का खामियाजा ठेकेदार क्यों भुगते
हाईकोर्ट की टिप्पणी का महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि सरकारी विभागों की आंतरिक वित्तीय प्रक्रिया और ठेकेदार की वैध भुगतान देनदारी को अलग-अलग देखा गया. कोर्ट ने माना कि यदि विभाग ने काम स्वीकार कर लिया है और भुगतान की राशि भी निर्धारित हो चुकी है, तो इसके बाद बजट की उपलब्धता का प्रश्न प्रशासनिक स्तर पर सरकार को हल करना होगा.

याचिकाकर्ता लंबे समय से अपने भुगतान की प्रतीक्षा कर रहा था. ऐसे में केवल यह कहना कि भविष्य में बजट मिलने पर भुगतान किया जाएगा, उसके बकाये को अनिश्चित अवधि तक लंबित रखने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता.

चार सप्ताह में भुगतान का निर्देश
हाईकोर्ट ने मामले में सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि ठेकेदार को बकाया 5 लाख रुपये की राशि छह प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ चार सप्ताह के भीतर जारी की जाए. कोर्ट के निर्देश के बाद भुगतान की समयसीमा भी निर्धारित हो गई है.

ठेकेदार ने आठ प्रतिशत ब्याज की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने छह प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ राशि का भुगतान करने का आदेश दिया. इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया.

सरकारी भुगतान व्यवस्था के लिए अहम संदेश
इस आदेश में हाईकोर्ट ने सीधे तौर पर यह रेखांकित किया कि सरकारी विभागों की बजट संबंधी समस्याएं किसी स्वीकार किए गए वैध भुगतान को अनिश्चितकाल तक रोकने का आधार नहीं बन सकतीं. यदि किसी व्यक्ति ने अनुबंध के तहत अपना काम पूरा कर दिया है और विभाग उसकी देनदारी स्वीकार कर चुका है, तो भुगतान की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना सरकार की जिम्मेदारी है.

मुरैना के पोंटून पुल से जुड़े इस मामले में 5 लाख रुपये का विवाद भले ही सीमित राशि का हो, लेकिन हाईकोर्ट का आदेश सरकारी ठेकों और विभागीय भुगतान से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा सकता है. खासतौर पर उन मामलों में, जहां काम पूरा होने और भुगतान स्वीकृत होने के बावजूद बजट या राशि उपलब्ध नहीं होने का हवाला देकर भुगतान लंबे समय तक लंबित रखा जाता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-