पितरों के लिए दीपक किस दिशा में जलाना शुभ माना जाता, जानिए दीपदान से जुड़े नियम

पितरों के लिए दीपक किस दिशा में जलाना शुभ माना जाता, जानिए दीपदान से जुड़े नियम

प्रेषित समय :22:07:26 PM / Fri, Oct 2nd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दीपक केवल रोशनी का साधन नहीं, बल्कि पूजा और दीपदान की परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. गरुड़ पुराण से जुड़ी मान्यताओं में पितरों के लिए दीपक जलाने की दिशा, तेल, बाती, दीपक के मुंह और उसे रखने के स्थान को लेकर कई बातें बताई गई हैं. इनमें दक्षिण दिशा को पितरों से जुड़ा माना गया है. हालांकि ये बातें धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित हैं, जिनका पालन अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में अलग तरीके से किया जाता है.

धार्मिक परंपरा में दक्षिण दिशा को पितरों और यम से संबंधित दिशा माना जाता है. इसी वजह से पितरों के निमित्त दीपदान करते समय दीपक को दक्षिण दिशा की ओर रखने की परंपरा बताई जाती है.

मान्यता के अनुसार देवताओं के लिए दीपक पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखा जाता है, जबकि पितरों के लिए दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाने का विधान माना गया है.

यहां दीपक के मुख से आशय बाती या लौ की दिशा से लिया जाता है. सामान्य गोल दीपक में लौ ऊपर की ओर उठती है, जबकि लंबे या बहुमुखी दीपक में बाती की दिशा निर्धारित की जा सकती है.

दक्षिण दिशा का धार्मिक महत्व क्या है
हिंदू धार्मिक परंपराओं में दक्षिण दिशा को यम और पितरों की दिशा माना जाता है. इसी धार्मिक मान्यता के आधार पर पितरों के लिए दक्षिणमुखी दीपदान करने की परंपरा प्रचलित है.

कई धार्मिक अनुष्ठानों में पितरों को तर्पण, श्राद्ध और दीपदान करते समय दक्षिण दिशा का विशेष ध्यान रखा जाता है. इसका उद्देश्य श्रद्धा और स्मरण के साथ पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करना माना जाता है.

पितरों के लिए किस तेल का दीपक जलाएं
दीपक में इस्तेमाल होने वाले तेल को लेकर भी धार्मिक मान्यताएं हैं. आमतौर पर देवताओं के लिए घी का दीपक शुभ माना जाता है, जबकि पितरों के निमित्त तेल का दीपक जलाने की परंपरा बताई जाती है.

सरसों के तेल को पितरों के लिए उपयोग किए जाने वाले तेलों में प्रमुख माना जाता है. विशेष रूप से अमावस्या और पितृ पक्ष के दौरान सरसों के तेल का दीपक जलाने की परंपरा कई स्थानों पर देखने को मिलती है.

तिल का तेल भी पितृ कर्म से जुड़े अनुष्ठानों में महत्वपूर्ण माना जाता है. तिल का धार्मिक महत्व श्राद्ध और तर्पण की परंपराओं में भी बताया गया है.

घी का दीपक सामान्य रूप से देव पूजा से जोड़ा जाता है. हालांकि अलग-अलग परंपराओं में पितरों के लिए घी के दीपक के संबंध में अलग विधियां बताई गई हैं.

पितरों के लिए कैसी बाती इस्तेमाल करें
धार्मिक मान्यताओं में दीपक की बाती को भी महत्व दिया गया है. देव पूजा में लाल धागे या कलावे की बाती का प्रयोग करने की परंपरा बताई जाती है.

पितरों के लिए सफेद सूती बाती का उपयोग करने की मान्यता है. कुछ परंपराओं में कुश से बनी बाती का भी उल्लेख मिलता है.

पितृ कर्म में कुश का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है. इसी कारण कई अनुष्ठानों में कुश का इस्तेमाल किया जाता है.

कितने मुंह वाला दीपक जलाना चाहिए
दीपक के मुंह की संख्या को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं हैं.

एक मुख वाला दीपक सामान्य पूजा में इस्तेमाल किया जाता है. दो मुख वाले दीपक को कई परंपराओं में दांपत्य जीवन से जोड़कर देखा जाता है.

चार मुख वाले दीपक को पितरों के निमित्त विशेष माना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार आटे से चार मुख वाला दीपक बनाकर उसमें तेल और चार बातियां लगाई जा सकती हैं. चारों बातियों को अलग-अलग दिशाओं में रखा जाता है और एक प्रमुख बाती को दक्षिण दिशा की ओर रखने की परंपरा बताई जाती है.

पांच मुख वाला दीपक पंचतत्व का प्रतीक माना जाता है और इसका उपयोग सामान्यतः देव पूजा से जोड़ा जाता है.

पितरों का दीपक कहां जलाना चाहिए
पितरों के लिए दीपक जलाने के स्थान को लेकर भी धार्मिक परंपराओं में कई मान्यताएं हैं.

पीपल के पेड़ के नीचे
पीपल के पेड़ का हिंदू धर्म में विशेष धार्मिक महत्व है. कई मान्यताओं में पीपल को पितरों से जोड़कर देखा जाता है. इसलिए अमावस्या या शनिवार के दिन पीपल के नीचे दीपक जलाने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है.

घर की दक्षिण दिशा में
घर के दक्षिण हिस्से में पितरों के निमित्त दीपक जलाने की परंपरा भी बताई जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार दीपक को साफ स्थान पर किसी पटे या ऊंचे स्थान पर रखना चाहिए.

छत की दक्षिण दिशा में
पितृ पक्ष के दौरान कुछ परिवार घर की छत की दक्षिण दिशा में भी दीपक जलाते हैं. इसे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की एक परंपरा माना जाता है.

नदी या तालाब के किनारे
जल स्रोत के किनारे दीपदान भी भारतीय धार्मिक परंपरा का हिस्सा रहा है. कई स्थानों पर लोग नदी या तालाब के किनारे पितरों के नाम से दीपक जलाते हैं.

गौशाला में
गौ सेवा और गौशाला को भी धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है. कुछ परंपराओं में गौशाला में पितरों के निमित्त दीपक जलाने का उल्लेख मिलता है.

किन स्थानों पर दीपक जलाने से बचने की मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितरों के लिए जलाए जाने वाले दीपक को घर के पूजा स्थान की सामान्य व्यवस्था से अलग उचित स्थान पर रखना चाहिए.

उत्तर-पूर्व दिशा को सामान्यतः देवताओं की दिशा माना जाता है, इसलिए पितरों के दीपक के लिए इस स्थान का उपयोग नहीं करने की परंपरा बताई जाती है.

इसी तरह बेडरूम, शौचालय के पास या जूते-चप्पल रखने वाले स्थान के नजदीक दीपक जलाने से बचने की सलाह धार्मिक परंपराओं में दी जाती है.

दीपक हमेशा साफ और सम्मानजनक स्थान पर रखने की बात कही जाती है.

दीपक जलाते समय मंत्र का महत्व
पितरों के निमित्त दीपदान करते समय श्रद्धा से मंत्र जाप करने की परंपरा है. अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में अलग मंत्रों का प्रयोग किया जाता है.

पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए दीपदान के समय पितृ स्मरण और स्वधा मंत्र का जाप किया जा सकता है. इसका उद्देश्य पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करना माना जाता है.

दीपक जलाने का समय
पितरों के लिए दीपक जलाने को लेकर शाम का समय महत्वपूर्ण माना जाता है. सूर्यास्त के बाद दीपदान करने की परंपरा कई परिवारों में है.

अमावस्या और पितृ पक्ष के दौरान पितरों के निमित्त विशेष दीपदान किया जाता है. श्राद्ध या तर्पण के समय भी दीपक जलाने की परंपरा कई स्थानों पर प्रचलित है.

हालांकि दीपक कितनी देर तक जलाना है, इसे लेकर अलग-अलग धार्मिक परंपराएं हैं. इसलिए स्थानीय परंपरा और परिवार में चली आ रही विधि के अनुसार इसका पालन किया जाता है.

दीपक की लौ को लेकर क्या मान्यताएं हैं
धार्मिक मान्यताओं में दीपक की लौ को लेकर भी कई तरह के संकेत बताए जाते हैं. स्थिर और सीधी लौ को शुभ माना जाता है.

वहीं बिना हवा के दीपक का बार-बार बुझना या लौ का असामान्य रूप से फड़फड़ाना कुछ परंपराओं में अलग-अलग संकेतों से जोड़ा जाता है.

हालांकि दीपक की लौ का व्यवहार हवा, तेल, बाती और वातावरण जैसी सामान्य भौतिक परिस्थितियों से भी प्रभावित होता है. इसलिए ऐसे संकेतों को वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.

16 दीपकों की परंपरा
पितृ पक्ष और अमावस्या के दौरान कुछ धार्मिक परंपराओं में 16 दीपक जलाने का भी उल्लेख मिलता है. इसके तहत आटे के छोटे दीपक बनाकर उनमें तेल और बाती लगाई जाती है.

इन दीपकों को पितरों के प्रति श्रद्धा और स्मरण का प्रतीक माना जाता है. कुछ मान्यताओं में इन्हें अलग-अलग पितृ शक्तियों या पूर्वजों के सम्मान से जोड़ा जाता है.

दीपदान के साथ तिल अर्पित करने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है.

दीपदान का मूल उद्देश्य श्रद्धा और स्मरण
पितरों के लिए दीपक जलाने की परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष पूर्वजों का स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना है. भारतीय धार्मिक परंपरा में श्राद्ध, तर्पण और दीपदान के माध्यम से परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करता है.

गरुड़ पुराण से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में भी पितरों, श्राद्ध और कर्मकांड का विस्तृत वर्णन मिलता है. दीपक को प्रकाश और आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में देखा जाता है.

इसलिए पितरों के निमित्त दीपक जलाते समय दिशा, स्थान और विधि से अधिक महत्वपूर्ण श्रद्धा और सम्मान की भावना को माना जा सकता है. अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में दीपदान की विधि अलग हो सकती है, इसलिए धार्मिक आस्था के अनुसार इसका पालन किया जाता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-