नई दिल्ली. साल 2026 में चिकित्सा क्षेत्र के लिए नोबेल पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों कार्ल डिशेरोथ, पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल को दिया गया है. नोबेल प्रेस वक्तव्य के अनुसार इन्हें यह सम्मान प्रकाश-नियंत्रित आयन चैनलों और ऑप्टोजेनेटिक्स पर उनकी खोजों के लिए दिया गया है.
मेडिसिन कमिटी (चिकित्सा समिति) के सचिव थॉमस पर्लमैन ने 5 अक्टूबर (सोमवार) को इस अवॉर्ड की घोषणा की. नोबेल असेंबली ने स्वीडन के स्टॉकहोम में कैरोलिंस्का इंस्टिट्यूट में इस पुरस्कार की घोषणा की. मेडिसिन (चिकित्सा) में नोबेल पुरस्कार लाइफ साइंस या मेडिसिन में बड़ी खोजों को सम्मान देता है. यह सिर्फ लंबे करियर या वैज्ञानिक नेतृत्व को पहचान देने के बजाय ऐसे काम के लिए है जिसने वैज्ञानिक समझ को बदला हो या लोगों को बड़े फ़ायदे पहुंचाए हों.
नोबेल पुरस्कार सीजन आज 5 अक्टूबर को फिजियोलॉजी या चिकित्सा में घोषणा के साथ शुरू हो रहा है. यह आठ दिनों में घोषित होने वाले छह नोबेल पुरस्कारों में से पहला है, जो उन खोजों, विचारों और योगदानों पर दुनिया का ध्यान खींचता है जिन्होंने इंसानियत के लिए बड़ा बदलाव किया है. इस पुरस्कार में एक मेडल, डिप्लोमा और नकद अवॉर्ड शामिल है. 2026 के पूरे नोबेल पुरस्कार के लिए इनाम की रकम 12 मिलियन स्वीडिश क्रोनर तय किया गया है. ये पुरस्कार आधिकारिक तौर पर दिसंबर में दिए जाएंगे.
पुरस्कार विजेताओं के बारे में जानें
कार्ल डिसेरोथ
1971 में जन्मे कार्ल डिसेरोथ स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और अमेरिका में हॉवर्ड ह्यूजेस मेडिकल इंस्टीट्यूट से जुड़े हैं. उन्होंने 1998 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी और 2000 में डॉक्टर ऑफ मेडीसिन की डिग्री ली. डिसेरोथ स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में डी एच चेन प्रोफेसर और बायोइंजीनियरिंग और साइकियाट्री और बिहेवियरल साइंसेज के प्रोफेसर हैं. चैनलरोडोप्सिन पर उनके काम ने इस खोज को रोशनी से नर्व सेल्स को कंट्रोल करने के लिए एक व्यावहारिक उपकरण में बदलने में मदद की.
उन्होंने दिखाया कि नीली रोशनी संशोधित तंत्रिका कोशिकाओं में तंत्रिका संकेतों को सक्रिय कर सकता है. उन्होंने 2005 में इस खोज को प्रकाशित किया. 2007 में उन्होंने दिखाया कि इस तकनीक का इस्तेमाल जीवित चूहों के दिमाग में किया जा सकता है, जिससे ऑप्टोजेनेटिक्स की नींव एक शक्तिशाली तंत्रिका विज्ञान अनुसंधान पद्धति के तौर पर रखी गई.
पीटर हेगमैन
1954 में जन्मे पीटर हेगमैन जर्मनी के बर्लिन की हम्बोल्ट यूनिवर्सिटी में न्यूरोसाइंस के हर्टी सीनियर प्रोफेसर हैं. उन्होंने 1984 में जर्मनी के मार्टिंसरिड में मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर बायोकेमिस्ट्री से पीचडी की. हेगमैन की दिलचस्पी इस बात में थी कि सिंगल-सेल वाले एल्गी रोशनी पर कैसे प्रतिक्रिया करते हैं, जिससे वह खोज हुई जिससे आखिरकार ऑप्टोजेनेटिक्स मुमकिन हुआ.
क्लैमाइडोमोनस पर स्टडी करते समय उन्होंने जांच की कि यह जीव रोशनी को कैसे पहचानता है और रोशनी के स्रोत की ओर कैसे बढ़ता है. जॉर्ज नेगल के साथ उनके काम से चैनलरोडोप्सिन की खोज हुई जो ऑप्टोजेनेटिक्स के सेंटर में मौजूद लाइट-सेंसिटिव प्रोटीन है. ये इनाम जीतने वाली खोजें मार्टिंसरिड में मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर बायोकेमिस्ट्री में की गई थीं.
जॉर्ज नेगल
1953 में जन्मे जॉर्ज नेगल जर्मनी की वुर्जबर्ग यूनिवर्सिटी में मॉलिक्यूलर प्लांट फिजियोलॉजी के प्रोफेसर हैं. उन्होंने 1988 में जर्मनी की फ्रैंकफर्ट यूनिवर्सिटी से पीएचडी की. उनकी रिसर्च प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन और कोशिकीय प्रक्रियाओं में उनकी भूमिका पर ध्यान था. नेगल ने पीटर हेगमैन के साथ चैनलरोडोप्सिन पर काम किया, जिससे यह पता लगाने में मदद मिली कि प्रोटीन लाइट पर कैसे प्रतिक्रिया करता है और चार्ज्ड आयन को सेल्स से कैसे गुजरने देता है. इस खोज ने बाद में वैज्ञानिकों को लाइट का इस्तेमाल करके नर्व सेल्स को कंट्रोल करने में मदद की.
ये इनाम जीतने वाली खोजें जर्मनी के फ्रैंकफर्ट में मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर बायोफिजिक्स में की गईं. हेगमैन, नेगल और डेइसरोथ के काम ने मिलकर एक सिंगल-सेल वाले एल्गा में एक खोज को एक ऐसे तरीके में बदल दिया जिसने जीवित दिमाग की शोध को बदल दिया है.
क्या है ऑप्टोजेनेटिक्स?
नोबेल पुरस्कार प्रेस वक्तव्य के मुताबिक, ऑप्टोजेनेटिक्स वैज्ञानिकों को यह शोध करने में मदद करता है कि नर्व सेल्स (तंत्रिका कोशिकाएं) जीवित दिमाग में यादों, भावनाओं और व्यवहार को कैसे आकार देते हैं. पीटर हेगमैन और जॉर्ज नेगल ने एक सिंगल-सेल वाले एल्गा में चैनलरोडोप्सिन नाम का एक खास प्रोटीन खोजा. कार्ल डिसेरोथ ने बाद में इस प्रोटीन को नर्व सेल्स के लिए लाइट-कंट्रोल्ड स्विच में बदल दिया. उनकी खोजों ने न्यूरोसाइंस (तंत्रिका विज्ञान) में एक नए युग की नींव रखी है.
दिमाग भावनाओं, व्यवहारों और शरीर के कामों को कैसे नियंत्रित करता है, यह सदियों से एक रहस्य बना हुआ है. 20वीं सदी के दौरान शोधकर्ताओं ने यह पहचानना शुरू किया कि दिमाग के कौन से हिस्से अलग-अलग कामों से जुड़े हैं. हालांकि, उस समय मौजूद तरीके कारण और प्रभाव के बीच साफ संबंध नहीं बना सके. दिमाग के बारे में जो समझ बनी, वह एक स्थूल रूपरेखा जैसी थी, जिसमें बिना जवाब वाले सवाल और अनजान बातें भरी थीं. हालांकि ऑप्टोजेनेटिक्स ने इसे बदल दिया है. फिजियोलॉजी या मेडिसिन के लिए नोबेल समिति के अध्यक्ष पेर स्वेनिंग्सन ने कहा, ऑप्टोजेनेटिक्स ब्रेन को इस तरह से मैप करने के मौके देता है, जिसके बारे में हम कभी सिर्फ सपना ही देख सकते थे.
एल्गी से लाइट-कंट्रोल्ड स्विच तक
प्रेस वक्तव्य में कहा गया कि कहानी पीटर हेगमैन की इस जिज्ञासा से शुरू हुई कि क्लैमाइडोमोनास, एक सिंगल-सेल एल्गी, लाइट सोर्स की ओर कैसे बढ़ता है. 2000 के दशक की शुरुआत में हेगमैन और जॉर्ज नेगल ने चैनलरोडोप्सिन की खोज की, जो एक एल्गल प्रोटीन है जिसमें खास गुण होते हैं और जो सेल की सतह पर पाया जाता है. नीली रोशनी के संपर्क में आने पर प्रोटीन एक चैनल खोलता है, जिससे चार्ज्ड आयन सेल में बहते हैं और एक विद्युत आवेग पैदा होता है.
शोधकर्ताओं ने पाया कि जब उन्होंने प्रोटीन को अलग-अलग तरह के सेल में डाला तो वे सेल रोशनी के प्रति संवेदनशील हो गए. इस खोज ने नर्व सेल्स को नियंत्रित करने के एक नए तरीके का रास्ता खोल दिया. कार्ल डिसेरोथ ने चूहे के नर्व सेल्स में चैनलरोडोप्सिन जीन डालकर अगला बड़ा कदम उठाया. जब उन्होंने सेल्स को नीली रोशनी से रोशन किया तो वे एक तंत्रिका को सक्रिय कर सकते थे. उन्होंने 2005 में इस खोज को प्रकाशित किया.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

