नगर प्रतिनिधि , जबलपुर। शहर में साइबर ठग लगातार तरीके बदलकर लोगों की जमा पूंजी पर हाथ साफ कर रहे हैं। ताजा मामला संगम कॉलोनी निवासी निजी शिक्षिका राखी विश्वकर्मा का है, जिनके बैंक खाते से 21 से 26 सितंबर के बीच चार बार में 31 हजार 200 रुपये ट्रांसफर हो गए और उन्हें तत्काल इसकी भनक तक नहीं लगी। मोबाइल में बैंक के चार संदेश देखने पर उन्हें रकम निकलने का पता चला, जिसके बाद कोतवाली थाने में शिकायत दर्ज कराई गई।
यह घटना पिछले तीन महीनों में जबलपुर में सामने आए साइबर अपराधों की लंबी कड़ी का नया मामला है। जुलाई से 5 अक्टूबर तक उपलब्ध प्रकाशित रिपोर्टों को जोडऩे पर कम से कम 16 रिपोर्टेड घटनाक्रम या मामलों के समूहों में लगभग 1 करोड़ 18 लाख 83 हजार रुपये की साइबर ठगी सामने आ चुकी है। इन रिपोर्टों में एक ही खबर में दो से पांच पीडि़तों के मामले भी शामिल हैं, इसलिए वास्तविक पीडि़तों की संख्या 16 से कहीं अधिक है। यह आंकड़ा पुलिस का आधिकारिक समेकित तीन-महीने का आंकड़ा नहीं, बल्कि इस अवधि में उपलब्ध प्रकाशित मामलों के आधार पर निकाला गया न्यूनतम आंकड़ा है। साइबर अपराधियों ने इस दौरान किसी को डिजिटल अरेस्ट किया, किसी को डॉक्टर की अपॉइंटमेंट के नाम पर लिंक भेजा, किसी का मोबाइल ्रक्क्य फाइल से हैक किया तो किसी को ऑनलाइन रेटिंग से कमाई का लालच दिया। कई मामलों में पीडि़त को तब पता चला, जब वह बैंक पहुंचा या मोबाइल पर ट्रांजेक्शन के संदेश देखे।
शिक्षिका को मैसेज देखने पर पता चली ठगी-
संगम कॉलोनी निवासी राखी विश्वकर्मा ने कोतवाली पुलिस को बताया कि वह निजी शिक्षिका हैं और उनका खाता पंजाब नेशनल बैंक की फुहारा चौक शाखा में है। वह गूगल पे यूपीआई का उपयोग करती हैं। शिकायत के अनुसार 21 सितंबर से 26 सितंबर के बीच उनके खाते से चार बार में कुल 31,200 रुपये धोखाधड़ी से ट्रांसफर किए गए। शिक्षिका को लेनदेन के समय इसका पता नहीं चला। बाद में मोबाइल का मैसेज बॉक्स देखने पर खाते से रकम कटने के चार संदेश मिले। इसके बाद उन्होंने पुलिस में शिकायत की। अब जांच में यह पता लगाया जाना है कि रकम किन खातों में गई और खाते तक साइबर ठगों की पहुंच कैसे बनी।
डॉक्टर का नंबर तलाशा और तीन दिन में 2.75 लाख गायब-
अक्टूबर की शुरुआत में डॉक्टर का नंबर ऑनलाइन तलाशना एक व्यक्ति को महंगा पड़ा। मां का उपचार कराने के लिए डॉक्टर का मोबाइल नंबर खोज रहे व्यक्ति ने इंटरनेट पर मिले नंबर पर संपर्क किया। सामने वाले ने स्वयं को डॉक्टर का रिसेप्शनिस्ट बताकर ऑनलाइन बुकिंग के नाम पर लिंक भेजा। पांच रुपये की मामूली राशि जमा कराने के बाद अन्य लिंक भेजे गए और तीन दिनों में खाते से करीब 2.75 लाख रुपये निकल गए। इसी दौरान एक अन्य मामले में ऐसी महिला के खाते से 1.77 लाख रुपये निकल गए, जो यूपीआई का इस्तेमाल ही नहीं करती थी। एक अन्य व्यक्ति को बैंक पहुंचने पर पता चला कि उसके खाते से 52 हजार रुपये गायब हैं।
ई चालान के लिंक ने लगाई 2.34 लाख की चपत-
सितंबर के अंतिम सप्ताह में रांझी क्षेत्र की महिला के मोबाइल पर परिवहन विभाग के ई-चालान के नाम से संदेश आया। दो हजार रुपये के कथित चालान के साथ एक लिंक भेजा गया था। लिंक खोलने के बाद मोबाइल हैक होने की बात सामने आई और बाद में खाते से अलग-अलग ट्रांजेक्शन में 2.34 लाख रुपये निकल गए। इस तरह साइबर अपराधियों ने सरकारी विभाग के नाम और चालान के डर को ठगी का हथियार बनाया।
सितंबर में पांच लोगों से 4.60 लाख की ठगी-
22 सितंबर को सामने आए मामलों में साइबर अपराधियों ने दोस्त, बेटा और एजेंट बनकर पांच लोगों को निशाना बनाया। अलग-अलग मामलों में कुल 4 लाख 60 हजार 150 रुपये की ठगी सामने आई। किसी से सोशल मीडिया पर दोस्त बनकर रुपये मांगे गए तो किसी को विदेश में फंसे रिश्तेदार की कहानी सुनाई गई। इससे स्पष्ट हुआ कि साइबर अपराधी तकनीकी तरीकों के साथ भावनात्मक दबाव का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।
पेंशनर कार्ड और यूपीआई के नाम पर 4.46 लाख पार-
21 सितंबर को जबलपुर में तीन अलग-अलग साइबर ठगी के मामलों में कुल 4 लाख 46 हजार 249 रुपये की धोखाधड़ी सामने आई। इनमें पेंशनर कार्ड, ऑनलाइन नौकरी और यूपीआई के नाम पर लोगों को निशाना बनाया गया। एक महिला के खाते से 35,249 रुपये यूपीआई के माध्यम से अलग-अलग खातों में ट्रांसफर मिले, जबकि उसका कहना था कि उसने उस दौरान कोई ऑनलाइन लेनदेन नहीं किया था। इस तरह के मामले शिक्षिका के ताजा प्रकरण से मिलते-जुलते हैं, जहां पीडि़त को रकम निकलने की जानकारी बाद में हुई।
तीन मामलों में 2.14 लाख रुपये निकाले-
20 सितंबर को विजय नगर, घमापुर और ओमती थाना क्षेत्रों से तीन अलग-अलग साइबर अपराध सामने आए। इनमें कुल करीब 2.14 लाख रुपये की ठगी की गई। एक मामले में अस्पताल कर्मचारी का सोशल मीडिया अकाउंट हैक करके उसके परिचितों को लिंक भेजा गया और दो खातों से करीब 1.10 लाख रुपये निकाल लिए गए। दूसरे मामलों में भी ऑनलाइन माध्यम और मोबाइल एक्सेस का इस्तेमाल कर रकम ट्रांसफर की गई।
क्रेडिट कार्ड के जरिए करीब 1.93 लाख की ठगी-
18 सितंबर को सामने आए दो मामलों में एक अधिकारी और दुकानदार साइबर ठगों का शिकार बने। एक महिला अधिकारी का मोबाइल हैक होने के बाद क्रेडिट कार्ड से 1 लाख 53 हजार 280 रुपये ट्रांसफर हुए। दूसरे मामले में मोबाइल पर आई ्रक्क्य फाइल खोलने के बाद फोन हैंग हो गया और क्रेडिट कार्ड से 39,346 रुपये की खरीदारी हो गई। दोनों मामलों को मिलाकर करीब 1.93 लाख रुपये की ठगी सामने आई।
डॉक्टर का नंबर खोजने पर 16.40 लाख की बड़ी ठगी-
15 सितंबर को सामने आए एक बड़े मामले में सेवानिवृत्त कर्मचारी ने चर्म रोग के इलाज के लिए इंटरनेट पर डॉक्टर का मोबाइल नंबर तलाशा था। इसी दौरान वह साइबर अपराधियों के संपर्क में आ गया। डॉक्टर की अपॉइंटमेंट के नाम पर पहले 10 रुपये की टोकन राशि जमा कराने को कहा गया। इसके बाद खाते से कुल 16.40 लाख रुपये निकलने का मामला सामने आया। यह पिछले तीन महीनों में रिपोर्ट हुए बड़े व्यक्तिगत साइबर फ्रॉड मामलों में शामिल रहा।
शिक्षक, इंजीनियर और एलआईसी कर्मचारी से 5.25 लाख-
14 सितंबर को शहर में सामने आए तीन अलग-अलग मामलों में शिक्षक, इंजीनियर और सेवानिवृत्त एलआईसी कर्मचारी साइबर ठगों के निशाने पर आए। तीनों मामलों में कुल 5.25 लाख रुपये की ठगी रिपोर्ट हुई। इसी अवधि में मोबाइल हैकिंग, संदिग्ध ओटीपी और अनजान संदेश के जरिए खाते तक पहुंच बनाने के मामले भी सामने आए। 8 सितंबर को रिपोर्ट हुए एक अन्य घटनाक्रम में सफर के दौरान महिला के 79 हजार रुपये निकलने और एक युवक का मोबाइल हैक होने का मामला सामने आया।
ऑनलाइन रेटिंग के जाल में 37 लाख गंवाए-
अगस्त में सामने आया ऑनलाइन रेटिंग से जुड़ा मामला तीन महीने के दौरान रिपोर्ट हुई बड़ी साइबर ठगी में शामिल है। ऑनलाइन काम और रेटिंग के बदले कमाई का झांसा देकर पहले छोटी रकम पर लाभ दिखाया गया। भरोसा बनने के बाद पीडि़त से अलग-अलग खातों में लगातार रकम जमा कराई गई। मामला बढ़ते-बढ़ते करीब 37 लाख रुपये तक पहुंच गया। साइबर ठगों ने पहले मुनाफा दिखाकर विश्वास हासिल किया और फिर बड़ी रकम ट्रांसफर कराई।
वृद्ध दंपती को डिजिटल अरेस्ट कर 22 लाख ठगे-
12 अगस्त को जबलपुर में डिजिटल अरेस्ट का गंभीर मामला सामने आया था। साइबर अपराधियों ने खुद को सीबीआई अधिकारी बताकर वृद्ध दंपती को मनी लॉन्ड्रिंग और ड्रग्स केस में फंसने का डर दिखाया। दंपती को कई दिनों तक दबाव में रखा गया और करीब 22 लाख रुपये ठग लिए गए। यह मामला बताता है कि साइबर अपराध केवल तकनीकी सेंध तक सीमित नहीं है। अपराधी डर और कानून का भय दिखाकर भी पीडि़त से स्वयं रकम ट्रांसफर करा रहे हैं।
सीनियर सिटीजन कार्ड के नाम पर पौने पांच लाख की ठगी-
अगस्त में ही सीनियर सिटीजन कार्ड बनाने का झांसा देकर एक व्यक्ति के मोबाइल तक पहुंच बनाई गई और ओटीपी के जरिए करीब 4.75 लाख रुपये निकाल लिए गए। इसी तरह के मामलों में ठग बैंक, सरकारी कार्यालय या सेवा प्रदाता का प्रतिनिधि बनकर संपर्क करते हैं। भरोसा कायम होने के बाद लिंक, ह्रञ्जक्क या मोबाइल एक्सेस हासिल कर खाते में सेंध लगाई जाती है।
जुलाई में भी लगातार सामने आए मामले-
13 जुलाई को रील, लिंक और फर्जी संदेश से जुड़े तीन साइबर अपराधों में कुल 7.56 लाख रुपये की ठगी रिपोर्ट हुई थी। इनमें सोशल मीडिया और संदिग्ध एप के माध्यम से मोबाइल तक पहुंच बनाने की बात सामने आई। 22 जुलाई को डॉक्टर की अपॉइंटमेंट के नाम पर एमपीके फाइल भेजकर महिला के मोबाइल को हैक करने और करीब 51,699 रुपये निकालने का मामला सामने आया। इससे पहले जुलाई की शुरुआत में मोबाइल हैकिंग और फर्जी बैंक कॉल के जरिए दो लोगों से कुल करीब 3.73 लाख रुपये की साइबर ठगी रिपोर्ट हुई थी।
कम से कम 1.19 करोड़ की ठगी का हिसाब-
उपलब्ध प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर जुलाई से 5 अक्टूबर के बीच जिन मामलों की राशि स्पष्ट रूप से उपलब्ध है, उन्हें जोडऩे पर आंकड़ा करीब 1 करोड़ 18 लाख 83 हजार रुपये तक पहुंचता है। इसमें शिक्षिका के 31,200 रुपये के ताजा मामले को भी शामिल किया गया है। यह आंकड़ा जबलपुर पुलिस के सभी थानों और साइबर सेल में दर्ज प्रत्येक शिकायत का आधिकारिक कुल नहीं है। ऐसे कई मामले हो सकते हैं जो प्रकाशित नहीं हुए या जिनकी राशि उपलब्ध रिपोर्ट में स्पष्ट नहीं है। इसलिए इसे पिछले तीन महीनों में मीडिया रिपोर्टों से सत्यापित न्यूनतम राशि के रूप में देखा जाना चाहिए।
एक ही पैटर्न नहीं लगातार तरीके बदल रहे साइबर ठग-
तीन महीने के घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ठगी का कोई एक निश्चित तरीका नहीं रहा। ऑनलाइन रेटिंग में 37 लाख रुपये की ठगी हुई तो डिजिटल अरेस्ट में 22 लाख और डॉक्टर का नंबर खोजने के दौरान एक सेवानिवृत्त कर्मचारी ने 16.40 लाख रुपये गंवाए। दूसरी ओर कई मामलों में कुछ हजार रुपये से लेकर दो-तीन लाख रुपये तक खाते से निकाले गए। ताजा शिक्षिका प्रकरण ने फिर यह सवाल खड़ा किया है कि बैंक खाते से होने वाले अनधिकृत ट्रांजेक्शन का खाताधारक को तत्काल पता क्यों नहीं चल पा रहा। पुलिस जांच में यह स्पष्ट होगा कि उनके खाते से 31,200 रुपये निकालने के लिए किस तकनीक या बैंकिंग माध्यम का इस्तेमाल किया गया। पिछले तीन महीनों में सामने आए मामलों का सिलसिला संकेत दे रहा है कि साइबर ठग अब फर्जी कॉल और ह्रञ्जक्क तक सीमित नहीं हैं। ्रक्क्य फाइल, मोबाइल रिमोट एक्सेस, फर्जी ई-चालान, डॉक्टर की अपॉइंटमेंट, ऑनलाइन नौकरी, पेंशनर कार्ड, डिजिटल अरेस्ट और ऑनलाइन कमाई जैसे अलग-अलग तरीकों से लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। ऐसे में बैंक खाते और मोबाइल पर होने वाले प्रत्येक अनजान लेनदेन की तत्काल जांच और संदिग्ध लिंक या फाइल से दूरी ही सबसे जरूरी सावधानी बन गई है।इन प्रमुख आंकड़ों में जुलाई के 7.56 लाख और 3.73 लाख, अगस्त के 37 लाख, 22 लाख और 4.75 लाख तथा सितंबर के 16.40 लाख, 5.25 लाख, 4.60 लाख, 4.46 लाख, 2.34 लाख और अन्य रिपोर्टेड मामले शामिल हैं।




