पुस्तक समीक्षा: अमलतास से गुलमोहर तक : प्रकृति, स्मृति और संबंधों का कथालोक

पुस्तक समीक्षा: अमलतास से गुलमोहर तक : प्रकृति, स्मृति और संबंधों का कथालोक

प्रेषित समय :19:28:14 PM / Mon, Oct 12th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

पुस्तक का नाम: अमलतास से गुलमोहर तक 

विधा: कहानी 

लेखिका: डॉ अपर्णा प्रधान 

समीक्षक: राजेश कुमार सिन्हा 

प्रकाशक: काव्य कुमुद पब्लिशिंग मीडिया 

समकालीन हिंदी कहानी के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती शायद यह नहीं है कि वह क्या कहे, बल्कि यह है कि वह मनुष्य के भीतर बची हुई संवेदना को किस तरह बचाए। जीवन की गति तेज हुई है, रिश्तों की संरचना बदली है और शहरों ने मनुष्य को सुविधाएं तो दी हैं, लेकिन उसके भीतर का अकेलापन भी बढ़ाया है। ऐसे समय में डॉ. अपर्णा प्रधान का कहानी-संग्रह ‘अमलतास से गुलमोहर तक’ किसी बड़े घोषणापत्र के साथ पाठक के सामने नहीं आता। वह धीरे-धीरे अपनी ओर खींचता है यथा फूलों की गंध, पेड़ों की छांव, बीती हुई स्मृतियों, रिश्तों की ऊष्मा और जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों के सहारे।इन कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि लेखिका ने कथा के लिए असाधारण घटनाओं की अपेक्षा उन साधारण क्षणों को चुना है, जिनमें मनुष्य अनायास ही अपने भीतर उतर जाता है। कोई पुराना पेड़, किसी मौसम की वापसी, किसी फूल की गंध, कोई भूला हुआ नाम या किसी रिश्ते की अचानक याद ये छोटी-सी चीजें यहां कथा के सूत्र बन जाती हैं। यही इस संग्रह की विशिष्टता भी है और इसकी मूल संवेदनात्मक भूमि भी। संग्रह की कहानियों में प्रकृति केवल वातावरण रचने का साधन नहीं है।

अमलतास, गुलमोहर, हरसिंगार, पलाश, मधुमालती और रजनीगंधा यहां सजावटी तत्व नहीं हैं। वे पात्रों की मनःस्थितियों के समानांतर चलते हैं। कभी वे स्मृतियों को जगाते हैं, कभी किसी अनुपस्थित व्यक्ति की याद दिलाते हैं, कभी अकेलेपन में मौन साथी बनते हैं और कभी जीवन के ऐसे अर्थ खोलते हैं जिन्हें सीधे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं होता। इस संग्रह की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि प्रकृति और स्मृति के बीच एक गहरा रिश्ता निर्मित किया गया है। कुछ पेड़ केवल धरती पर नहीं, मनुष्य की स्मृतियों में भी जड़ें जमा लेते हैं। इसलिए कोई वृक्ष अपने अस्तित्व से आगे बढ़कर व्यक्ति के निजी इतिहास का हिस्सा बन जाता है। इसी संदर्भ में संग्रह का शीर्षक ‘अमलतास से गुलमोहर तक’ सही मामले में अर्थपूर्ण है। अमलतास और गुलमोहर दोनों अपने-अपने रंगों में प्रकृति को समृद्ध करते हैं, लेकिन दोनों की दृश्यात्मक और भावात्मक प्रकृति अलग है। अमलतास में  शांति और ठहराव का आभास है, जबकि गुलमोहर की लालिमा में आवेग और जीवन की तीव्रता है। इनके बीच की यात्रा को मनुष्य के जीवन की यात्रा के रूपक की तरह पढ़ा जा सकता है अर्थात ठहराव से आवेग तक, स्मृति से वर्तमान तक और पीड़ा से जिजीविषा तक। मेरी निजी राय में इस अर्थ में यह शीर्षक केवल प्रकृति का बिंब नहीं, बल्कि पूरे संग्रह का सौंदर्यशास्त्रीय संकेत बन जाता है।

संग्रह की पहली कहानी ‘हथेलियों से झरता अक्टूबर’ इसी संवेदना को प्रभावी ढंग से सामने लाती है। तीस वर्षों बाद मीनल और क्षितिज का मिलना केवल दो पुराने प्रेमियों का पुनर्मिलन नहीं है। इसके पीछे सामाजिक रूढ़ियों और दहेज जैसी व्यवस्था की वह कठोर वास्तविकता भी है जिसने कभी उनके रास्ते अलग कर दिए थे। समय ने दोनों को बदल दिया है, लेकिन स्मृति ने उस प्रेम को पूरी तरह समाप्त नहीं होने दिया। कहानी का उल्लेखनीय पक्ष यह है कि यहां प्रेम अपनी युवावस्था की उत्तेजना से निकलकर एक शांत और परिपक्व संवेदना में बदलता दिखाई देता है। कहते हैं कि जीवन के उत्तरार्ध में प्रेम का अर्थ बदल जाता है यानी वहां अधिकार से अधिक आत्मीयता, आकर्षण से अधिक साथ और भविष्य की योजनाओं से अधिक साझा स्मृतियों का महत्व हो सकता है।हरसिंगार के फूलों का बिंब इस भाव को और गहरा करता है। फूल खिलते हैं, झरते हैं और फिर भी अपनी सुगंध छोड़ जाते हैं। मनुष्य और स्मृति का संबंध भी कुछ ऐसा ही है व्यक्ति दूर हो सकता है, संबंध समाप्त हो सकता है, लेकिन उसकी गंध स्मृति में बनी रह सकती है। यही कारण है कि इस संग्रह में स्मृति केवल अतीत की ओर देखने का माध्यम नहीं है; वह वर्तमान को समझने और वर्तमान में अर्थ खोजने का माध्यम भी बनती है। संग्रह की अगली कहानी 

‘अमलतास फिर न मुस्कुराया’ में प्रकृति और स्मृति का संबंध और अधिक निजी हो जाता है। अमलतास का वृक्ष समय का साक्षी है। परिस्थितियां बदलती हैं, लोग बदलते हैं और जीवन आगे बढ़ जाता है, लेकिन स्मृति अपने भीतर कुछ दृश्यों को उसी तरह सुरक्षित रखती है। सुरभि के लिए अमलतास किसी पेड़ का नाम भर नहीं रह जाता। वह उसके निजी अतीत का हिस्सा बन जाता है। यहां प्रकृति का मानवीकरण करने की बजाय मानवीय स्मृति को प्रकृति के रूप में देखे जाने का एहसास होता है। यानी मनुष्य अपनी स्मृतियों को प्रकृति के भीतर सुरक्षित कर देता है। इस बिंदु पर लेखिका की कथा-दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। उनके यहां पेड़-पौधे मनुष्य से अलग किसी बाहरी संसार का हिस्सा नहीं हैं बल्कि वे जीवन के सहभागी हैं। वे बोलते नहीं, फिर भी उनकी अपनी आवाज है और वह आवाज स्मृति की है। संग्रह की अगली कहानी 

‘दरारों में उगी धूप’ का शीर्षक ही उसके केंद्रीय रूपक को खोल देता है। रिश्तों में दरारें जीवन की अपरिहार्य सच्चाई हैं, लेकिन हर दरार अंत का संकेत नहीं होती। कभी-कभी वही दरार किसी नए प्रकाश का रास्ता भी बन जाती है। मलिका और शालीन के माध्यम से कहानी विवाह, सामाजिक अपेक्षाओं और व्यक्तिगत निर्णयों के प्रश्नों से टकराती है। लेखिका यह स्पष्ट करती हैं कि संबंध केवल प्रेम के आधार पर टिके नहीं रहते। संवाद, विश्वास, धैर्य और आत्मस्वीकृति भी उतने ही आवश्यक हैं।

इस कहानी का स्त्री-पक्ष विशेष रूप से उल्लेखनीय है। स्त्री यहां केवल परिस्थितियों की शिकार नहीं है। उसके भीतर प्रश्न हैं, असमंजस है और अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने की आकांक्षा भी। संग्रह की स्त्रियां भावुक हैं, लेकिन निष्क्रिय नहीं। वे प्रेम करती हैं, प्रतीक्षा करती हैं, टूटती हैं, प्रश्न करती हैं और अपने जीवन के अर्थ तलाशती हैं। डॉ. प्रधान की स्त्री-दृष्टि की सार्थकता इसी में है कि वे स्त्री को केवल त्याग और सहनशीलता के पारंपरिक फ्रेम में नहीं रखतीं, बल्कि उसे अपनी इच्छा, असहमति और आत्मसम्मान के साथ देखने का प्रयास करती हैं। अगली कहानी ‘धूप से महक तक’ दांपत्य संबंधों के भीतर विश्वास और संशय की महीन रेखा को पकड़ती है। अमलतास और मधुमालती का संबंध पति-पत्नी के सहजीवी रिश्ते का रूपक बन जाता है। वृक्ष और बेल की परस्पर निर्भरता में लेखिका जीवन-साझेदारी की संभावना देखती हैं। लेकिन किसी संबंध में अतीत का कोई नाम या स्मृति अचानक लौट आए तो वर्षों से निर्मित विश्वास भी विचलित हो सकता है। कहानी का मनोवैज्ञानिक पक्ष इसी बिंदु पर प्रभावशाली बनता है।

प्रेम में समस्या हमेशा किसी तीसरे व्यक्ति की उपस्थिति से पैदा नहीं होती। कई बार उसकी केवल स्मृति ही वर्तमान में असुरक्षा पैदा करने के लिए पर्याप्त होती है। इस सूक्ष्म मनोविज्ञान को लेखिका सहज भाषा में सामने लाती हैं। यह कहानी इस अर्थ में भी महत्त्वपूर्ण है कि वह दांपत्य को केवल प्रेम और विश्वास की सुंदर तस्वीर के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसमें मौजूद भय, संशय और असुरक्षा को भी स्वीकार करती है। ‘हरसिंगार की स्मृतियां’ संग्रह की सबसे आत्मीय कहानियों में है। हरसिंगार का फूल इस संग्रह के व्यापक स्मृति-बिंब को जैसे मूर्त रूप देता है। रात में खिलना, सुबह धरती पर बिखर जाना और फिर भी अपनी सुगंध बनाए रखना यह पूरा स्वभाव क्षणभंगुरता और स्मृति के बीच संबंध का सुंदर रूपक बन जाता है। जीवन में हर संबंध स्थायी नहीं होता, लेकिन हर संबंध का प्रभाव भी समाप्त नहीं होता। कुछ लोग हमारे साथ नहीं रहते, फिर भी हमारी स्मृतियों में अपना घर बनाए रखते हैं। ‘अमलतास से गुलमोहर तक’ इस संग्रह की शीर्षक कहानी है जो पूरे संग्रह के सौंदर्यशास्त्र को व्यापक रूप में सामने लाती है। लखनऊ विश्वविद्यालय की सड़क और उसके दोनों ओर खिले अमलतास तथा गुलमोहर कथा के लिए केवल विजुअल पृष्ठभूमि नहीं हैं बल्कि वे कथा की भावभूमि निर्मित करते हैं। पल्लवी की दृष्टि से देखे गए ये वृक्ष प्रकृति और मनुष्य के बीच संवाद की संभावना को रेखांकित करते हैं। दरअसल 

अमलतास और गुलमोहर को दो जीवन-स्वरों की तरह भी पढ़ा जा सकता है ,एक में ठहराव और आत्मीयता, दूसरे में उष्णता और आवेग और जीवन भी इन्हीं दोनों के बीच चलता है। कहीं हमें ठहरना होता है, कहीं पूरी तीव्रता से वर्तमान को जीना। कहीं स्मृतियों को संभालना होता है और कहीं उनसे आगे बढ़ना। अगली कहानी 'पलाश, तुम बड़ा रिझाते हो’ में वृद्धावस्था और अकेलेपन को एक अलग दृष्टि से देखा गया है। मधु का अकेलापन केवल करुणा का विषय नहीं है। उसमें आत्मनिर्भरता और अपनी तरह से जीवन जीने की इच्छा भी है। भारतीय समाज में वृद्ध स्त्री की पहचान प्रायः परिवार और आश्रय के संदर्भ में तय की जाती रही है। यह कहानी उस धारणा पर प्रश्न उठाती है। उम्र बढ़ना जीवन के रंगों के  समाप्त होने का पर्याय नहीं है। प्रेम, सौंदर्य, प्रकृति, आत्मसम्मान और जीवन की आकांक्षा उम्र के साथ समाप्त नहीं होते।पलाश का दहकता रंग कथा की नायिका मधु के भीतर बचे हुए जीवन-रंग का प्रतीक बन जाता है। इस कहानी की सार्थकता इसी में है कि वह वृद्धावस्था को केवल क्षय और प्रतीक्षा की अवस्था नहीं मानती। यहां उम्र के साथ जीवन की संभावनाएं समाप्त नहीं होतीं, बल्कि उनका अर्थ बदलता है। अगली कहानी 'गुलमोहर के उस पार’ में प्रकृति जीवन और मृत्यु के बीच खड़ी दिखाई देती है। अस्पताल के कमरे में सीमित मंजरी के लिए बाहर का गुलमोहर उस दुनिया का संकेत है जिससे वह अभी पूरी तरह अलग नहीं हुई है। दुर्घटना जीवन को अचानक बदल देती है, लेकिन गुलमोहर उसे यह एहसास कराता है कि जीवन अभी शेष है। यहां गुलमोहर केवल आशा का प्रतीक नहीं, बल्कि जिजीविषा का प्रतीक बनता है। कहानी यह नहीं कहती कि दुख समाप्त हो जाएगा। वह केवल यह संभावना बचाए रखती है कि दुख के बावजूद जीवन संभव है। इस संग्रह की अगली कहानी 

‘रिश्तों की इकहरी दहलीज’ संग्रह को व्यापक सामाजिक संदर्भ प्रदान करती है। प्रिया और जावेद का संबंध केवल दो व्यक्तियों का प्रेम नहीं रह जाता; वह परिवार, धर्म, सामाजिक परंपरा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच तनाव का प्रतिनिधि बन जाता है। कहानी की शक्ति इस बात में है कि वह समस्या को केवल ‘प्रेम बनाम समाज’ के सरल द्वंद्व में सीमित नहीं करती। परिवार की आशंकाएं भी उपस्थित हैं और व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा भी। इस तरह पाठक को कोई आसान निष्कर्ष नहीं दिया जाता, बल्कि उसे दुविधा के भीतर खड़ा किया जाता है। यही किसी कहानी की आलोचनात्मक शक्ति है वह पाठक को उत्तर देने की बजाय प्रश्न के साथ छोड़ दे।

अंतिम कहानी ‘रजनीगंधा फिर महक उठा’ संग्रह के मूल विश्वास को पुनः स्थापित करती है। जीवन में सुख आता है और फिर अचानक कोई दुर्घटना सब कुछ बदल देती है। लेकिन कहानी वहीं समाप्त नहीं होती जहां दुख शुरू होता है। रजनीगंधा की सुगंध का लौटना किसी चमत्कार का प्रतीक नहीं, बल्कि मनुष्य की उस अदम्य क्षमता का प्रतीक है जिसके सहारे वह शोक के बाद फिर जीवन की ओर देख पाता है। इस दृष्टि से यह कहानी पूरे संग्रह की भावात्मक परिणति बन जाती है। शुरुआत में स्मृतियों की ओर लौटता मन अंत में जीवन की ओर लौटता है। डा अपर्णा प्रधान के इस संग्रह को पढ़ने के बाद यह स्पष्ट होता है कि ‘अमलतास से गुलमोहर तक’ केवल प्रेम और प्रकृति की कहानियों का संग्रह नहीं है। यह मनुष्य के भीतर बदलते मौसमों का कहानी-संग्रह है। यहां प्रेम है, लेकिन उसके साथ बिछोह भी है। स्मृति है, लेकिन उसके भीतर पीड़ा भी है। रिश्ते हैं, तो उनमें दरारें भी हैं। अकेलापन है, लेकिन उसके भीतर आत्मनिर्भरता की संभावना भी है। मृत्यु और दुर्घटना की छाया है, लेकिन उसके पार जीवन की जिद भी है।इस संग्रह की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि यह है कि यह प्रकृति को सजावटी तत्व से उठाकर कथा का सक्रिय संवेदनात्मक पक्ष बना देता है। अमलतास स्मृति बन जाता है, हरसिंगार क्षणभंगुरता और सुगंध का प्रतीक, गुलमोहर जिजीविषा का, पलाश जीवन के रंग का और रजनीगंधा पुनः लौटती हुई आशा का। लेकिन इन फूलों और पेड़ों के बीच आखिरकार मनुष्य ही इस संग्रह का वास्तविक केंद्र है जो अपने प्रेम, अकेलेपन, असुरक्षा, स्मृतियों, टूटनों और उम्मीदों के साथ जिंदा रहता है। अगर शिल्प की दृष्टि से देखा जाए तो डॉ. अपर्णा प्रधान की प्रमुख शक्ति उनकी चित्रात्मक और काव्यात्मक भाषा है। वे दृश्य रचने में सक्षम हैं। फूलों का रंग, मौसम की आहट, पेड़ों की छाया और स्मृतियों की गंध को वे इस तरह कथा में पिरोती हैं कि पाठक कई बार कहानी को पढ़ने के बजाय उसे दृश्य की तरह अनुभव करने लगता है। यह गुण उनकी कहानियों को एक अलग सौंदर्य देता है।

लेकिन यही विशेषता कुछ जगह सीमा भी बनती है। भावों का विस्तार कहीं-कहीं कथा की गति को धीमा करता है। कुछ प्रसंगों में पात्र अपने मन की बात सीधे कह देते हैं, जबकि वहां संकेत, मौन या अनकहा अधिक प्रभावी हो सकता था। आधुनिक कहानी की एक बड़ी शक्ति उस बात में होती है जिसे लेखक नहीं कहता, लेकिन पाठक महसूस कर लेता है। डॉ. प्रधान की कहानियों में यदि कुछ स्थानों पर इस ‘अनकहे’ को और अधिक जगह मिलती, तो उनकी मनोवैज्ञानिक गहराई और बढ़ सकती थी।

इसी तरह संग्रह का भावात्मक आशावाद भी आलोचनात्मक दृष्टि से विचारणीय है। संकट, बिछोह और टूटन के बावजूद कहानियां बार-बार प्रेम, संवाद और पुनर्मिलन की संभावना की ओर लौटती हैं। इसे कोई पाठक आदर्शवादी प्रवृत्ति मान सकता है, लेकिन मुझे लगता है कि इसे लेखिका की रचनात्मक आस्था के रूप में भी देखा जा सकता है। यही आस्था अंततः संग्रह को उसकी विशिष्ट पहचान देती है। यहाँ एक और प्रश्न  उठता है कि क्या कहीं-कहीं प्रकृति के सुंदर प्रतीक कथा के वास्तविक सामाजिक तनाव पर हावी तो नहीं हो जाते? पर यह प्रश्न संग्रह को कमतर नहीं करता, बल्कि उसकी रचना-प्रक्रिया को समझने का अवसर देता है। प्रकृति जहां इन कहानियों को सौंदर्य और गहराई देती है, वहीं कुछ प्रसंगों में वही सौंदर्य कथा के संघर्ष को थोड़ा नर्म भी कर देता है। फिर भी यह लेखिका की सचेत रचनात्मक पसंद प्रतीत होती है कि वे जीवन के अंधेरे में भी रोशनी की संभावना को तलाशती हैं 

और शायद यही इस संग्रह का सबसे सुंदर पक्ष है। लेखिका जीवन की टूटन को छिपाती नहीं हैं, लेकिन उन्हें अंतिम सत्य भी नहीं मानतीं। हरसिंगार झरता है, फिर भी महकता है। अमलतास कभी न मुस्कुराए, फिर भी उसकी स्मृति बनी रहती है। दरारों में धूप उग सकती है। गुलमोहर विपत्ति के बीच भी खिल सकता है। पलाश अकेलेपन में भी रंग भर सकता है और रजनीगंधा सब कुछ बीत जाने के बाद भी फिर महक सकती है। दरअसल 'अमलतास से गुलमोहर तक’ की वास्तविक यात्रा इसी विश्वास की यात्रा है कि मनुष्य के भीतर संवेदना जब तक जीवित है, तब तक कोई मौसम पूरी तरह समाप्त नहीं होता। यह संग्रह पाठक को कोई भारी निष्कर्ष थमाकर विदा नहीं करता। वह उसके भीतर एक गंध छोड़ देता है कभी हरसिंगार की, कभी अमलतास की, कभी गुलमोहर की और कभी रजनीगंधा की। इस संग्रह को बंद करने के बाद यदि पाठक अपने आसपास खड़े किसी पेड़ को कुछ क्षण अधिक देर तक देखने लगे, किसी पुराने रिश्ते को नए अर्थ में याद करने लगे या अपनी किसी भूली हुई स्मृति की ओर लौट जाए, तो समझना चाहिए कि कहानी ने अपना काम कर दिया है।इसी अर्थ में ‘अमलतास से गुलमोहर तक’ डॉ. अपर्णा प्रधान की संवेदनशील कथा-दृष्टि का परिचय भर नहीं, बल्कि उन मानवीय स्मृतियों का साहित्यिक दस्तावेज भी है जिन्हें समय मिटा नहीं पाता। इसकी कहानियां हमें यह भरोसा दिलाती हैं कि जीवन चाहे जितनी बार अपने रंग बदले, मनुष्य के भीतर बची हुई संवेदना उसे फिर किसी न किसी मौसम, किसी फूल, किसी स्मृति और किसी रिश्ते की ओर लौटा सकती है। और शायद साहित्य का सबसे बड़ा काम भी यही है ,हमें हमारे भीतर बचे हुए मनुष्य से फिर मिलाना। मुझे पूरा विश्वास है कि इस संग्रह का कथा जगत में भरपूर स्वागत होगा और इस पर गंभीर चर्चा भी होगी।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-