नई दिल्ली. भारत में कमजोर मानसून के बाद अब रबी की फसलों और आगामी सर्दियों को लेकर चिंता बढ़ गई है. जून से सितंबर 2026 के बीच देश में सामान्य से 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई. क्लाइमेट ट्रेंड्स की 16 अक्टूबर को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दस वर्षों में यह सबसे कमजोर मानसून रहा. अब प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा अल नीनो तापमान बढ़ने और बारिश की कमी को और गंभीर बना सकता है. इसका असर मिट्टी की नमी, भूजल, जलाशयों और आने वाली फसलों पर पड़ने की आशंका है.
रिपोर्ट में अक्टूबर से दिसंबर 2026 के दौरान अल नीनो के 1950 के बाद सबसे शक्तिशाली घटनाओं में शामिल होने की 83 प्रतिशत संभावना जताई गई है. इसके फरवरी 2027 तक बने रहने की आशंका भी है. ऐसे में खेती के लिए आने वाले महीने महत्वपूर्ण होंगे. यदि सर्दियों में बारिश कम होती है और तापमान सामान्य से ऊपर रहता है, तो रबी की फसलों को पर्याप्त नमी उपलब्ध कराने के लिए सिंचाई पर निर्भरता बढ़ सकती है.
दस वर्षों में सबसे कमजोर मानसून, कई क्षेत्रों में बारिश की भारी कमी
इस साल मानसून की सबसे बड़ी चुनौती केवल कम बारिश नहीं, बल्कि उसका असमान वितरण भी रहा. कुछ क्षेत्रों में सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई, जबकि अन्य जगहों पर भारी बारिश की घटनाएं सामने आईं. रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में सामान्य से 25.6 प्रतिशत कम बारिश हुई. जून से सितंबर के बीच यहां 1,017.1 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जबकि सामान्य स्तर 1,367.3 मिलीमीटर है. रिपोर्ट इसे 1901 के बाद इस क्षेत्र का सबसे कम मानसूनी वर्षा स्तर बताती है.
पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत के कई राज्यों में बारिश की कमी व्यापक रही. असम के 35 में से 22 जिलों में सामान्य से कम वर्षा हुई. अरुणाचल प्रदेश के 16 में से 12 जिलों और मेघालय के 11 में से 10 जिलों में भी बारिश की कमी दर्ज की गई. बिहार के 38 में से 33 जिलों में सामान्य से कम वर्षा हुई. पिछले दस वर्षों में नौ बार पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में सामान्य से कम बारिश दर्ज किए जाने का उल्लेख भी रिपोर्ट में है.
दक्षिणी प्रायद्वीप में भी स्थिति चिंताजनक रही. यहां सामान्य 716 मिलीमीटर के मुकाबले 542 मिलीमीटर बारिश हुई. रिपोर्ट के अनुसार, यह 1901 के बाद चौथा सबसे कम मानसूनी वर्षा स्तर है. कर्नाटक में बारिश की कमी 30 प्रतिशत, केरल में 28 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 25 प्रतिशत और तमिलनाडु में 20 प्रतिशत रही.
इसके विपरीत मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश लगभग सामान्य रही. भारत मौसम विज्ञान विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. के. जे. रमेश के मुताबिक, इस साल 14 कम दबाव वाली प्रणालियां बनीं और कुल 77 दिन तक कम दबाव की स्थिति रही. ये प्रणालियां बंगाल की खाड़ी में विकसित नहीं हुई थीं, बल्कि पश्चिमी प्रशांत महासागर में बनी प्रणालियों के अवशेष थीं. उनका प्रभाव मुख्य रूप से मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत तक सीमित रहा.
भारी बारिश और लंबे सूखे अंतराल ने बढ़ाई परेशानी
मानसून के दौरान बारिश का असमान वितरण खेती के लिए अलग तरह की चुनौती पैदा करता है. कई क्षेत्रों में लंबे समय तक बारिश नहीं हुई, जबकि कुछ स्थानों पर कम अवधि में भारी वर्षा दर्ज की गई. इससे खेतों में नमी बनाए रखना और फसलों की जरूरत के मुताबिक पानी उपलब्ध कराना मुश्किल हो सकता है.
स्काईमेट वेदर के उपाध्यक्ष महेश पलावत के मुताबिक, मॉनसून की प्रणालियों का व्यवहार बदल रहा है. कम दबाव वाली प्रणालियां सामान्य से अधिक समय तक जमीन पर ठहर रही हैं और नमी की लगातार आपूर्ति के कारण अपनी ताकत बनाए रख रही हैं. उनके अनुसार, इससे अत्यधिक बारिश और बादल फटने जैसी घटनाओं में बढ़ोतरी देखने को मिली है.
सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के कार्यकारी निदेशक डॉ. जी. वी. रामंजनेयुलु ने बताया कि किसानों के सामने चुनौती केवल बारिश की कुल मात्रा कम होने की नहीं है. बारिश की शुरुआत में देरी और उसके बीच लंबे सूखे अंतराल भी फसलों को प्रभावित करते हैं. उनके मुताबिक, फसलें आम तौर पर करीब एक सप्ताह तक के सूखे अंतराल को सह सकती हैं, लेकिन इसके बाद मिट्टी की नमी कम पड़ने लगती है. कम बारिश से भूजल का पुनर्भरण भी प्रभावित होता है, जिससे सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी पर दबाव बढ़ सकता है.
गर्म अगस्त और सितंबर ने भी बढ़ाई चिंता
कमजोर मानसून के साथ तापमान का बढ़ना भी चिंता का कारण है. क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2026 भारत में 1901 के बाद सबसे गर्म अगस्त रहा. सितंबर भी रिकॉर्ड में पांचवां सबसे गर्म सितंबर दर्ज किया गया. रिपोर्ट में तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में सूखे की घोषणा का उल्लेख है. महाराष्ट्र के 75 प्रतिशत हिस्से में सूखे की स्थिति घोषित होने से खेती और पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है.
डॉ. के. जे. रमेश के अनुसार, जलवायु परिवर्तन अल नीनो को जन्म नहीं देता, लेकिन पहले से गर्म हो चुके वातावरण में उसके प्रभावों को अधिक तीव्र कर सकता है. भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के जलवायु वैज्ञानिक और आईपीसीसी के प्रमुख लेखक डॉ. रॉक्सी मैथ्यू कोल ने भी कहा कि जलवायु परिवर्तन तापमान की पृष्ठभूमि को गर्म कर रहा है. जंगलों की कटाई और भूमि उपयोग में स्थानीय तथा क्षेत्रीय बदलाव अल नीनो के प्रभावों को और बढ़ा सकते हैं.
इसका असर केवल मॉनसून तक सीमित नहीं रह सकता. समुद्री हीटवेव, मिट्टी की नमी, अगली फसल और पानी की उपलब्धता पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है.
धान का रकबा घटा, फसल विविधीकरण पर जोर
खेती पर मौसम के असर के संकेत खरीफ की बुवाई के आंकड़ों में भी दिखाई दिए हैं. कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 5 अक्टूबर 2026 तक पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में धान का बुवाई रकबा 15.56 लाख हेक्टेयर कम रहा. तेलंगाना, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में धान के रकबे में गिरावट दर्ज की गई. गन्ने और कपास के रकबे में भी कमी आई, जबकि दलहन और तिलहन का रकबा बढ़ा.
विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती मौसम परिस्थितियों में फसल चयन पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है. डॉ. रामंजनेयुलु के मुताबिक, किसानों को धान जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों पर निर्भरता कम करके कम अवधि वाली दलहन, तिलहन और मोटे अनाज की ओर विविधीकरण पर विचार करना चाहिए.
मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाना भी उपयोगी हो सकता है. इससे मिट्टी की पानी रोकने की क्षमता बेहतर होती है और फसलें बारिश के बीच सूखे अंतराल को अपेक्षाकृत अधिक समय तक सह सकती हैं. हालांकि, फसल बदलने का फैसला स्थानीय जलवायु, मिट्टी, उपलब्ध सिंचाई और बाजार की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर करना होगा.
जलाशयों में कम भंडारण से सिंचाई पर बढ़ सकता है दबाव
पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता जलाशयों के आंकड़ों से भी सामने आती है. केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक, 8 अक्टूबर 2026 को देश के 178 जलाशयों में उपलब्ध जीवित जल भंडारण पिछले साल की इसी अवधि के 78.71 प्रतिशत और सामान्य भंडारण के 87.08 प्रतिशत के बराबर था. दक्षिणी क्षेत्र में जल भंडारण सामान्य स्तर का केवल 47.22 प्रतिशत रहा, जबकि उत्तरी क्षेत्र में यह 58.63 प्रतिशत था.
जलाशयों में उपलब्ध पानी का स्तर रबी की सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण है. यदि सर्दियों में बारिश कम होती है और मिट्टी में पहले से मौजूद नमी भी घटती है, तो किसानों को सिंचाई के लिए भूजल या जलाशयों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है. इससे उन क्षेत्रों में परेशानी बढ़ सकती है, जहां जल भंडारण पहले ही सामान्य से नीचे है.
सर्दियों में कम बारिश और अधिक तापमान की आशंका
भारत मौसम विज्ञान विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, अल नीनो के साल के अंत तक चरम पर पहुंचने के साथ आगामी सर्दियों में देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका है. इससे दिन और रात, दोनों का तापमान सामान्य से ऊपर रह सकता है.
महेश पलावत के मुताबिक, अल नीनो और वैश्विक तापवृद्धि का संयुक्त प्रभाव आने वाले महीनों में तापमान के नए रिकॉर्ड बनने की आशंका बढ़ाता है. डॉ. के. जे. रमेश ने भी आशंका जताई है कि गर्मी इस बार फरवरी में ही दस्तक दे सकती है. यदि ऐसा होता है, तो रबी की फसलों के विकास और पकने की अवधि पर दबाव बढ़ सकता है. हालांकि, इसका वास्तविक असर क्षेत्र, फसल और आने वाले मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.
केंद्र सरकार ने 2026-27 के लिए कुल खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य 37.393 करोड़ टन रखा है, जो 2025-26 के अनुमानित उत्पादन से 26.3 लाख टन कम है. ऐसे में मौसम और पानी की उपलब्धता खाद्यान्न उत्पादन के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कारक होंगे.
शुरुआती तैयारी और स्थानीय स्तर पर जोखिम प्रबंधन जरूरी
क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला के मुताबिक, अल नीनो पहले से गर्म होती जलवायु के ऊपर अपना प्रभाव दिखा रहा है, जिससे आने वाले महीनों में तापमान के रिकॉर्ड टूटने की आशंका बढ़ती है. उन्होंने गर्मी को किसी एक असाधारण घटना के बजाय लगातार बढ़ते जोखिम के रूप में देखते हुए तैयारी मजबूत करने पर जोर दिया. इसके लिए शुरुआती चेतावनी प्रणालियों, हीट एक्शन प्लान, सार्वजनिक स्वास्थ्य तैयारियों और स्थानीय स्तर पर जोखिम से निपटने की क्षमता को बेहतर बनाना जरूरी है.
रिपोर्ट में आईपीसीसी के आकलन का हवाला देते हुए कहा गया है कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अल नीनो और जलवायु परिवर्तन का संयुक्त असर खेती के जोखिम बढ़ा सकता है. इसके मुताबिक, 2050 तक दोनों के मिले-जुले प्रभाव से वैश्विक फसल पैदावार आधार स्थिति की तुलना में 10 से 25 प्रतिशत तक घट सकती है. भारत को भी अधिक जोखिम वाले देशों में शामिल किया गया है.
कमजोर मॉनसून का असर अब केवल बारिश के आंकड़ों तक सीमित नहीं है. मिट्टी की नमी, भूजल, जलाशयों में भंडारण, सर्दियों का तापमान और रबी की फसलें एक-दूसरे से जुड़ी चुनौतियां बन रही हैं. आने वाले महीनों में मौसम की समय पर जानकारी, पानी का सावधानीपूर्वक इस्तेमाल, उपयुक्त फसल चयन और स्थानीय स्तर पर तैयारी यह तय करने में अहम होंगे कि बारिश की कमी का बोझ किसानों, खाद्य उत्पादन और जल उपलब्धता पर कितना पड़ता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

