संयुक्त राष्ट्र/नई दिल्ली. जलवायु संकट अब केवल तापमान बढ़ने, उत्सर्जन के आंकड़ों या भविष्य की आशंकाओं का विषय नहीं रह गया है. हिमालय में हुई विनाशकारी ग्लेशियर आपदा ने इसे सीधे मानवीय नुकसान, आर्थिक पुनर्निर्माण और कमजोर देशों के लिए वित्तीय सहायता के सवाल से जोड़ दिया है. संयुक्त राष्ट्र महासभा के मौजूदा सत्र में जलवायु एजेंडा इसी पृष्ठभूमि में आगे बढ़ रहा है और इसके बाद वैश्विक निगाहें नवंबर में होने वाले COP31 पर टिकेंगी. नेपाल की हालिया आपदा ने विशेष रूप से Loss and Damage यानी जलवायु आपदाओं से होने वाली क्षति और नुकसान की भरपाई के लिए वित्तीय व्यवस्था को फिर अंतरराष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है. हालिया वैज्ञानिक आकलनों ने भी नेपाल-तिब्बत क्षेत्र की ग्लेशियर आपदा में जलवायु परिवर्तन की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है.
नेपाल की आपदा ने सामने रखा नुकसान का सवाल
अगस्त 2026 में नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टान के ढहने से आई बाढ़ ने बड़े पैमाने पर जनहानि और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया. वैज्ञानिकों के अनुसार क्षेत्र में बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पतले होने और पर्वतीय क्षेत्रों में जमी बर्फ तथा पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने ने अस्थिरता बढ़ाई. हालांकि वैज्ञानिक आकलन इसे किसी एक कारण का परिणाम नहीं मानता, लेकिन जलवायु परिवर्तन को आपदा की परिस्थितियां गंभीर बनाने वाला महत्वपूर्ण कारक बताया गया है.
इस घटना ने उस पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया है कि जिन देशों का वैश्विक उत्सर्जन में योगदान अपेक्षाकृत कम है, उन्हें जलवायु आपदाओं के बाद पुनर्निर्माण के लिए संसाधन कहां से मिलेंगे. नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र के Loss and Damage Fund से सहायता की मांग भी की है.
Loss and Damage Fund पर बढ़ेगा दबाव
जलवायु वित्त इस वर्ष के वैश्विक जलवायु विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है. कमजोर और विकासशील देशों की मांग है कि जलवायु परिवर्तन से होने वाली क्षति के लिए बनाई गई वित्तीय व्यवस्थाएं केवल घोषणा तक सीमित न रहें, बल्कि प्रभावित देशों तक वास्तविक संसाधन पहुंचें.
नेपाल की स्थिति ने इस मांग को मानवीय संदर्भ दिया है. आपदा के बाद पुनर्निर्माण, बुनियादी ढांचे की बहाली और भविष्य की आपदाओं से बचाव के लिए बड़ी राशि की आवश्यकता होती है. ऐसे में Loss and Damage की व्यवस्था की वास्तविक क्षमता और वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता COP31 में महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बन सकती है.
COP31 में Türkiye और Australia की साझा भूमिका
UNGA के बाद जलवायु कूटनीति का अगला बड़ा पड़ाव COP31 होगा, जो 9 से 20 नवंबर 2026 तक Türkiye के अंताल्या में आयोजित होगा. Türkiye मेजबान और COP31 की अध्यक्षता करेगा, जबकि Australia वार्ताओं के अध्यक्ष के रूप में देशों के बीच औपचारिक बातचीत का संचालन करेगा. दोनों देशों ने COP31 के लिए साझा सहयोग मॉडल तैयार किया है.
COP31 की तैयारी में दोनों पक्षों ने जलवायु प्रतिबद्धताओं को जमीन पर लागू करने और उन्हें निवेश तथा परियोजनाओं से जोड़ने पर जोर दिया है. इसलिए इस सम्मेलन को केवल नए लक्ष्य तय करने के बजाय मौजूदा प्रतिबद्धताओं के क्रियान्वयन पर केंद्रित करने की कोशिश दिखाई दे रही है.
विद्युत आधारित अर्थव्यवस्था पर बड़ा जोर
COP31 की तैयारियों में Electrification यानी परिवहन, भवनों और उद्योगों में जीवाश्म ईंधन के स्थान पर बिजली के उपयोग को बढ़ाना प्रमुख पहल के रूप में सामने आया है. Türkiye की COP31 अध्यक्षता ने जून में 2035 तक अंतिम ऊर्जा मांग में बिजली की हिस्सेदारी को मौजूदा 20 प्रतिशत से कुछ अधिक स्तर से बढ़ाकर 35 प्रतिशत करने का लक्ष्य घोषित किया था.
इस लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए जून में ‘Electrify Now’ नाम से एक वैश्विक मंच भी शुरू किया गया. इसमें सरकारों के साथ अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा संस्थाओं और उद्योग जगत के प्रतिनिधि शामिल हुए हैं. इसका उद्देश्य स्वच्छ बिजली के आधार पर घरों, उद्योगों और परिवहन के विद्युतीकरण को तेज करना है.
Action Agenda में गैर-वार्तागत पहल भी महत्वपूर्ण
COP31 की Action Agenda औपचारिक सरकारी वार्ताओं से अलग लेकिन समानांतर प्रक्रिया के रूप में आगे बढ़ रही है. संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सचिवालय के अनुसार इसमें विद्युतीकरण के साथ शहरी लचीलेपन और कचरे की वृद्धि कम करने जैसे लक्ष्य शामिल हैं. इसका मतलब यह है कि COP31 की पूरी जलवायु प्रक्रिया केवल वार्ता कक्षों में होने वाले निर्णयों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सरकारों, शहरों, उद्योगों और अन्य संस्थाओं की व्यावहारिक पहलों को भी इसमें जोड़ा जा रहा है.
Türkiye और Australia के संयुक्त दृष्टिकोण में जलवायु वित्त, स्वच्छ ऊर्जा, लचीला बुनियादी ढांचा, हरित औद्योगिक विकास और कमजोर क्षेत्रों की मजबूती को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में रखा गया है.
जलवायु वित्त पर असली परीक्षा
विद्युतीकरण और स्वच्छ ऊर्जा की वैश्विक योजनाओं के सामने सबसे बड़ा व्यावहारिक सवाल वित्त का है. विकासशील देशों के लिए नई बिजली व्यवस्था, ग्रिड विस्तार, सार्वजनिक परिवहन का विद्युतीकरण और उद्योगों को स्वच्छ तकनीक में बदलना बड़े निवेश की मांग करता है.
17 सितंबर को OECD और Türkiye की COP31 अध्यक्षता के बीच घोषित रणनीतिक साझेदारी में भी जलवायु वित्त, निवेश, स्वच्छ ऊर्जा और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में निजी पूंजी जुटाने पर जोर दिया गया है. साझेदारी का उद्देश्य जलवायु प्रतिबद्धताओं को ठोस नीतियों और निवेश योग्य परियोजनाओं में बदलने के लिए आर्थिक विश्लेषण और नीति सहयोग उपलब्ध कराना है.
जीवाश्म ईंधन से दूरी की चुनौती
जलवायु कार्रवाई का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू जीवाश्म ईंधन से संक्रमण है. अंतरराष्ट्रीय बहस में अब यह सवाल भी उठ रहा है कि विद्युतीकरण को वास्तव में कितना स्वच्छ बनाया जा सकता है. यदि बिजली उत्पादन में कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधनों की हिस्सेदारी अधिक बनी रहती है तो केवल बिजली की मांग बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा.
इसीलिए COP31 की तैयारियों में स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन, बिजली ग्रिड, उद्योगों के डीकार्बोनाइजेशन और निवेश को एक साथ देखने पर जोर दिया जा रहा है. Türkiye की Action Agenda में विद्युतीकरण के साथ हरित औद्योगिक विकास को भी प्राथमिकता दी गई है.
समुद्र और जलवायु का रिश्ता भी एजेंडे में
जलवायु संकट का असर केवल जमीन और पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं है. समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और महासागर भी जलवायु कार्रवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहे हैं. COP31 की प्राथमिकताओं में महासागर, जैव विविधता और लचीलेपन से जुड़े विषयों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है.
COP31 की व्यापक रूपरेखा में जलवायु कार्रवाई को जैव विविधता, महासागर, शहरी लचीलेपन और आर्थिक नीतियों के साथ जोड़ने की दिशा में पहल की जा रही है.
भारत के लिए भी ऊर्जा बदलाव का आर्थिक पहलू
वैश्विक विद्युतीकरण की बहस में भारत जैसे बड़े विकासशील देश के लिए जलवायु लक्ष्य और ऊर्जा सुरक्षा दोनों जुड़े हुए हैं. इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में वृद्धि और बिजली ग्रिड का आधुनिकीकरण आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने के साथ आर्थिक प्रभाव भी डाल सकता है.
इसी कारण COP31 में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए केवल उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य नहीं, बल्कि संक्रमण की लागत, निवेश और तकनीकी सहयोग भी महत्वपूर्ण रहेंगे.
घोषणाओं से आगे क्रियान्वयन पर नजर
संयुक्त राष्ट्र महासभा से COP31 तक इस बार जलवायु बहस का केंद्र एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखा रहा है. नए लक्ष्य घोषित करने के साथ यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि उन्हें जमीन पर कैसे लागू किया जाएगा. UNFCCC के अनुसार COP31 की तैयारी में औपचारिक वार्ताएं और Action Agenda अलग लेकिन समानांतर तथा पूरक प्रक्रियाओं के रूप में आगे बढ़ रही हैं.
नेपाल की आपदा ने Loss and Damage की जरूरत को सामने रखा है, जबकि विद्युतीकरण ने ऊर्जा संक्रमण के लिए एक ठोस दिशा प्रस्तुत की है. दूसरी ओर जलवायु वित्त यह तय करने वाला कारक बन रहा है कि विकासशील और कमजोर अर्थव्यवस्थाएं इन बदलावों को कितनी तेजी से अपना सकती हैं.
अब UNGA में होने वाली घोषणाओं से आगे असली निगाह COP31 पर होगी. वहां यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि Loss and Damage, जलवायु वित्त, स्वच्छ ऊर्जा, विद्युतीकरण और जीवाश्म ईंधन से संक्रमण जैसे मुद्दे किस हद तक ठोस नीतियों, वित्तीय संसाधनों और लागू किए जा सकने वाले निर्णयों में बदलते हैं. यही तय करेगा कि जलवायु कूटनीति इस बार केवल घोषणाओं तक रहती है या उनका असर जमीन पर भी दिखाई देता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-




