भारत में 25 साल में घटा ग्रीन कवर, गर्मियों में बढ़ रही गर्मी; स्टडी में सामने आया 1 से 2.5°C तापमान का अंतर

भारत में 25 साल में घटा ग्रीन कवर, गर्मियों में बढ़ रही गर्मी; स्टडी में सामने आया 1 से 2.5°C तापमान का अंतर

प्रेषित समय :22:00:25 PM / Tue, Oct 27th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली.भारत में लगातार घटती हरियाली और बढ़ती गर्मी के बीच एक नई वैज्ञानिक स्टडी ने चिंता बढ़ाने वाले तथ्य सामने रखे हैं. क्लाइमेट ट्रेंड्स की ओर से किए गए अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2001 से 2025 के बीच देश में ग्रीन कवर यानी वनस्पति से ढके क्षेत्रों का हिस्सा 36.95 प्रतिशत से घटकर 31.35 प्रतिशत रह गया. इस तरह पिछले 24 वर्षों में ग्रीन कवर की हिस्सेदारी में 5.6 प्रतिशत अंक की गिरावट दर्ज की गई है. इसी अवधि में गैर-हरित क्षेत्रों का हिस्सा 63.05 प्रतिशत से बढ़कर 68.65 प्रतिशत हो गया. अध्ययन में यह भी सामने आया है कि गर्मियों के दौरान वनस्पति वाले क्षेत्रों की तुलना में गैर-हरित इलाकों का औसत तापमान लगभग 1 से 2.5 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा. वैज्ञानिकों के अनुसार, यह अंतर बताता है कि पेड़-पौधे और प्राकृतिक वनस्पति स्थानीय तापमान नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. हालांकि, बढ़ती गर्मी के लिए केवल हरियाली में कमी को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता, क्योंकि क्षेत्रीय जलवायु परिवर्तन और भूमि उपयोग में बदलाव भी तापमान को प्रभावित करते हैं.

24 वर्षों में हरियाली के क्षेत्र में बड़ी गिरावट

क्लाइमेट ट्रेंड्स की स्टडी Assessment of Green Cover Dynamics and Their Influence on Summer Temperature across India Using MODIS Land Cover and ERA5 Reanalysis Data में देश के विभिन्न हिस्सों में भूमि आवरण और गर्मियों के तापमान के बीच संबंध का विश्लेषण किया गया है.

अध्ययन के अनुसार, 2001 में भारत के कुल अध्ययन क्षेत्र का 36.95 प्रतिशत हिस्सा वनस्पति से ढका था, जो 2025 में घटकर 31.35 प्रतिशत रह गया. दूसरी ओर, गैर-हरित सतहों की हिस्सेदारी बढ़ी है. यह बदलाव देश में प्राकृतिक वनस्पति और भूमि आवरण के बदलते स्वरूप की ओर संकेत करता है.

विशेषज्ञों के मुताबिक, हरियाली में कमी का असर केवल पर्यावरण या जैव विविधता तक सीमित नहीं रहता. इससे जमीन की सतह के गर्म होने, मिट्टी में नमी बनाए रखने और स्थानीय जलवायु परिस्थितियों पर भी प्रभाव पड़ सकता है.

गैर-हरित इलाकों में 2.5 डिग्री तक ज्यादा गर्मी

स्टडी का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि पूरे अध्ययन काल में गैर-हरित क्षेत्रों का गर्मियों का औसत तापमान वनस्पति वाले क्षेत्रों की तुलना में अधिक रहा. दोनों प्रकार के क्षेत्रों के बीच तापमान का अंतर लगभग 1 से 2.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया.

अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिन क्षेत्रों में ग्रीन कवर कम हुआ, वहां गर्मियों के औसत तापमान में लगभग 0.26 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई. यह आंकड़ा वनस्पति में बदलाव और स्थानीय गर्मी के बीच संबंध को दर्शाता है.

हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि तापमान में वृद्धि का पूरा कारण हरियाली की कमी नहीं है. व्यापक जलवायु परिवर्तन, क्षेत्रीय मौसम की परिस्थितियां और भूमि आवरण में बदलाव मिलकर तापमान के रुझान को प्रभावित करते हैं.

मध्य भारत से लेकर गंगा के मैदानों तक हरियाली प्रभावित

अध्ययन में देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में ग्रीन कवर के बदलावों का अलग-अलग विश्लेषण किया गया. पश्चिमी भारत, इंडो-गंगा के मैदानी क्षेत्रों, मध्य भारत के कुछ हिस्सों और प्रायद्वीपीय भारत के कई इलाकों में वनस्पति आवरण में गिरावट दर्ज की गई.

इसके विपरीत, पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों, हिमालय की तलहटी तथा दक्षिणी और पूर्वी भारत के चुनिंदा क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर हरियाली बढ़ने के संकेत मिले.

तापमान के रुझान भी सभी क्षेत्रों में एक जैसे नहीं रहे. उत्तर-पश्चिमी और उत्तरी भारत में गर्मी बढ़ने की प्रवृत्ति देखी गई, जबकि मध्य और दक्षिण भारत के कुछ इलाकों में स्थानीय स्तर पर ठंडक के रुझान सामने आए.

इन क्षेत्रीय अंतरों से स्पष्ट होता है कि देश में हरियाली और तापमान के बीच संबंध को समझने के लिए स्थानीय परिस्थितियों का अध्ययन भी जरूरी है.

पेड़-पौधे कैसे कम करते हैं गर्मियों की तपिश

वैज्ञानिकों के अनुसार, प्राकृतिक वनस्पति स्थानीय तापमान नियंत्रित करने में कई स्तरों पर मदद करती है. पेड़-पौधे सूर्य की ऊर्जा के एक हिस्से का उपयोग वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया में करते हैं. इस प्रक्रिया में पौधे पानी को वाष्प के रूप में वातावरण में छोड़ते हैं, जिससे आसपास की सतह और वातावरण को ठंडा रखने में मदद मिलती है.

इसके अलावा, पेड़ों की छाया जमीन को सीधे सूर्य की किरणों से गर्म होने से बचाती है. वनस्पति मिट्टी में नमी बनाए रखने और सतह के तापीय संतुलन को प्रभावित करने में भी भूमिका निभाती है.

इसके विपरीत, कम वनस्पति वाली सतहों पर सूर्य की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा जमीन को गर्म करने में खर्च हो सकता है. यही कारण है कि समान मौसम की परिस्थितियों में भी हरित और गैर-हरित क्षेत्रों के तापमान में अंतर दिखाई दे सकता है.

हरियाली जलवायु अनुकूलन का महत्वपूर्ण आधार

क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिसर्च लीड डॉ. पलक बलियान के अनुसार, अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि वनस्पति केवल पारिस्थितिक संपदा नहीं, बल्कि भारत के जलवायु अनुकूलन के बुनियादी ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

उन्होंने कहा कि हरित और गैर-हरित क्षेत्रों के बीच गर्मियों के तापमान में लगातार बना रहने वाला 1 से 2.5 डिग्री सेल्सियस का अंतर वनस्पति की भूमिका को रेखांकित करता है.

उनके मुताबिक, वाष्पोत्सर्जन, छाया और मिट्टी में नमी बनाए रखने जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाएं स्थानीय तापीय परिस्थितियों को नियंत्रित करने में सहायक होती हैं.

डॉ. बलियान ने मौजूदा प्राकृतिक वनस्पति को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि विशेष रूप से उन क्षेत्रों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, जहां हरियाली लगातार घट रही है और गर्मियों का तापमान बढ़ रहा है.

केवल पेड़ लगाने से नहीं रुकेगा जलवायु परिवर्तन

दिल्ली विश्वविद्यालय में एटमॉस्फेरिक फिजिक्स के प्रोफेसर डॉ. एस. के. ढाका ने अध्ययन के निष्कर्षों पर कहा कि वनस्पति की बहाली स्थानीय गर्मी के तनाव को कम करने में मदद कर सकती है, लेकिन इसे व्यापक जलवायु कार्रवाई का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए.

उन्होंने बताया कि जिन क्षेत्रों में हरियाली लगातार बनी रही, वहां भी तापमान बढ़ने के संकेत मिले हैं. इससे स्पष्ट होता है कि बड़े पैमाने पर हो रहा जलवायु परिवर्तन स्थानीय तापमान को प्रभावित करता रहता है.

उनके अनुसार, भारत को दोहरी रणनीति अपनाने की आवश्यकता है. एक ओर मौजूदा वनस्पति को नुकसान से बचाना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर गर्मी के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों में वैज्ञानिक आधार पर हरियाली की बहाली भी महत्वपूर्ण है.

इसके साथ जल प्रबंधन, शहरी नियोजन और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी जैसे उपायों को भी जलवायु अनुकूलन की रणनीति का हिस्सा बनाना होगा.

जलवायु संकट से निपटने में जैव विविधता की अहम भूमिका

क्लाइमेट ट्रेंड्स की संस्थापक निदेशक आरती खोसला ने कहा कि अध्ययन ने वनस्पति और जैव विविधता के महत्व को आंकड़ों के माध्यम से सामने रखा है.

उनके अनुसार, हरियाली को केवल पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा विषय समझना पर्याप्त नहीं है. यह स्थानीय इलाकों को ठंडा रखने और समुदायों की जलवायु जोखिमों से निपटने की क्षमता बढ़ाने का भी महत्वपूर्ण आधार है.

उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों में ग्रीन कवर कम हुआ है, वहां तापमान में बढ़ोतरी के संकेत मिले हैं. ऐसे बदलावों का प्रभाव स्थानीय समुदायों पर भी पड़ सकता है.

विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक वनस्पति का संरक्षण गर्मी के जोखिम को कम करने के साथ पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में भी मदद कर सकता है.

सैटेलाइट और तापमान डेटा से किया गया विश्लेषण

इस अध्ययन में वर्ष 2001 से 2025 तक के MODIS लैंड कवर डेटा और ERA5-Land तापमान संबंधी आंकड़ों का उपयोग किया गया.

शोधकर्ताओं ने अलग-अलग वर्षों में भूमि आवरण के बदलावों का विश्लेषण किया और उनकी तुलना मार्च से मई के बीच दर्ज मौसमी तापमान से की.

इस प्रक्रिया के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया कि जिन क्षेत्रों में वनस्पति बढ़ी या घटी, वहां गर्मियों के तापमान में किस प्रकार के बदलाव सामने आए.

हालांकि, ऐसे विश्लेषण भूमि आवरण और तापमान के बीच संबंध की पहचान करते हैं. तापमान में बदलाव के सभी कारणों को केवल एक कारक से जोड़कर नहीं देखा जा सकता.

बढ़ती गर्मी के बीच हरियाली बचाने की चुनौती

अध्ययन का निष्कर्ष है कि भारत में गर्मियों की बढ़ती तपिश से निपटने के लिए मौजूदा प्राकृतिक वनस्पति को बचाना और पारिस्थितिक तंत्रों की बहाली को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है.

विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रीन कवर के अनावश्यक नुकसान को रोकना, वैज्ञानिक तरीके से वनस्पति बहाली करना और टिकाऊ भूमि प्रबंधन अपनाना जलवायु अनुकूलन की व्यापक रणनीति का हिस्सा होना चाहिए.

इसके साथ ही जल संरक्षण, बेहतर शहरी नियोजन और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी की आवश्यकता भी बनी रहेगी.

कुल मिलाकर, यह अध्ययन संकेत देता है कि भारत में घटती हरियाली केवल प्राकृतिक संसाधनों के नुकसान का विषय नहीं है, बल्कि स्थानीय तापमान और गर्मी के जोखिम से भी जुड़ी हुई है. ऐसे में प्राकृतिक वनस्पति का संरक्षण आने वाले वर्षों में जलवायु अनुकूलन की नीतियों का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-