जबलपुर. पराली और नरवाई प्रबंधन को लेकर किसानों और प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति बनती दिखाई दे रही है. फसल कटाई के बाद खेतों को अगली फसल की बोवनी के लिए तैयार करने की सीमित अवधि और पराली प्रबंधन के पर्याप्त संसाधनों की कमी किसानों के सामने बड़ी चुनौती बन गई है. किसानों का कहना है कि धान की कटाई के बाद रबी फसल की बोवनी के लिए उनके पास महज एक सप्ताह का समय होता है. ऐसे में यदि पराली और नरवाई के निस्तारण के लिए पर्याप्त मशीनें और दूसरे संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गए तो किसान फसल अवशेषों का प्रबंधन कैसे करेंगे? बिना वैकल्पिक व्यवस्था किए पराली जलाने पर किसानों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करना उचित नहीं है.
इसी मुद्दे को लेकर भारत कृषक समाज के प्रतिनिधिमंडल ने नवागत जबलपुर कलेक्टर अरुण कुमार विश्वकर्मा से सौजन्य मुलाकात की. इस दौरान किसान प्रतिनिधियों ने जिले में कृषि से जुड़ी समस्याओं को सामने रखते हुए ज्ञापन सौंपा. उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसानों को पराली प्रबंधन के व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराए बिना कार्रवाई की गई तो किसान संगठन इसका विरोध करेंगे और जरूरत पड़ने पर आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे.
बोवनी के लिए एक सप्ताह, पराली प्रबंधन बना बड़ी चुनौती
किसान प्रतिनिधियों ने कलेक्टर को बताया कि धान की कटाई के बाद खेतों को अगली फसल के लिए तैयार करने का समय बेहद सीमित रहता है. रबी फसलों की बोवनी निर्धारित समय पर करना जरूरी होता है. ऐसे में खेतों में बचे फसल अवशेषों को हटाने और उनका उचित प्रबंधन करने के लिए किसानों को पर्याप्त समय और संसाधन नहीं मिल पाते.
किसानों के मुताबिक, पराली और नरवाई के प्रबंधन के लिए आधुनिक कृषि मशीनों की उपलब्धता जरूरी है. यदि प्रशासन किसानों से फसल अवशेष नहीं जलाने की अपेक्षा करता है तो उसे इसके लिए जरूरी मशीनें, तकनीकी सहायता और दूसरी सुविधाएं भी उपलब्ध करानी चाहिए. केवल प्रतिबंध और जुर्माने के माध्यम से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सकता.
विकल्प दिए बिना कार्रवाई का करेंगे विरोध
भारत कृषक समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि किसान पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के महत्व को समझते हैं, लेकिन इसके लिए किसानों को व्यवहारिक विकल्प देना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है. आर्थिक रूप से हर किसान के लिए महंगी मशीनें खरीदना संभव नहीं है. ऐसे में प्रशासन को मशीनों की उपलब्धता, किराये पर कृषि उपकरण देने और सामूहिक स्तर पर पराली प्रबंधन की व्यवस्था विकसित करनी चाहिए.
प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी कि संसाधनों की कमी के बावजूद यदि पराली जलाने के मामलों में किसानों पर कार्रवाई की गई तो किसान संगठन इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे. संगठन किसानों के हितों की रक्षा के लिए आंदोलन करने को मजबूर होगा.
अधिकारियों के फोन नहीं उठाने से बढ़ रही परेशानी
बैठक के दौरान किसान प्रतिनिधियों ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कलेक्टर को बताया कि कई बार किसान अपनी समस्याओं के समाधान के लिए संबंधित अधिकारियों को फोन करते हैं, लेकिन अधिकारी फोन नहीं उठाते. वाट्सएप पर संदेश भेजने के बाद भी कई मामलों में समय पर जवाब नहीं मिलता.
किसानों का कहना था कि जब स्थानीय स्तर पर समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता तो उन्हें बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं. इससे खेती-किसानी के महत्वपूर्ण समय में उनका काम प्रभावित होता है. उन्होंने मांग की कि अधिकारियों को किसानों के फोन उठाने और वाट्सएप पर भेजी गई शिकायतों का समयबद्ध जवाब देने के लिए स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएं.
कलेक्टर से व्यवस्था सुधारने की मांग
किसान प्रतिनिधियों ने कलेक्टर से आग्रह किया कि जिले में पराली प्रबंधन के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार की जाए. किसानों को पर्याप्त मशीनें और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने के साथ ही अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाए, ताकि किसानों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए परेशान न होना पड़े.
कलेक्टर से हुई इस मुलाकात में अपर कलेक्टर नीता राठौर और उपसंचालक कृषि उमेश कुमार कटहरे भी मौजूद रहे. अब किसानों की निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं. देखना होगा कि प्रशासन पराली प्रबंधन के लिए किसानों को संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में क्या कदम उठाता है और बोवनी के सीमित समय में उनकी परेशानियों का समाधान कैसे करता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

