पुरुष प्रधान समाज की यदि व्यवस्था थी तो इस बात के लिए नहीं थी कि इसमें महिलाओं को दोयम दर्ज़ा दिया जाएगा , या उनके लिए जीना कठिन हो जाएगा. बल्कि इसलिए थी कि महिलाओं को और अधिक मजबूती प्राप्त हो , वो देश-समाज की रीढ़ बने और उन्नति करे. किन्तु अफ़सोस सारी व्याख्याओं को पुरुष प्रधान समाज ने दरकिनार करते हुए महिलाओं के लिए जीना दूभर बना दिया. ये कह सकते हैं कि एक ऐसा निर्माण शुरू हो गया जिसमे महिलाओं की भागीदारी तो शत प्रतिशत होती है किन्तु उनको श्रेय नहीं मिलता. पर अब तो ये बात भी धीरे धीरे दफन होने लगी है क्योंकि कहा जाता है न कि नारी ने जो ठान लिया वो होता ही है.
आप देखिये कि पूरी दुनिया में होने वाले अन्याय-अत्याचार और अनाचार महिलाओं के इर्द गिर्द ही अधिक संख्या में हैं. महिलाएं ही केंद्र बिंदु है और उन पर ही अधिक से अधिक आक्रमण है. क्यों ? क्योंकि महिला को सिर्फ एक देह उपभोग की वस्तु माना जाता रहा है. यह आज से नहीं है , या ये आधुनिक जीवन का सबसे खराब पहलु नहीं है बल्कि ये एक तरह से सनातन है. हर युग में महिलाओं को उपभोग की वस्तु माना जाता रहा है , और वजह भी यही है कि जब आप किसी को वस्तु की तरह मानते हैं तब उसके सामान अधिकार की बातें महज एक दिखावाभर रह जाती है. ये दिखावा छोटे -मोटे स्तर पर सत्त जारी है. स्त्रीवाद में लिपटा एक बहुत बड़ा वर्ग भी स्त्रियों की भलाई में असमर्थ है और जितना कुछ समर्थता दिख रही है वह केवल स्त्री द्वारा ही स्त्री के लिए किए जाने वाले कार्य है. हालांकि अभी भी महिलाओं को पुरुषो के सामान अधिकार प्राप्त नहीं है और ये जंग संभवतः आने वाले कई वर्षो तक जारी रहेगी.स्त्री संघर्ष पुरुष सत्ता से जुझती है पुरुषों से नहीं मगर फिर भी महिला दिवस के नाम पर शुरू हुआ आयोजन सालभर महिलाओं के लिए अपने अधिकार करता रहेगा और समाज में उनकी स्थिति को धीरे ही सही किन्तु सुधारता चलेगा. 8 मार्च को ये दिन नियत किया गया है. यानी 8 मार्च महिला दिवस के नाम से पूरी दुनिया में मनाया जाता है. लगभग सभी विकसित और विकासशील देशो में इसे मनाया जाता है. मगर क्यों ? इतिहास में वो कौनसा ऐसा विशेष पल जन्मा जिसने महिलाओं के लिए कोई दिन तय करने के लिए बाध्य किया ? क्या इतिहास को जानती हैं आज की महिलाएं ?
इतिहास के अनुसार समानाधिकार की यह लड़ाई आम महिलाओं द्वारा शुरू की गई थी. प्राचीन ग्रीस में लीसिसट्राटा नाम की एक महिला ने फ्रेंच क्रांति के दौरान युद्ध समाप्ति की मांग रखते हुए इस आंदोलन की शुरूआत की. फारसी महिलाओं के एक समूह ने वरसेल्स में इस दिन एक मोर्चा निकाला, इस मोर्चे का उद्देश्य युद्ध की वजह से महिलाओं पर बढ़ते हुए अत्याचार को रोकना था.
सन 1909 में सोशलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका द्वारा पहली बार पूरे अमेरिका में 28 फरवरी को महिला दिवस मनाया गया. सन 1910 में सोशलिस्ट इंटरनेशनल द्वारा कोपनहेगन में महिला दिवस की स्थापना हुई और 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विटजरलैंड में लाखों महिलाओं द्वारा रैली निकाली गई. मताधिकार, सरकारी कार्यकारिणी में जगह, नौकरी में भेदभाव को खत्म करने जैसी कई मुद्दों की मांग को लेकर इस का आयोजन किया गया था. 1913-14 प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, रूसी महिलाओं द्वारा पहली बार शांति की स्थापना के लिए फरवरी माह के अंतिम रविवार को महिला दिवस मनाया गया. उस समय विश्व के कुछ देशो में जूलियन कैलेंडर चलता था बाकी देशो में ग्रेगेरियन कैलेंडर इन दोनों की तारीखों में कुछ अंतर है जूलियन कैलेंडर के मुताबिक फरवरी का अंतिम रविवार की तारिक 23 थी जब की ग्रेगरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन 8 मार्च था. इस समय पूरी दुनियां में ग्रेगेरियन कैलैंडर से चलता है इसी लिए 8 मार्च महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा. अगर हम चाहते हैं कि हमारा देश तरक्की करे तो हमें महिलाओं को सशक्त बनाना होगा. भारतीय संस्कृति ने सदैव ही नारी जाती को पूज्यनीय एवं बंदनी माना है तभी तो कहा गया है -यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता:. अर्थात्, जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं.भारत में भी महिला दिवस व्यापक रूप में मनाया जाने लगा है. पुरे देश में इस दिन महिलाओं को समाज में उनके विशेष योगदान के लिए सम्मानित किया जाता है और समारोह भी आयोजित किये जाते है. उन्नीसवीं सदी के मध्यकाल से लेकर इक्कीसवीं सदी तक आते- आते महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ है मध्यकालीन काव्य में मीरा को छोड़कर अन्य भक्त एवं संत कवियों ने नारी की सार्थकता पुरुष वर्चस्ववादी ढांचे में ही सुरक्षित की है. हिन्दी साहित्य में नारी की अस्मिता की पहली आवाज मीरा के काव्य में सुनाई पड़ती है. मीरा के काव्य में एक ओर स्त्री की पराधीनता और यातना की अभिव्यक्ति है तो दूसरी ओर उस व्यवस्था के बन्धनों का पूरी तरह निषेध हैसाहित्य जगत में मीरा के अलावा महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान , महाश्वेता देवी, मृदुला गर्ग, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, मैत्रीय पुष्पा, सूर्य बाला जैसी अनेक महिला लेखिकाओं ने हर परिस्थितियों में साहित्य जगत को अपनी उत्कृष्ट रचनाओं से शुशोभित किया है.
अगर हम चाहते हैं कि हमारा देश तरक्की करे तो हमें महिलाओं को सशक्त बनाना होगा.
हमें प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की बात नहीं भुलनी चाहिए जिसमें उन्होंने कहा था कि "लोगों को जगाने के लिए महिलाओं का जागृत होना जरुरी है एक बार जब वो अपना कदम उठा लेती है, परिवार आगे बढ़ता है गांव आगे बढ़ता है और राष्ट्र विकास की ओर उन्मुख होता है. भारत में महीलाओं की स्थिति सदैव एक समान नहीं रही है. वैदिक काल में महीलाओं को बराबरी का दर्जा और अधिकार प्राप्त था परन्तु मध्य काल में विदेशीयों के आगमन से स्त्रियों की स्थिति में काफी गिरावट आयी.इसका कारण यह था कि इस समय भारतीय समाज पुरुष प्रधान समाज बन गया था और महिलाओं को मात्र पुरुषों का गुलाम समझा जाने लगा था. जिससे महिलाएं घर की चारदीवारी में कैद होती गई. अंग्रेजों के समय में रानी लक्ष्मीबाई और सावित्रीबाई फूले जैसी महिलाओं के कारण कुछ बदलाव आया पर महिलाओं की हालत में ज्यादा सुधार नहीं हुआ. महिलाओं को चारदीवारी से बाहर निकलने तथा पुरुष समानता, स्त्री शिक्षा,सती प्रथा को रोकने के लिए राजा राम मोहन राय, दयानंद सरस्वती, महत्मा गांधी का विशेष योगदान रहा. हमारे देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व महिलाएं करती है. अगर हम अपने देश की प्रगति देखना चाहते हैं तो हमें महिलाओं की स्थिति सुधारनी पड़ेगी.
स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि जब तक स्त्रियों की दशा सुधारी नहीं जाएगी तब तक संसार में समृद्धि की कोई संभावना नहीं है.पंक्षी एक पंख से कभी नहीं उड़ पाता.
वर्तमान समय में महीलाओं ने शैक्षिक, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और खेल खुद सभी क्षेत्रों में उपलब्धियां दर्ज की है.अभी कुछ दिनों पहले जिमनास्टिक विश्वकप में अरुणा ने कांस्य पदक जीत कर इतिहास रचा और मुक्के बाजी में मैरी और सीमा ने रजत पदक जीता.
मैजुदा दौर में महीलाएं समाज के हर क्षेत्र में पुरुषों की बराबरी कर रही है. एक वक्त था जब रेलवे जैसे विभाग में सिर्फ पुरुष ही काम करते थे पर अब ऐसा नहीं है.इस विभाग में महीलाएं भी अपना योगदान दे रही है. इसका बहुत अच्छा उदाहरण हमें जयपुर का गांधी नगर रेलवे स्टेशन पर देखने को मिलता है. इस स्टेशन पर महिलाएं काम कर रही है.
लैंगिक समानता को अगर हम प्राथमिकता देंगे तो हमारे देश का विकास दोगुना तेज गति से होगा.
प्रकृति ने नर और नारी का जन्म छोटे-बड़े के लिए नहीं बल्कि प्रकृति को संतुलित रखने के लिए किया है और अगर हम प्रकृति के खिलाफ जाते हैं तो ये भी ठीक उसी प्रकार का हमारा समूल नाश करने वाला होगा जिस प्रकार आज ग्लोबल वार्मिंग से दुनिया जूझ रही है. स्मरण रखना होगा कि स्त्री और पुरुष की आवश्यकता है इस प्रकृति को. इस आवश्यकता को जब जब हमने अपनी निजी आवश्यकता माना तब तब हमने स्त्रियों पर दबाव बनाकर रखा और जब जब दबाव अधिक हुआ तब तब विस्फोट हुआ और ये विस्फोट एक पूरी जाति को लेकर नष्ट करने जैसा ही नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से जीवन को क्षति पहुंचाने जैसा है. किसी भी एटम बम से होने वाले दुष्प्रभाव से भी अधिक हानिकारक बन जाता है स्त्री को हानि पहुंचाना. संभवतः इसे ही मद्देनज़र रखा गया है और आज के दिन महिलाओ के साथ पुरुष भी मिलकर कुछ संकल्प लेते हैं. कुछ नया होता है जो महिलाओं को समाज में सामान रूप से खड़ा करता है. यहां पर मैं दुनिया की सभी महिलाओं से आग्रह करना चाहती हूं कि पहले अपना करो सुधार, फिर होगा जग सुधार. केवल स्मार्ट फोन पर सोशल मीडिया में सक्रियता दिखाने से कुछ नहीं होना है . बात तो तब बनेगी जब महिलाएं अपनी असल जिंदगी में सुधार करना सीख ले.