बीच बात में खाँसना ठसका हो सकता है , किन्तु बात बात में खाँसना , खाँसते रहना ठसका नहीं बल्कि खांसी का रोग है. हो सकता है बदलते मौसम के कारण या प्रदूषणयुक्त वातावरण में जाने से या फिर संभव है किसी इंफेक्शन के कारण आपको खांसी हो गयी हो जो दो-चार दिनों में या तो खुद ब खुद या फिर डॉक्टरी सलाह के पश्चात दवाएं खाकर ठीक हो जाती है. मगर इसके बावजूद ठीक न हो रही हो , और खांसी बढ़ती जा रही हो तो आप उन प्राथमिक दवाओं को छोड़ दें जिनका आप अब तक सेवन करते आ रहे हैं बल्कि अच्छे डाक्टर के पास जाएं और गम्भीरतापूर्वक जांच भी कराएं , उसका इलाज भी कराएं. ऐसा न करने या खांसी को मामूली रोग समझने की गलती हो सकता है आपको बहुत भारी पड़ जाए और आप किसी ऐसे रोग की चपेट में आ जाएं जिसे तपेदिक कहते हैं. जी हाँ, ये हो सकता है क्योंकि यदि आप खांस रहे हैं , और यदि आपकी खांसी लगातार बढ़ रही है तो सचेत हो जाने की जरूरत है. चिकित्सक से मिलिए , देर न करिये क्योंकि खांसी सिर्फ मामूली रोग नहीं है , और तब तो बिलकुल भी नहीं जब आपको लगातार खांसी आती रहे और ठीक न हो. यह तपेदिक भी हो सकता है. यानी क्षय रोग यानी टीबी. आप अक्षय रहें इसीलिये तो क्षय रोग दिवस मनाया जाता है. ताकि इस दिन इस रोग के सन्दर्भ में जानकारियां प्राप्त हो और पूरा विश्व सतर्क रह सके.
विश्वभर में फ़ैली हुई है ये बीमारी और भारत इससे अछूता नहीं है. टीवी ऐसी बीमारी है जिससे न अमीर बच पाए हैं न गरीब.हमारे देश के महानायक अमिताभ बच्चन भी इस रोग से पीड़ित रहे . टीबी से हर तीन मिनट में दो भारतीयों की मौत हो रही है. इसलिए इस रोग के प्रति जागरूकता को पैदा करने के लिए विश्व स्वास्थ संगठन के द्वारा हर साल 24 मार्च को विश्व क्षय रोग दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन विश्व भर में जगह जगह संगोष्ठी का आयोजन होता है. वरिष्ठ चिकित्सको द्वारा टीबी रोग के विस्तार एवं उससे बचने के उपाय भी बताए जाते है. टीबी की बीमारी को यक्षमा ,क्षयरोग तथा तपेदिक भी कहा जाता है. असल में माइक्रोबैक्टेरियम ट्यूबरक्लोसिस एक बैक्टरिया है. जिसके फैलने से हमारे फेफड़ो तथा शरीर के अन्य अंगो को नुकसान पहुचता है. हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (immune system ) इसे बढ़ने से रोकता है. लेकिन अगर हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ती है तब टीबी के संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है. टीबी किसी को भी हो सकती है. क्योंकि ये हवा के जरिये एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलता है. 80 के दशक में टीबी को एक महामारी माना जाता था. अगर किसी को यह बीमारी हो जाती थी तो उस समय के लोग मरीज तथा उसके परिवार जन से दूरी बना कर रखते थे. उन्हें अपने किसी कार्यक्रम में शामिल नही करते थे परन्तु आज शिक्षा और जागरूपता के कारण सब लोग यह जान चुके है कि यह कोई ऐसी बीमारी नही है जिसका इलाज न हो सके. इस बीमारी की खोज का श्रेय रॉबट काँख को जाता है. रॉबट काँख एक जर्मन चिकित्सक और साइंटिस्ट थे ने पहली बार 24 मार्च 1882 को माइक्रोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस की खोज की थी. इसलिए 24 मार्च को विश्व क्षय रोग दिवस के रूप में मनाया जाता है इस बीमारी से प्रति वर्ष अनेक लोगो की मौत होती है. यह बीमारी मनुष्य में कब से पायी जाती है. इस विषय में कुछ कह पाना मुश्किल है. हमारे पुराणों में इसके उल्लेख मिलते है जिसमे राजा दक्ष द्वारा चन्द्र को क्षय रोग होने का श्राप दिया जाता है और शिव की आराधना से वे श्राप मुक्त होते है परन्तु आज के समय में रोगी को दवाइयों का कोर्स करना पड़ता है. टीबी के सम्बन्ध में अधिक जानकारी के लिए हमने डॉ डी बी अनन्त से बात की जो की पिछले 33 वर्षो से टीबी मरीजो का सफल इलाज कर रहे है. वे ESIS हॉस्पिटल के टीबी विभाग के अध्यक्ष भी रह चुके है. उनके अनुसार टीबी के मरीज को टीबी की दवाई का कोर्स पूरा करना चाहिए अगर किसी कारण वश मरीज द्वारा दवाइयों का कोर्स अधूरा छोड़ दिया जाता है तो यह बीमारी घातक हो जाती है ऐसी स्थिति में पहली श्रेणी की दवाइयों का असर मरीज की बीमारी पर से खत्म हो जाता है. इसलिए डॉक्टर द्वारा मरीज को दूसरी श्रेणी की दवाइयां दी जाती है. जो की काफी महंगी होती है. इन दवाइयों का दुष्प्रभाव भी मरीज पर हो सकता है.ये MDR (मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस )भी हो सकता है. टीबी की बीमारी में लापरवाही नही करनी चाहिये एक लापरवाही भी घातक हो सकती है. लेकिन अगर कोई मरीज भूलवश दवाई लेना भूल जाए तो उसे तुरन्त डॉक्टर से सम्पर्क करना चाहिए. और उसकी सलाह पर अच्छी तरह से अमल करना चाहिए. मरीज को अपने भोजन पर विशेष ध्यान देना चाहिए. उसे पौष्टिक आहार लेना चाहिए. ये एक जिद्दी रोग है जो आसानी से पीछा नही छोड़ता लेकिन इसका इलाज है और इससे पूरी तरह से ठीक हुआ जा सकता है.
टीबी को रोकने के लिए WHO के निर्देश पर केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों ने DOTS (Directly Observed Treatment Short Course ) प्रणाली की शुरुवात की गयी है. जिसके तहत स्वास्थ कर्मियों की उपस्थिति में रोज दवाइयों का सेवन मरीजो को कराया जाता है. टीबी आम तौर पर फेफड़े से शुरू होती है. इस लिए अधिकतर लोग आज भी टीबी को मात्र फेफड़े से जुडी बीमारी समझते है. इसका यह मतलब है की शरीर के अन्य अंगो की टीबी के बारे में लोग कम जानते है. इस सन्दर्भ में लोगो को जगरूप करने की जरूरत है. टीबी के बैक्टिरिया फेफड़े से रक्त में पहुचता है और वही से शरीर के दूसरे अंगो में जैसे ब्रेन ,यूट्रस ,मुंह ,लिवर ,किडनी गला ,हड्डी आदि में जाकर टीबी रोग उतपन्न करते है. टीबी हमारे शरीर के किसी हिस्से में हो सकती है.
टीबी का बैक्टीरिया शरीर के जिस भी हिस्से में होता है, उसके टिश्यू को पूरी तरह नष्ट कर देता है और इससे उस अंग का काम प्रभावित होता है. मसलन फेफड़ों में टीबी है तो फेफड़ों को धीरे-धीरे बेकार कर देती है, यूटराइन टयूब में है तो इनफर्टिलिटी (बांझपन) की वजह बनती है, हड्डी में है तो हड्डी को कमजोर कर देती है, ब्रेन में है तो मरीज को दौरे पड़ सकते हैं, लिवर में बहुत कम टीवी होता है अगर होता है तो पेट में पानी भर सकता है टीबी के बैक्टीरिया टीबी मरीजके खाँसने छीकने से फैलता है. अगर टीबी मरीज के बहुत पास बैठ कर बात की जाए और वह खांस नही रहा हो तब भी इसके इंफेक्शन का खतरा हो सकता है. हालांकि फेफड़े के आलावा बाकि टीबी एक दूसरे से फैलने वाली नही होती है और आम विश्वास के उल्ट यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली बीमारी भी नही है. टीबी जल्दी पकड़ में नही आती है इसलिए इसके लक्षण को पकड़ना जरूरी है.
लक्षण
1 इसमें मरीज का वजन घटने के साथ साथ शरीर भी कमजोर होने लगता है
2 मरीज के खाने की इच्छा नही होती
3 मरीज को खासी की शिकायत होती है
4 सांस लेने में दिक्कत महसूस होती है
5 खासी के साथ खून भी आ सकता है
6 मरीज को फेफड़े में दबाव महसूस होता है
7 अक्सर रात में बुखार और पसीना होता है
यदि किसी व्यक्ति में ये लक्षण पाए जाते है तो उसे तुरन्त डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए.डॉक्टर टीबी रोग की जांच करने के लिए बहुत सरे टेस्ट करा सकता है जैसे
1 चमड़ी का टेस्ट
2 छाती का एक्सरे
3 सीटी स्कैन
4 खून की जांच
5 थूक की जांच
वैसे तो टीबी के कई कारण हो सकते है परन्तु जब लोग साफ और पौष्टिक खाना नही खाते है तब इस रोग के होने की सम्भावना बढ़ जाती है. महिलाओ की अपेक्षा पुरषो में ये रोग अधिक देखने को मिलता है क्योंकि वो काम के लिए कई जगहों पर जाते है. अगर बच्चों को टीबी हो जाए तो काफी घातक होती है. - इसलिए पैदा होते ही बच्चे को BCG का टीका लगाया जाता है. - बच्चे को टीबी हो जाए तो उसके पूरे शरीर में टीबी फैल सकती है. इसे मिलिएरी (miliary) टीबी कहा जाता है. - बच्चे के दिमाग तक इसका असर हो जाए तो उस स्थिति को मैनेंजाइटिस (meningitis) कहा जाता है. यह स्थित घातक हो सकती है.
एक और केंद्र एवं राज्य सरकार टीबी मुक्त (क्षय रोग) भारत करने का लगातार प्रयास कर रही है तो दूसरी ओर दिनों -दिन टीबी मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है. खासकर देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में टीबी मरीजों की संख्या में बढ़ोत्तरी देखी जा रही है.
इसी को देखते हुए मुंबई में टीवी(क्षय रोग)के बारे में अधिक रिसर्च करने के लिए जेजे अस्पताल में अत्याधुनिक रिसर्च सेंटर शुरू किया जाएगा साथ ही टीबी की जांच के लिए मुंबई मे पांच प्रयोगशाला शुरू की जा रही हैं, इनमें से तीन प्रयोगशाला शुरू हो चुकी हैं. तो घबराइए नहीं , इत्मीनान रखिये. खांसी हो भी और यदि खांसी लगातार भी हो तो भी , जाइए डाक्टर से मिलिए और सही तरीके से उसकी जांच कराइये क्योंकि क्षय रोग ठीक होने जैसा रोग है यदि समय रहते इसका सही तरीके से इलाज शुरू कर दिया जाए तो ये आपके काबू में होगा.