“अंकों की इस दौड़ में, बचपन हुआ उदास.
कंधों पर उम्मीद का, भारी पड़ा लिबास॥”
भारत जैसे विकासशील देश में शिक्षा को हमेशा से सम्मान और प्रगति का माध्यम माना गया है. शिक्षा व्यक्ति को केवल ज्ञान ही नहीं देती, बल्कि उसे जीवन जीने की समझ, सामाजिक चेतना और बेहतर भविष्य की दिशा भी प्रदान करती है. किंतु समय के साथ शिक्षा का स्वरूप बदलता गया और आज स्थिति यह हो गई है कि शिक्षा का अर्थ केवल अधिक अंक लाना और प्रतियोगिता में आगे निकलना भर रह गया है. बच्चों का मूल्यांकन उनके व्यक्तित्व, व्यवहार, रचनात्मकता या संवेदनशीलता से नहीं, बल्कि उनकी मार्कशीट के प्रतिशत से किया जाने लगा है. परिणामस्वरूप बचपन दबाव, तनाव और अपेक्षाओं के बोझ तले कराह रहा है.
आज हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा कक्षा में प्रथम आए, सर्वोच्च अंक प्राप्त करे और समाज में प्रतिष्ठित पद हासिल करे. यह इच्छा स्वाभाविक है, क्योंकि हर अभिभावक अपने बच्चों का उज्ज्वल भविष्य चाहता है. समस्या तब शुरू होती है जब यह इच्छा अपेक्षा बन जाती है और अपेक्षा धीरे-धीरे दबाव में बदल जाती है. बच्चे की रुचि क्या है, उसकी क्षमता क्या है, उसे किस क्षेत्र में आनंद मिलता है—इन प्रश्नों पर कम ध्यान दिया जाता है. मुख्य चिंता केवल अंक और रैंक की रह जाती है.
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ने बच्चों के जीवन को अत्यधिक प्रतिस्पर्धात्मक बना दिया है. स्कूल की पढ़ाई के अतिरिक्त कोचिंग, ट्यूशन, ऑनलाइन क्लास और असाइनमेंट ने बच्चों के दिन का अधिकांश समय घेर लिया है. पहले बच्चे शाम को मैदानों में खेलते थे, पेड़ों पर चढ़ते थे, दोस्तों के साथ हँसते-भागते थे, लेकिन आज उनका बचपन पुस्तकों और स्क्रीन के बीच कैद होकर रह गया है. खेल का मैदान अब मोबाइल की स्क्रीन में सिमट गया है और खुलकर हँसने की जगह परिणामों की चिंता ने ले ली है.
हर वर्ष परीक्षा परिणाम आने के बाद समाज का व्यवहार बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को और अधिक प्रभावित करता है. जिन बच्चों के अंक अधिक आते हैं, उन्हें समाज “होनहार” घोषित कर देता है, जबकि अपेक्षाकृत कम अंक पाने वाले बच्चे स्वयं को कमतर समझने लगते हैं. यह तुलना बच्चों के भीतर आत्महीनता पैदा करती है. कई बच्चे तनाव, अवसाद और भय से घिर जाते हैं. दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि कुछ बच्चे परीक्षा में असफलता के कारण आत्मघाती कदम तक उठा लेते हैं. यह स्थिति केवल शिक्षा व्यवस्था की नहीं, बल्कि पूरे समाज की विफलता का संकेत है.
आज बच्चों पर सबसे अधिक प्रभाव “तुलना” का पड़ रहा है. “देखो, शर्मा जी का बेटा कितना पढ़ता है”, “उसके 98 प्रतिशत आए हैं, तुम्हारे क्यों नहीं?”—ऐसे वाक्य बच्चों के मन पर गहरी चोट करते हैं. तुलना कभी प्रेरणा नहीं बनती, बल्कि आत्मविश्वास को कमजोर करती है. हर बच्चा अपनी क्षमता, सोच और प्रतिभा में अलग होता है. कोई संगीत में उत्कृष्ट हो सकता है, कोई खेल में, कोई चित्रकला में और कोई लेखन में. लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक सोच केवल डॉक्टर, इंजीनियर और प्रशासनिक अधिकारी बनने को ही सफलता का पर्याय मानती है.
यह भी एक बड़ा प्रश्न है कि क्या केवल अधिक अंक प्राप्त कर लेना जीवन की सफलता की गारंटी है? इतिहास और वर्तमान दोनों इस बात के साक्षी हैं कि अनेक महान व्यक्तियों ने साधारण शैक्षिक उपलब्धियों के बावजूद असाधारण कार्य किए. सफलता केवल पुस्तकीय ज्ञान से नहीं आती, बल्कि साहस, धैर्य, रचनात्मकता, संवेदनशीलता और मेहनत से आती है. यदि शिक्षा मनुष्य को अच्छा इंसान नहीं बना पा रही, तो वह अधूरी है.
आज के बच्चे तकनीकी रूप से बहुत तेज हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से अकेले होते जा रहे हैं. माता-पिता दोनों के कामकाजी होने, संयुक्त परिवारों के टूटने और मोबाइल संस्कृति के बढ़ने से बच्चों को संवाद और भावनात्मक सहयोग कम मिल रहा है. वे अपनी परेशानियाँ किसी से खुलकर कह नहीं पाते. ऐसे में परीक्षा और भविष्य का दबाव उन्हें भीतर से तोड़ देता है. शिक्षा का वातावरण आनंददायक होने के बजाय भय का वातावरण बनता जा रहा है.
कोचिंग संस्थानों की बढ़ती संस्कृति ने भी इस समस्या को गंभीर बनाया है. बड़े-बड़े विज्ञापनों में टॉपर्स के चेहरे दिखाकर बच्चों और अभिभावकों के मन में यह धारणा बना दी जाती है कि सफलता केवल कठिन प्रतिस्पर्धा और लगातार पढ़ाई से ही मिलेगी. बच्चों को मशीन की तरह तैयार किया जा रहा है. उनकी रचनात्मकता और स्वतंत्र सोच धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है. शिक्षा अब सीखने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि अंकों की फैक्ट्री बनती जा रही है.
सबसे दुखद स्थिति तब होती है जब बच्चे स्वयं को अपने माता-पिता के सपनों का बोझ समझने लगते हैं. वे डरते हैं कि यदि उनके अंक कम आए, तो वे परिवार को निराश कर देंगे. यह डर उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बनाता है. कई बार माता-पिता अनजाने में बच्चों को यह महसूस करा देते हैं कि उनका प्यार भी अंकों पर निर्भर है. जबकि बच्चों को सबसे अधिक आवश्यकता बिना शर्त स्वीकार्यता और भावनात्मक सुरक्षा की होती है.
हमें यह समझना होगा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं है. शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिए—मानवता, संवेदनशीलता, नैतिकता और आत्मविश्वास का विकास. यदि कोई बच्चा दूसरों की मदद करना सीखता है, अपने माता-पिता का सम्मान करता है, समाज के प्रति जिम्मेदार बनता है और मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है, तो वही सच्ची शिक्षा है.
बच्चों को अपनी रुचियों के अनुसार आगे बढ़ने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए. यदि किसी बच्चे को संगीत पसंद है, तो उसे संगीत में आगे बढ़ने दिया जाए. यदि किसी को खेल, अभिनय, लेखन, कला या किसी अन्य क्षेत्र में रुचि है, तो उसका सम्मान किया जाए. हर प्रतिभा महत्वपूर्ण है. समाज को यह समझना होगा कि दुनिया केवल डॉक्टर और इंजीनियरों से नहीं चलती, बल्कि कलाकारों, शिक्षकों, किसानों, लेखकों, वैज्ञानिकों, संगीतकारों और खिलाड़ियों से भी समृद्ध होती है.
अभिभावकों और शिक्षकों की जिम्मेदारी यहाँ सबसे अधिक है. बच्चों को डाँटने और डराने के बजाय उन्हें समझना और प्रेरित करना आवश्यक है. यदि बच्चा असफल होता है, तो उसे यह विश्वास दिलाया जाना चाहिए कि असफलता अंत नहीं, बल्कि सीखने का अवसर है. कई बार जीवन की सबसे बड़ी सफलताएँ असफलताओं से ही जन्म लेती हैं.
विद्यालयों को भी परीक्षा-केंद्रित शिक्षा से बाहर निकलकर व्यक्तित्व विकास, रचनात्मक गतिविधियों और नैतिक शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए. बच्चों को केवल रटने के बजाय सोचने और समझने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए. शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बच्चों के भीतर जिज्ञासा और आनंद जगाए, न कि भय और तनाव.
सरकार और समाज को भी बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति गंभीर होना होगा. स्कूलों में काउंसलिंग व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए. माता-पिता को भी समय-समय पर यह समझाने की आवश्यकता है कि बच्चों पर अनावश्यक दबाव डालना कितना हानिकारक हो सकता है.