कुर्सी के लिए कुछ भी करेगा! लखनऊ वाले किसी को भी टोपी पहना सकते हैं?

कुर्सी के लिए कुछ भी करेगा! लखनऊ वाले किसी को भी टोपी पहना सकते हैं?

प्रेषित समय :21:34:26 PM / Fri, Feb 18th, 2022

प्रदीप द्विवेदी. शब्द बाण चलाने वाले लोकप्रिय व्यंग्यकार राजीव ध्यानी @rajeevdhyani ताजा सियासी घटनाचक्र पर लाजवाब निशाना साधते हैं?

इस वक्त यूपी की पूरी राजनीति हिन्दू-मुस्लिम पर फोकस करने के प्रयास हो रहे हैं, ताकि चुनाव जीतने के लिए अस्सी-बीस समीकरण को साधा जा सके, लेकिन राजनेता तब भी आश्वस्त नहीं हैं, लिहाजा योगी सरकार के क़ानून मंत्री और लखनऊ कैंट से बीजेपी प्रत्याशी ब्रजेश पाठक- दादा मियां दरगाह पर गए, जब वे गए तो राजीव ध्यानी ने व्यंग्यबाण चलाया.... लखनऊ वाले किसी को भी टोपी पहना सकते हैं!

वैसे, राजीव ध्यानी सियासी कवि भी हैं, उन्होंने आज के हालात पर तुकबंदी शेयर की है....

अपनी संसद को सर्कस मत बनाना
इसे नफ़रत का मरकज़ मत बनाना.
ये ग़लती आइन्दा हरगिज़ न करना
कुकुरमुत्तों को बरगद मत बनाना.
राम को मन में और मंदिर में रखना
उन्हें सत्ता का मक़सद मत बनाना.
नफ़रतें हो सके तो कम करना
अब कोई नया मज़हब मत बनाना!
भले ही राजीव ध्यानी अब तक संसद में नहीं पहुंचे हों, परन्तु उनकी रचना संसद में जरूर पहुंच चुकी हे, इसी पर वे लिखते हैं- हम तो संसद में जाने कब पहुंचेंगे, लेकिन हमारी एक रचना ज़रूर पहुंच गई!
सांसद @SanjayAzadSln जी ने मोदीजी के डिजिटल इंडिया पर इस नाचीज़ की तुकबंदी को राज्यसभा में पढ़ा, आप भी सुनिए....
https://twitter.com/rajeevdhyani/status/1491377380526800896
पल-पल इंडिया (6/4/2017) की खबरंदाजी में डिजिटल दर्द कुछ इस तरह से उभरा था....
खबरंदाजी : डिजिटल रोटी से पेट नहीं भरता साहेब!

डिजिटल उत्सव मनाते-मनाते आधे से ज्यादा अच्छे दिन गुजर गए हैं... डिजिटल ज्ञान से दिलो दिमाग लबालब भर गया है और अब चुनौतियों की चादर चल रही है, लेकिन क्या करें? डिजिटल रोटी से पेट नहीं भरता साहेब!

बताया था कि... डिजिटल लेन-देन से मुफ्त के दिन आएंगे... क्या पता था कि लेने-के-देने पड़ जाएंगे... मुफ्त में मारे जाएंगे! अब किसे बताएं कि डिजिटल लेनदेन से बैंक खाताधारी की नहीं, बैंकों की बल्ले-बल्ले हो रही है! आए थे हरिभजन को ओटन लगे कपास, की तर्ज पर पब्लिक की हालत यह है कि... आए थे पैसे लेने भरने लगे पेनल्टी!

साहेब, बड़ी भारी दिक्कत हो गई है... डिजिटल चारा गाय नहीं खाती  और डिजिटल गाय दूध नहीं देती! सेवाभावी भाई लोग भी आजकल डिजिटल समाज सेवा में लग गए हैं... उत्सव हो तो व्हॉट्सएप पर डिजिटल मिठाई भेज देते हैं... गर्मी ज्यादा हो तो डिजिटल पंखे का इंतजाम कर देते हैं... प्यास लगे तो डिजिटल प्याऊ खोल देते हैं... कामयाबी पर भी आजकल कोई पीठ थपथपाने नहीं आता, व्हाट्सएप पर ही अंगूठा दिखा देते हैं... इसको लेकर थोड़ा कंफ्यूजन भी है कि तारीफ हो रही है कि ताना मार रहे हैं! क्योंकि डिजिटल और नॉन-डिजिटल में अंगूठा दिखाने के अर्थ-भावार्थ अलग-अलग हैं!

आजकल भिखारियों का धंधा भी मंदा पड़ गया है... अब बेचारे, डिजिटल कटोरा कहां से लाएं? डिजिटल धर्म-कर्म की दुआएं भी बदल गई है... भगवान तुझे एटीएम के नकली नोट से बचाए... बैंक से बच कर रहे, एटीएम तेरी पेनल्टी माफ करें... आधार कार्ड से तेरा आधार हराभरा रहे... आदि-आदि!

पहले कालाधन आमआदमी को नजर नहीं आता था... नया नोटबंदी का चश्मा लगने के बाद सफेदधन भी दिखना बंद हो गया है! इसे कहते हैं डिजिटल मोक्ष! कालाधन लोहे की बेडिय़ां हैं तो सफेदधन सोने की बेडिय़ां... जब तक कैशलेस नहीं हो जाओगे, डिजिटल मोक्ष कहां से मिलेगा?

खैर, सबको जाने दो साहेब, लेकिन... किसानों पर थोड़ा ध्यान दे दो, क्योंकि... परेशान होकर इन्होंने डिजिटल गेहंू उगाना शुरू कर दिए तो कसम से... सब भूखे मर जाएंगे!
पप्पूगिरी में भी मोदीजी ने तगड़ी मात दे दी है राहुल गांधी को?  
https://twitter.com/PalpalIndia/status/1493622897864507395

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

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