जबलपुर ड्रेनेज प्रोजेक्ट पर हाईकोर्ट सख्त, निजी जमीन के अधिग्रहण पर लगाई रोक और जनसुनवाई के दिए सख्त निर्देश

जबलपुर ड्रेनेज प्रोजेक्ट पर हाईकोर्ट सख्त, निजी जमीन के अधिग्रहण पर लगाई रोक और जनसुनवाई के दिए सख्त निर्देश

प्रेषित समय :19:32:02 PM / Mon, Feb 9th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर . मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने जबलपुर शहर की ड्रेनेज व्यवस्था और प्रस्तावित नाला निर्माण को लेकर एक ऐतिहासिक और जनहितैषी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि शहर के विकास और जल निकासी की समस्या को सुलझाने के नाम पर किसी भी नागरिक की निजी संपत्ति का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा और न ही किसी निजी भूमि पर निर्माण कार्य होगा। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ ने इस मामले में पारदर्शिता और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक उच्च स्तरीय तकनीकी समिति को सार्वजनिक सुनवाई (Public Hearing) आयोजित करने का आदेश दिया है। अदालत का यह रुख उन नागरिकों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जो लंबे समय से अपनी जमीन छीने जाने के डर से सहमे हुए थे।
यह कानूनी विवाद जबलपुर की एक आवासीय सोसाइटी में गंभीर जलभराव की समस्या के बाद शुरू हुआ था। इस संबंध में निधि पांडे और अन्य द्वारा दायर एक मूल याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पहले ही नगर निगम को मानसून से पहले पर्याप्त सफाई और जल निकासी व्यवस्था दुरुस्त करने के निर्देश दिए थे। उस समय नगर निगम आयुक्त ने हलफनामा देकर आश्वासन दिया था कि शहर में सीवर लाइनों की सफाई और अतिक्रमण हटाने जैसे ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि, इसके बाद एक मध्यस्थ (Intervenor) ने अदालत में आवेदन दाखिल कर यह चिंता जताई थी कि जो नया ड्रेनेज प्रोजेक्ट या नाला बनाया जा रहा है, वह उनकी निजी भूमि या उनके भूखंड से सटी जमीन से होकर गुजर सकता है। इसी आशंका ने एक नए कानूनी विवाद को जन्म दिया, जिस पर हाई कोर्ट ने अब विस्तार से आदेश जारी किया है।

सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से अधिवक्ता चिरंजीव शर्मा और राज्य सरकार की ओर से सरकारी अधिवक्ता मानस मणि वर्मा ने पक्ष रखा। निगम की ओर से अदालत को आश्वस्त किया गया कि इस पूरे मामले की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय तकनीकी समिति पहले ही गठित की जा चुकी है और उसकी रिपोर्ट का इंतजार है। निगम ने स्पष्ट रूप से कहा कि फिलहाल किसी भी निजी जमीन पर निर्माण का कोई प्रस्ताव नहीं है और न ही भविष्य में ऐसी कोई योजना है। वहीं, हस्तक्षेपकर्ता के वकील ने दलील दी कि यदि तकनीकी समिति अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार करने से पहले प्रभावित लोगों का पक्ष सुन ले, तो न्याय की मंशा पूरी होगी। हालांकि याचिकाकर्ताओं ने इस सुनवाई का विरोध किया, लेकिन हाई कोर्ट की खंडपीठ ने 'निष्पक्षता के सिद्धांत' का हवाला देते हुए जनसुनवाई की मांग को जायज ठहराया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि सार्वजनिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में नागरिकों की भागीदारी अनिवार्य है, विशेषकर तब जब संपत्ति के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना हो। कोर्ट ने इस प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए एक सख्त समय-सीमा निर्धारित की है। आदेश के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को यदि इस प्रोजेक्ट से आपत्ति है, तो वह 11 फरवरी 2026 तक जबलपुर नगर निगम आयुक्त के कार्यालय में अपनी लिखित आपत्ति दर्ज करा सकता है। इसके बाद आयुक्त इन आपत्तियों को 12 फरवरी तक तकनीकी समिति को भेजेंगे। सबसे महत्वपूर्ण निर्देश जनसुनवाई को लेकर है, जो 17 फरवरी 2026 को दोपहर 3:30 बजे नगर निगम आयुक्त के कार्यालय में आयोजित की जाएगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इस सुनवाई के लिए अलग से कोई सार्वजनिक नोटिस जारी करने की आवश्यकता नहीं होगी, यह आदेश ही अंतिम सूचना माना जाएगा। हाई कोर्ट ने तकनीकी समिति को यह भी निर्देश दिया है कि वह सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 23 फरवरी 2026 तक अपना अंतिम निर्णय ले और संबंधित पक्षों को सूचित करे। अदालत ने बेहद संतुलित रुख अपनाते हुए यह साफ किया कि इस सुनवाई की प्रक्रिया से ड्रेनेज प्रोजेक्ट के अन्य कार्यों में कोई देरी नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने केवल प्रभावितों को अपनी बात रखने का मंच प्रदान किया है, न कि प्रोजेक्ट की समय-सीमा को आगे बढ़ाया है। जबलपुर के नागरिकों के लिए यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न केवल जलभराव जैसी गंभीर समस्या के समाधान की राह प्रशस्त करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि विकास की इस दौड़ में आम आदमी के बुनियादी संवैधानिक अधिकारों और उनकी निजी संपत्ति के साथ कोई खिलवाड़ न हो। इस फैसले के बाद अब सबकी निगाहें 17 फरवरी को होने वाली जनसुनवाई पर टिकी हैं।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-