नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में अवैध खनन से जुड़े एक गंभीर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को याचिकाकर्ता आशुतोष दीक्षित की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने मामले की संवेदनशीलता और स्थानीय क्षेत्राधिकार को देखते हुए याचिकाकर्ता को संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का निर्देश दिया है। इस मामले में बीजेपी विधायक संजय सत्येंद्र पाठक और उनसे जुड़ी कंपनियों पर अवैध खनन के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
याचिकाकर्ता आशुतोष दीक्षित ने अपनी याचिका में दावा किया था कि विधायक संजय सत्येंद्र पाठक से जुड़ी तीन कंपनियां जबलपुर जिले के सिहोरा क्षेत्र और वन भूमि के संरक्षित इलाकों में 'अवैध और अत्यधिक खनन' कर रही हैं। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि इस खनन कार्य से न केवल पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है, बल्कि सरकारी राजस्व की भी चपत लग रही है। सोमवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील देवदत्त कामत ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की बेंच के सामने एक बेहद संवेदनशील मुद्दा उठाया। वकील ने अदालत को जानकारी दी कि इस मामले से जुड़े एक मौजूदा विधायक ने जज को फोन किया है, जिस पर संबंधित जज ने अपनी नाराजगी भी जाहिर की थी। वकील ने दलील दी कि ऐसी स्थिति में अदालत को इस मामले में स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेना चाहिए था और याचिका खारिज नहीं की जानी चाहिए थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई को सीधे अपने स्तर पर लेने से मना कर दिया और स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता पहले हाईकोर्ट के समक्ष अपनी बात रखे। वहीं, सुनवाई के दौरान विधायक द्वारा जज को फोन करने के मुद्दे पर सीजेआई ने कड़ी टिप्पणी करते हुए सभी पक्षों को राजनीतिक बयानबाजी से दूर रहने और मर्यादा बनाए रखने की सलाह दी। यह मामला मध्य प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब याचिकाकर्ता के पास हाईकोर्ट जाने का विकल्प है, जहां वह अपनी साक्ष्यों और आरोपों को विस्तृत रूप से रख सकते हैं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद अवैध खनन में लिप्त कंपनियों और स्थानीय प्रशासन की भूमिका की जांच अब हाईकोर्ट के दायरे में सिमट गई है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर मध्य प्रदेश में अवैध खनन और रसूखदार नेताओं के प्रभाव को लेकर बहस छेड़ दी है।
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