जबलपुर. हम मौत को छूकर वापस आए थे, कलेजा हलक में था, लेकिन अस्पताल को हमारी जान से ज्यादा अपने बिल की फिक्र थी. उक्ताशय की बात वाराणासी निवासी सविता वर्मा ने कही. सवित जबलपुर के बरगी डेम हादसे की चश्मदीद और पीडि़त हैं. इजराइल में युद्ध के चलते 16 साल बाद वतन लौटी सविता को क्या पता था कि अपने देश की अव्यवस्था और संवेदनहीनता उन्हें अपनों की मौत के खौफ से ज्यादा चोट पहुंचाएगी.
हादसे को लेकर सविता वर्मा ने जबलपुर के निजी अस्पतालों पर गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने बताया कि जब उन्हें अस्पताल ले जाया गया, तब उनके पास न तो फोन काम कर रहे थे और न ही जेब में रखे पैसे सूखे थे. सविता ने कहा- मुझे ये बहुत बुरा लगा.. हम लोगों को पता नहीं किस हॉस्पिटल में ले गए थे. हम सबके फोन डेड हो गए थे. हम एक दूसरे से कॉन्टेक्ट नहीं कर पा रहे थे. 50 लोग आकर हमसे नाम पूछ रहे हैं. हम अपने लोगों के बारे में पूछ रहे हैं कोई बताने और हेल्प करने वाला नहीं हैं. सबके नोट भीग चुके हैं ऑनलाइन पेमेंट नहीं कर सकते और हॉस्पिटल वालों ने सबसे पहले बिल थमा दिया. आप एड्रेस फोन नंबर ले सकते हैं. हम लोग ऑनलाइन पे कर सकते हैं. इस तरह की घटनाएं होती हैं तो क्या यहां के हॉस्पिटल कोई हेल्प नहीं करते हैं? कोई हेल्पलाइन कोई सुविधा नहीं होती है क्या?
दवा तक नहीं दी, बिल थमा दिया-
सविता ने कहा एक टीटी, पेनकिलर हम लोगों को लगे होंगे उतने में 4700 का बिल थमा दिया. दीदी को तीन चार टांके लगाए और एक दवाई भी नहीं दी और 4700 का बिल थमा दिया. बनारस में मेरा भाई रहता है वो तो कुछ लोगों के आईफोन काम कर रहे थे, तो उसको फोन किया उसने वहां से पेमेंट किया है. यहां के बारे में मुझे कुछ नहीं पता.
इजराइल के युद्ध से सुरक्षित, अपनों के शहर में असुरक्षित-
सविता ने बताया कि वह 16 साल इजराइल में रहीं और पिछले 2-3 सालों से वहां युद्ध जैसे माहौल में थीं. उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि भारत आकर एक छोटे से टूरिस्ट स्पॉट पर उन्हें ऐसी अनहोनी का सामना करना पड़ेगा. मैं घर वालों से कहती थी कि इजराइल में बहुत प्रोटेक्शन है, फिक्र मत करो. लेकिन यहांं न तो कोई लाइफ जैकेट का नियम सख्ती से लागू था, न ही क्रू मेंबर्स को आपातकालीन स्थिति से निपटना आता था.
बेटे ने लोगों को लाइफ जैकेट बांटी-
हादसे को याद करते हुए सविता भावुक हो गईं. उन्होंने बताया कि अचानक मौसम बदला और नाव में पानी भरने लगा. लोग पैनिक करने लगे, बच्चे चिल्ला रहे थे. क्रू मेंबर्स की जगह उनका 22 साल का बेटा और अन्य यात्री ही एक-दूसरे की मदद कर रहे थे. सविता के बेटे ने खुद लाइफ जैकेट पहनने के बजाय दूसरों की मदद की और डूबती नाव से पानी निकालने का प्रयास किया. सविता ने बताया कि जब नाव पलटी, उनके हाथ में एक बच्चा था. दो सेकंड के लिए लगा कि सब खत्म हो गया, लेकिन नर्मदा मैया और भोलेनाथ की कृपा से वह पानी से बाहर निकल आईं.



